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Tuesday, 28 January 2020

बोलो ज़िन्दगी फैमिली ऑफ़ द वीक : यू ब्लड बैंक की संस्थापिका शिखा मेहता की फैमिली, धवलपुरा, पटनासिटी



रविवार की शाम 26 जनवरी, रिपब्लिक डे के दिन 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटनासिटी के धवलपुरा इलाके में संस्था यू ब्लड बैंक की संचालिका शिखा मेहता के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में पटना सचिवालय में कार्यरत एवं सचिवालय कोऑपरेटिव बैंक के डायरेक्टर उदय कुमार भी शामिल हुयें. इस कार्यक्रम को सपोर्ट किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों शिखा जी की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.  26 जनवरी, रिपब्लिक डे के मौके पर भी शिखा जी की टीम ने पटना के खुदा बक्स लायब्रेरी के पास बिहार यंग मेंस में रक्तदान शिविर का आयोजन किया था जहाँ निशुल्क नेत्र जाँच की व्यवस्था भी कराई गयी थी.

फैमली परिचय- शिखा अभी पटना यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट हैं, सोशोलॉजी से पीजी कर रही हैं. दो बहन और एक भाई में दूसरे नंबर पर हैं. छोटा भाई अभिनव शुभम कोटा में रहकर मेडिकल की तैयारी कर रहा है. बड़ी बहन मेधा की शादी हो चुकी है. पापा सुधीर कुमार कैमिकल का बिजनेस करते हैं. माँ अनीता देवी हाउसवाइफ हैं.

यू ब्लड बैंक ऑर्गेनाइजेशन की शुरुआत - संस्था यू ब्लड बैंक यानि यूनिवर्सल ब्लड बैंक की संस्थापिका शिखा ने बताया कि "28 सितंबर, 2016 में इसकी शुरुआत हुई थी. पहले अर्जेन्ट में किसी की मदद होती थी लेकिन अब हमलोग कैम्पेन के द्वारा करते हैं ताकि कभी रात के एक-दो बजे भी किसी ब्लड बैंक को हम हेल्प पहुंचा सकें." जब शिखा ने यू ब्लड बैंक की स्थापना की तो उन्हें घर-परिवार का भी अच्छा सपोर्ट मिला. उसी वक़्त ध्यान आया कि एक-दो जन के यूँ बल्ड दे देने से काम चलेगा नहीं इसलिए इनकी टीम ने ब्लड डोनेशन कैम्प लगाना शुरू किया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग अवेयर होकर रक्तदान कर सकें. इनका फोकस ज्यादातर युवाओं को इस मुहीम से जोड़ने का रहा और फिर उन्हें प्रेरित करके ये जितने भी ब्लड बैंक हैं पटना में सभी को ब्लड मुहैया कराते हैं, यह सोचकर कि किसी जरूरतमंद को वक़्त पर काम आये, ब्लड की कमी से किसी की मृत्यु ना हो.

प्रेरणा कहाँ से मिली ? - छोटा भाई अभिनव शुभम प्रेरणास्रोत बना. जब वो कोटा में ही था तो उसने देखा कि वहां ब्लड की काफी जरूरत है और कई ग्रुप ब्लड डोनेशन के लिए काम कर रहे हैं. वो चाहता था कि शिखा उसी तरह पटना में भी एक ग्रुप तैयार करें. पहले उसने कोटा में रहते हुए ही एक व्हाट्सप ग्रुप बनाया जिसके तहत एक-दो महीने काफी सक्रीय रहा. कभी वो तो कभी उसके दोस्त ब्लड डोनेट करने चले जाते थें. जब उसने शिखा को बताया तो उन्हें लगा कि ये हमसे होगा नहीं. फिर भाई ने समझाते हुए कहा कि "एक बार तुम ट्राई करके देखो." तब पहले शिखा ने पटना में अपना अलग एक व्हाट्सप ग्रुप बनाया और पहली बार 28 सितंबर को एक कैंसर पीड़ित महिला के लिए रक्तदान किया. ये बिल्कुल नया अनुभव था शिखा के लिए कि आप जिसे जानते नहीं हो उसे ब्लड देकर उसकी जान बचाते हो. इनके पापा के मन में चूँकि शुरू से समाज सेवा की भावना रही है इसलिए वो इनके काम को बढ़ावा देते हैं. जहाँ कहीं भी बैठते हैं तो बेटी के इस काम के बारे में बताते हैं हर किसी को कि "मेरी बेटी ऐसा कर रही, आपको भी करना चाहिए."

क्या मुश्किलें आयीं ? - शिखा को शुरुआत में समझ में नहीं आ रहा था कि शिविर आयोजित कर रहे हैं तो लोगों को कैसे एकत्रित करें. फिर सोशल मीडिया आधार बना. उसके जरिये लोगों को जोड़ना शुरू किया गया. सबसे पहले शिखा ने फैमिली मेंबर को जोड़ा. कोई रोक-टोक तो नहीं हुई...? यह पूछे जाने पर शिखा कहती हैं, "अगर आप समाज के लिए कुछ करने निकलते हैं तो पोसिटिव-निगेटिव दोनों बातें देखने को मिलती हैं लेकिन जब घर का सपोर्ट हो और खुद का विश्वास हो तो आपका हौसला बढ़ जाता है."

सहयोगी - यू ब्लड बैंक संस्था के अभी 5 ग्रुप हैं. टीम की बात करें तो शिखा के सहयोगियों की संख्या 15 से 20 है जिनमे संतोष पाठक, सत्यदीप पाठक, अमरजीत कुमार, आमोद कुमार शेखावत, अविनाश कुमार मेहता, प्रेमचंद कुमार, पुष्पलता कुमारी, राजेश गुप्ता, मनोज कुमार मंडल, रंजना मेहता, विवेक कुमार, आशीष यादव ,आलोक कुमार, ब्यूटी सिंह, सृष्टि कुमारी, मनोज यादव, सूरज सिंह तोमर का वोलेंटियर के रूप में बहुत अच्छा सहयोग मिलता है. लेकिन जो ब्लड डोनेट करनेवाले सदस्य हैं उनकी संख्या हजार से ऊपर है. इसके आलावा बाल लीला गुरुद्वारा, पटना साहिब से बाबा कश्मीर सिंह भूरीवाले, बाबा गुरविंदर सिंह एवं सामाजिक कार्यों से जुड़े सभी युवाओं के लिए अभिभावक के रूप में गुरमीत सिंह जी का हमेशा सहयोग रहता है यू ब्लड बैंक के नेक कार्य में.

आगे का लक्ष्य -  शिखा बताती हैं, "शिविर करने से लोग जागरूक तो होते ही हैं और एक प्लस पॉइन्ट ये होता है कि हर तीन महीने पर रक्तदान करने की अच्छी लत उन्हें लग जाती है. हमारी इच्छा है कि वैसे गांव-कस्बों में जहाँ लोग रक्तदान को लेकर कुछ सोचते तक नहीं हैं वहां जाकर हम ब्लड डोनेशन कैम्प लगाएं, उनके बीच डोर टू डोर जाकर जागरूक करें कि आपके गांव में भी अगर किसी की ब्लड की कमी से मृत्यु हो जाती होगी, प्रसव के दौरान कई महिलाएं ब्लड की कमी की वजह से दम तोड़ देती हैं तो अगर आप इस चीज में आगे आएंगे तो कई लोगों की जान बचा सकते हैं." इसी लक्ष्य को लेकर 2020 में शिखा जी कि टीम ने पहली बार पटना से बाहर फतुहा इलाके में भी रक्तदान शिविर आयोजित किया.

हॉबी - शिखा गाने सुनने, गार्डनिंग और फोटोग्राफी का भी शौक रखती हैं. इनके पापा भी पुराने गाने बहुत सुनते हैं. उन्हें बागवानी का भी शौक है तभी अपने घर की छत पर फल-फूल और शब्जियों के कई पौधे लगा रखे हैं जैसे निम्बू, सपाटू, जामुन, अमरुद, आम का पेड़, सब्जी में टमाटर, नेनुआ, कद्दू, भिंडी, पालक, मूली, धनिया इत्यादि.


स्पेशल मोमेंट - बोलो ज़िन्दगी की फरमाईश पर शिखा मेहता ने एक गाना गुनगुनाकर सुनाया. जब टीम कि नज़र घर में राखी कुछ ट्रॉफियों पर गयीं तो शिखा के पिता जी ने फख्र से कहा कि "ये सम्मान मेरी बेटी को मिले हैं उसके नेक कार्यों को देखते हुए...." और यह कहते हुए बोलो ज़िन्दगी की टीम ने करीब से महसूस किया अपनी बेटी की सराहना करते हुए एक पिता की आँखों में दिख रही खास चमक को जो गर्व का एहसास करा रही थी. शिखा और उनकी फैमिली से मिलकर बोलो ज़िन्दगी टीम के साथ आये स्पेशल गेस्ट उदय कुमार ने शिखा की तारीफ करते हुए यह आश्वासन भी दिया कि, आपकी योजनाओं और मुहीम को हम सरकार तक पहुँचाने में मदद करेंगे.

अब रात हो चुकी थी और बोलो ज़िन्दगी की टीम यहाँ से विदा लेने ही वाली थी कि शिखा के पिता जी के आग्रह पर बोलो ज़िन्दगी की टीम सीढ़ियां चढ़ते हुए घर के छत पर पहुँची और उनकी खूबसूरत बागवानी कला का मुआयना करके ही वापस लौटी.

 (इस पूरे कार्यक्रम को bolozindagi.com पर भी देखा जा सकता है.)















Monday, 13 January 2020

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : स्टोरी टेलर शाइस्ता अंजुम की फैमली, गुलजारबाग़, पटनासिटी




पिछले दिनों 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटनासिटी के गुलजारबाग़ इलाके में सोशल एक्टिविस्ट एवं स्टोरी टेलर शाइस्ता अंजुम जी के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में पटना हाईकोर्ट की एडवोकेट एवं सोशल एक्टिविस्ट मधु श्रीवास्तव भी शामिल हुईं. इस कार्यक्रम को सपोर्ट किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों शाइस्ता अंजुम जी की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.

फैमली परिचय- शाइस्ता अंजुम- मायका और ससुराल दोनों ही भागलपुर में है. पोलिटिकल साइंस और वीमेन स्टडीस इन दो सब्जेक्ट से एम.ए. किया है. शौक - बच्चों को कहानियां सुनाना, लोगों की मदद करना, गाना सुनना, प्लांट लगाना, पशु-पक्षियों से बहुत लगाव है तभी मेरे घर में फिश, पैरोट, रैबिट और लव बर्ड ये सभी अब मेरे घर के सदस्य हैं. नए-नए तरह के डिश बनाने का भी शौक है.
डॉ. मो. रब्बान अली  - ओरियंटल कॉलेज में वाइस प्रिंसिपल हैं और पोलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. मैट्रिक तक संस्कृत में पढ़े हैं, स्कूली दिनों में क्रिकेट खेलने का बहुत शौक था. अभी पैदल चलना, बैडमिंटन खेलना, अख़बार पढ़ना शौक में शामिल है. बहुत पहले चोरी-छिपे शेरो-शायरी लिखने का बहुत शौक चढ़ा था और जब से पत्नी का साथ मिला तो वो छूट चूका शौक फिर से जवां हो उठा. क्यूंकि पत्नी प्रेरित करती हैं आज भी लिखने के लिए तो थोड़ा बहुत लिख लेते हैं. मैं सैड वाली चीजें ज्यादा लिखते हैं उसकी वजह ये कि हमने ज़िन्दगी में उदासियाँ बहुत देखी हैं.
बच्चे- मो. अनस रब्बानी, क्लास 8, संत. ऐंस हाई स्कूल, गेमिंग का शौक है, यू ट्यूब पर गेमिंग का चैनल बनाने की तयारी में लगे हैं. बास्केटबॉल और पेंटिंग में भी रूचि है लेकिन इधर पढ़ाई के लोड की वजह से इन सब से अभी दूरी है.
आमना रब्बानी- मगध महिला कॉलेज, पटना यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन लास्ट ईयर की स्टूडेंट हैं. केमेस्ट्री ऑनर्स है. स्कूल में बहुत सारे कॉप्टीशन में पार्टिसिपेट किया. डिबेट किया. बेस्ट स्टूडेंट और स्केल हेड रह चुकी हूँ. इंजीनियरिंग मेरा ड्रीम था लेकिन आर्थिक प्रॉब्लम की वजह से वो मैं कर नहीं पायी.स्कूल में पेंटिंग में रूचि थी, थोड़ा बहुत सिंगिंग का भी शौक रखती हूँ. टिकटॉक वीडियो भी बहुत सारे बनाये हैं.

शाइस्ता जी का स्ट्रगल - शाइस्ता जी इस बाबत बताती हैं , "जब अपने मायके भागलपुर में थी तो स्कूली दिनों में तब वहां लाइट रहती नहीं थी लेकिन पढ़ने का बहुत शौक था. मेरी पूरी फैमिली पर्दा प्रथा वाली थी. हमलोग सैय्यद बिरादरी से आते हैं तो तब यह था कि लड़कियां बाहर नहीं जाएँगी. मुझे याद है कि मेरी अम्मी को अगर चूड़ी भी पहननी होती तो चूड़ीवाली हमलोगों के घर में आती थी. इस तरह मैंने सबको तब पर्दे में ही देखा. लेकिन मेरा थोड़ा सा अलग ही दिमाग था. मैं पढ़ाई-लिखाई में ज्यादा मशगूल रहती तो मेरी अम्मी बोलतीं कि पता नहीं ये कौन तरह की लड़की पैदा हो गयी है. अब मेरे पापा और अम्मी नहीं हैं सिर्फ भाई लोग हैं. तब मैं पढ़ने के साथ ही साथ बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी क्यूंकि मैं अपने घर की आर्थिक स्थिति ठीक करना चाहती थी. तब मेरे पापा का मेजर एक्सीडेंट हो गया था और उनका बाहर निकलना बंद हो गया. घर में पापा, अम्मी और हम 6 भाई-बहन थें. लेकिन उस वक़्त हमें कोई सपोर्ट नहीं मिला. तब घर को सँभालने के लिए मुझे बाहर निकलना पड़ा. अपने भाई-बहनों को पढ़ाने के साथ- साथ खुद भी पढ़ती गयी.


कहानी लेखन की शुरुआत - शाइस्ता जी कहती हैं, "आजकल के बच्चों के पास मनोरंजन का बहुत साधन है लेकिन हमलोगों को उस वक़्त ऐसा कुछ था नहीं. मेरी बेस्ट फ्रेंड मधु हमारे पड़ोसी पुजारी जी की बेटी थी. हमलोग साथ ही स्कूल जाते थें. हमें तब उतना पैसा मिलता नहीं था तो हम और मेरी दोस्त आपस में मिलकर चंदा करते थें और अपने मोहल्ले में एक पुरानी किताब की दुकान थी वहाँ पैसा देकर आठ आने - चार आने देकर किराये पर कॉमिक्स पढ़ने ले आते लाते थें और फिर या तो स्कूल में या अमरूद के पेड़ के नीचे एक साथ बैठ जाते थें. कई और दोस्त भी हमारी मण्डली में शामिल हो जाते थें. हर दिन हम लोगों में से ही कोई एक कॉमिक्स पढ़ता और सभी चाव से सुनते थें. तब यूँ ही कहानियां सुनते-सुनते लिखने का शौक भी शुरू हो गया. स्कूल में डिबेट कॉम्पटीशन में फर्स्ट प्राइज जीतें थें. इंटर के दौरान भागलपुर आकाशवाणी में मेरा युववाणी कार्यक्रम में कहानियां-कवितायेँ सुनाना शुरू हो गया. फिर बाल-मंजूषा कार्यक्रम में बच्चों के साथ मेरी जुगलबंदी होने लगी. नए पल्ल्व प्रकाशन की किताब घरौंदा जिसमे कई लोगों की साझा कहानियां हैं उसमें मेरी पहली कहानी 'नन्ही छुटकी' प्रकाशित हुई फिर कई पत्रिकाओं यथा गृहशोभा इत्यादि और दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान आदि अख़बारों में कहानियां प्रकाशित हुईं.

समाज सेवा की भावना - पशु-पक्षियों से आज भी लगाव है और तब भी था जिस वजह से बचपन में पड़ोसी बच्चों को जानवरों और पक्षियों को तंग करते देखकर शाइस्ता जी उनसे लड़ पड़ती थीं. भागलपुर के अख़बार 'नयी बात' में इनकी रचनाएँ अक्सर छपती थीं. 90 के दशक में उन्ही दिनों प्रौढ़ शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने के लिए कुछ कॉलेज स्टूडेंट का चयन करके उन्हें भेजा जाता था. शाइस्ता भी तब प्रौढ़ शिक्षा केंद्र कार्यक्रम में जाती थीं. 1995 में भागलपुर में भयानक बाढ़ आयी थी तो वहीँ के एक बाढ़ग्रस्त इलाके में मदद पहुँचाने जाना पड़ा था. वहां बाढ़ से त्रस्त लोगों को चूड़ा वगैरह वितरित करना था. शाइस्ता जी बताती हैं कि "तब उनकी स्थिति देखकर मेरी आँखों से आंसू निकल आये थें. वहां से आकर हमने उस घटना पर एक आर्टिकल लिखा था जो हिंदी-उर्दू के कुछ अख़बारों में छपी थी. फिर वहीँ से मन में समाज सेवा कि भावना घर करनी शुरू हो गयी."


सराहनीय कार्य - शाइस्ता जी सोशल वर्क में कई संस्थाओं से जुडी हुईं हैं. पटना के राजेंद्रनगर में कहानीघर नाम से एक संस्था है जहाँ झुग्गी-झोपड़ियों के बच्चे, रिक्शा-ठेला चलानेवालों के बच्चे और नशे की लत लगा चुके बच्चे आते हैं. मीनाक्षी मैडम और रौनक सर संस्था का संचालन करते हैं. वहाँ इन स्लम के बच्चों को कहानियों के माध्यम से चरित्र चित्रण किया जाता है.
शाइस्ता जी बताती हैं, "पटना में संस्था कहानीघर के संचालक से फेसबुक के माध्यम से सम्पर्क हुआ. उन्होंने बुलाया तो मैं वहाँ गयी और जब पहले ही दिन बच्चों के बीच कहानी सुनाएँ तो उनलोगों को बेहद पसंद आया. फिर ऐसा हो गया कि हम रेगुलर हर सैटरडे को जाने लगें. हम वहाँ पहुंचे नहीं कि बच्चे मुझे घेर लेते थें." इनकी हर कोशिश में इनके हसबैंड ने हमेशा साथ दिया. एक दिन शाइस्ता जी ने सोचा क्यों न पटनासिटी में मदरसे के बच्चों के लिए कुछ करें क्यूंकि ये वो बच्चे हैं जो यतीमख़ानों के अंदर कैद सा रहते हैं, तो उन बच्चों को भी ये  कहानी के माध्यम से बहुत सी जानकारियां देना चाहती थीं. लेकिन चैलेन्ज ये था कि मुस्लिम औरतें मदरसा जाती नहीं हैं. तो अल्लाह का नाम लेकर शाइस्ता जी आगे बढ़ीं और उनके कहने पर मदरसे के ऑनर से हसबैंड ने बात किया. उस मदरसे के ट्रस्टी अमरीका में रहते थें. शाइस्ता जी अपने बच्चों और पति के साथ मदरसा जब पहले दिन पहुंची तो उन्हें नहीं पता था कि वे जो कहानी सुना रही  हैं उसका लाइव प्रदर्शन अमरीका में भी हो रहा है और जो ट्रस्टी थे वो वहीँ से देख रहे थें. शाइस्ता जी जब कहानी सुनाने लगीं तो कहानी सुनाने का अंदाज़ बच्चों को इतना पसंद आया कि वे इतना इंज्वाय करने लगें कि उनको छोड़ ही नहीं रहे थें. एक हफ्ते बाद जब शाइस्ता जी के हसबैंड कॉलेज से घर आएं तो उन्होंने बताया कि "जो ट्रस्टी हैं उन्होंने कहा है कि जब आपको फुर्सत मिले आप मैडम को लेकर मदरसे में आईये और उनको कहिये कि वे दो घंटा बच्चों का क्लास भी लेंगी." और फिर शाइस्ता जी का वहां जाने का सिलसिला शुरू हो गया.


स्पेशल मोमेंट - बोलो ज़िन्दगी टीम की फरमाईश पर शाइस्ता अंजुम ने अपनी एक कविता व बच्चों के लिए तैयार की गयी एक कहानी सुनाई. उनके पति मो. रब्बान अली ने भी एक ग़ज़ल सुनाई, वहीँ उनकी बेटी आमना ने एक बॉलीवुड सॉन्ग सुनाया. ओवर ऑल इस फैमिली पैक प्रदर्शन को देखकर बोलो ज़िन्दगी टीम और स्पेशल गेस्ट के रूप में मौजूद एडवोकेट मधु श्रीवास्तव जी ने इस फैमिली की खूब प्रशंसा की. वहीँ जब मेहमाननवाजी के वक़्त शाइस्ता जी ने अपने हाथ की बनी एक डिश जर्दा (मीठा पुलाव) खिलाया तो उसके स्वाद से प्रभावित होकर मधु जी ने लगे हाथों उनसे इस डिश की पूरी रेसिपी सीख ली और कहा कि "मैं आज ही घर जाकर ये बनाने का प्रयास करुँगी."

(इस पूरे कार्यक्रम को बोलोजिन्दगी डॉट कॉम पर भी देखा जा सकता है.)








Monday, 9 December 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : लेख्य-मंजूषा की अध्यक्ष विभा रानी श्रीवास्तव की फैमली, रुकनपुरा, पटना




8 दिसंबर, रविवार की सुबह 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटना के रुकनपुरा इलाके में लेख्य मंजूषा की अध्यक्ष विभा रानी श्रीवास्तव जी के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में लघुकथा के पितामह कहे जानेवाले डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी भी शामिल हुयें. इस कार्यक्रम को सपोर्ट किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों विभा रानी जी की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.

फैमली परिचय- विभा रानी श्रीवास्तव जी का मायका सिवान जिले के मझवलिया गांव में है और ससुराल हुआ गोपालगंज के माणिकपुर में. उन्होंने बीएड और एलएलबी किया है. हसबैंड डॉ. अरुण कुमार श्रीवास्तव इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड से चीफ इंजीनियर के पद से सेवानिवृत हैं. एक बेटा है महबूब श्रीवास्तव जो अभी अमेरिका में इंजीनियर है. महबूब इंग्लिश में लिखते हैं. एक इंटरनेशनल संस्था है 'टोस्ट मास्टर' जिसमे वे जॉब से अलग विषयों पर लेक्चर देते हैं. बहु का नाम है माया शनॉय श्रीवास्तव जो साऊथ इंडियन है और बैंगलोर से बिलॉन्ग करती हैं. माया सीए हैं. विभा जी के घर का कॉन्सेप्ट था वन फैमली वन चाइल्ड इसलिए घर में लगभग सभी को एक ही बच्चे हैं.

लेखन की शुरुआत - विभा रानी जी की अभिव्यक्ति लेखन के रूप में डायरी के पन्नों पर बहुत पहले से जारी थी. लेकिन पूरी तरह से लेखन से जुड़ाव हुआ 2011 में जब ब्लॉग पर लिखना शुरू हुआ. ब्लॉग बनाने का आइडिया बेटे ने दिया था. उससे पहले विभा जी घर में सिलाई-बुनाई और पेपर ज्वेलरी बनाना सिखलाती थी. रूपसपुर गांव की निम्न वर्गीय परिवार की लड़कियां इनसे सीखने आती थीं. इससे पहले भी जहाँ कहीं रहीं क्लब खोलना, पेंटिंग सिखाना, एम्ब्रॉयडरी सिखाना जैसे काम करती रहीं. लेकिन जैसे जैसे इंटरनेट डेवलव हुआ और ब्यूटी पार्लर का कॉन्सेप्ट आया तो फिर इसमें लड़कियों की रूचि ज्यादा बढ़ी. चूँकि सिलाई-कढ़ाई में उन्हें कोई भविष्य नहीं नज़र आ रहा था. इसलिए धीरे-धीरे जब लड़कियों की संख्या कम होती गयीं और तभी विभा जी के हसबैंड की पोस्टिंग हो गयी थर्मल पावर बरौनी में जी एम  के पोस्ट पर. तो इन्हें पटना से वहां शिफ्ट होना पड़ा. फिर वहाँ इनकी ये सब एक्टिविटी लगभग बंद हो गयी. तबतक वे हाइकू लेखन से जुड़ चुकी थीं. यूँ तो कहा जाता है साहित्य की यह विधा जापान से आयातित है लेकिन विभा जी ने जो शोध किया है हरिद्वार, दिल्ली, लखनऊ जाकर तो यह राय बनी कि हाइकू यहीं से वहां गया होगा और वहां से मोडिफाइड होकर वापस भारत आया होगा. हाइकू के बाद विभा जी वर्ण पिरामिड, लघुकथा से भी जुड़ीं. 2011 में ब्लॉग शुरू किया 'सोच का सृजन' जिसमे कंटीन्यू लेखन आज भी जारी है. उसके पहले ब्लॉग था 'मृगतृष्णा' उसमे विभा जी अपनी अभिव्यक्ति लिखती थीं. लेकिन फिर नए ब्लॉग में एक-एक कर अपनी सभी साहित्यिक विधाओं को डालना शुरू किया.

साहित्यिक गतिविधियों की शुरुआत - विभा रानी बताती हैं, "2015 में हमलोग हाइकू और वर्ण पिरामिड की किताब दिल्ली के हिंदी भवन में लोकार्पण किये थें उसी समय यह तय हुआ था कि अगले साल 2016 में सौ साल पूरा हो रहा है हाइकू का तो उसका शताब्दी वर्ष मनाएंगे. कहा जाता है कि जब 1916 में रवीन्द्रनाथ टैगोर जापान यात्रा पर गए थें तो वहां के जो उन्होंने संस्मरण लिखें उसी में हाइकू की चर्चा थी कि जापान में ऐसे हाइकू लेखन पाए जाते हैं. उसी लिहाज से हमने 2016 को शताब्दी वर्ष माना. उस समय जब मनाने की योजना चल रही थी तो यह बात बनी कि एक पुस्तक भी लाया जाये. तो फिर मैंने सोचा चलो सौ हाइकुकार खोजते हैं पूरे देश में. संयोग से मेरे पास लगभग 125 हाइकू लेखकों कि रचनाएँ जमा हो गयीं. और फिर मैंने हाइकू की किताब छपवायी. जब लोकार्पण का समय आया उसी समय मेरे हसबैंड की तबियत थोड़ी खराब चलने लगी जिसकी वजह से दिल्ली जाकर सारा काम करना सम्भव नहीं हुआ. तो हुआ कि पटना कौन सा साहित्य की दृष्टि से कम महत्वपूर्ण है, इसलिए क्यों ना हमलोग पटना में ही आयोजन करें. तबतक मैं घर से ज्यादा बाहर नहीं जाती थी. इंरटनेट से पूरे विश्व का आइडिया था लेकिन अपने ही शहर में क्या हो रहा है तब यह आइडिया नहीं था. फिर भी मैं हाइकुकार खोजने के लिए आस-पास निकलने लगी उसी क्रम में मुलाकात हुई साहित्यकार डॉ. सतीश राज पुष्करणा जी से, अनीता राकेश, पूनम आनंद जी से. तो जब यहाँ लोकार्पण की बात हुई तो यह बात उठी कि एक मंच चाहिए क्यूंकि बिना मंच और बैनर का लोकार्पण करने का कोई मतलब नहीं है.


लेख्य-मंजूषा का आरम्भ - 22 जून 2016 को अचानक से फेसबुक पर खबर आयी कि दिल्ली में एक एनजीओ है जिसने घोषणा कर दी कि हाइकू और वर्ण पिरामिड का लोकार्पण होना है और पूरे देश से लोग जुट रहे हैं. और सभी लेखकों को मंच सम्मानित करेगा. तो उसी एनजीओ के रूप में विभा जी एवं उनसे जुड़े लोगों को एक बैनर मिल गया. उसी बैनर तले इनलोगों  ने 26 जून से काम करना शुरू कर दिया. इनको पटना में लोकार्पण करना था 4 दिसंबर को क्यूंकि उस दिन हाइकू दिवस होता है. प्रफेसर सत्यभूषण वर्मा जिन्होंने हाइकू के लिए बहुत सराहनीय कार्य किया हुआ है तो उन्ही के जन्म दिवस 4 दिसंबर को इनलोगों ने हाइकू दिवस के रूप में कन्वर्ट कर दिया. 4 दिसंबर के आयोजन को लेकर बैठकें होने लगीं, और 14 सितंबर से इनकी टीम ने मासिक गोष्ठी और त्रैमासिक कार्यक्रम की भी शुरुआत कर दी. लेकिन ये सारा काम उसी दिल्ली की संस्था के बैनर तले हो रहा था. जब दिसंबर नजदीक आने लगा तो इनलोगों ने दिल्ली वाले एनजीवो के हेड से कॉन्टेक्ट करके बैनर के लिए उनकी संस्था का लोगो और अन्य प्रक्रियाओं के लिए लेटर हेड मंगवाया तो उन्होंने यह कहकर इंकार कर दिया कि मेरे पास यह ऑथरिटी नहीं है कि मैं यह संस्था दिल्ली के अलावे बिहार में भी एक ब्रांच के रूप में खोल सकूँ. तो फिर सबको लगा कि ऐसे में तो हमारी इतने दिनों की सारी मेहनत बेकार हो जाएगी, सारे सदस्य हतोत्साहित हो जायेंगे. लेकिन अब ज्यादा समय नहीं बचा था विभा जी की टीम ने 4 दिसंबर का कार्यक्रम तो उसी एनजीओ के तहत किया लेकिन वहीं घोषणा कर दी कि हमलोग ये मंच छोड़ रहे हैं. और अपनी संस्था शुरू कर रहे हैं जिसके तहत हमलोगों का अपना कार्यक्रम होगा. और फिर तभी नई संस्था लेख्य-मंजूषा बन गयी लेकिन नामकरण में दो-चार दिन लग गएँ. जब बोलो ज़िन्दगी ने लेख्य-मंजूषा का अर्थ पूछा तो विभा जी ने बताया, "लेख्य का अर्थ हुआ लिखने योग्य और मंजूषा का अर्थ हुआ बक्शा या थैली. अब आप लेख्य मंजूषा का तातपर्य समझ ही गए होंगे."  इस संस्था में पूरे देश से लोग जुड़े हुए हैं. सतीश राज जी इस संस्था के अभिभावक हैं और उनके मार्गदर्शन में संस्था चल रही है. विभा जी के भइया सुनील कुमार श्रीवास्तव जो सिंचाई विभाग में इंजीनियर के पद से सेवानिवृत हैं जो साहित्य में रूचि रखते हैं. वे शुरू-शुरू में संस्था के संचालन में विभा जी को बहुत सहयोग किये थें.


लेख्य-मंजूषा के क्रियाकलाप - पहला कार्यक्रम 2017 जनवरी में हुआ मासिक गोष्ठी के रूप में. जनवरी से दिसंबर का इनका एक कैलेंडर है. एक महीना गध का काम होता है तो एक महीना पध पर काम होता है. और जो त्रैमासिक कार्यक्रम आता है वो भी एक बार गध तो दूसरी बार पध पर आधारित होता है. लेख्य मंजूषा का टैग लाइन है साहित्य और समाज के प्रति जागरूक करती संस्था. इसमें सिर्फ साहित्य के काम नहीं बल्कि सामाजिक कार्य भी होते हैं. उसके तहत आकांक्षा सेवा संस्थान जो झुग्गी-झोपड़ी के दलित बच्चों की शिक्षा पर काम करती है उसे हर महीने आर्थिक सपोर्ट करते हैं. वहां जब भी जरूरत होती है लेख्य-मंजूषा संस्था के लोग जाते हैं. अभी जो पटना में बाढ़ आयी थी टीम के सदस्यों ने शारीरिक सपोर्ट तो किया ही उसके साथ ही साथ फंड जुटाकर, कपडे, खाने-पीने के सामान, ब्लीचिंग पाउडर आदि का वितरण भी कराया. ठंढ में गरीबों को कंबल वितरण इत्यादि के कई कार्यक्रम चलते रहते हैं. पिछले दो साल से पटना पुस्तक मेले में संस्था अपने बैनर तले वहां साहित्यिक कार्यक्रम कर रहीं है. त्रैमासिक पत्रिका साहित्यिक स्पंदन भी निकलती है जिसमे पूरे देश के साहित्यकारों की रचनाएँ प्रकाशित होती हैं, जिसका सम्पादन विभा रानी ही करती हैं. संपादन में लगभग 8 पुस्तकें आ चुकी हैं, लघुकथा के 5, हायकू के दो और एक वर्ण पिरामिड की पुस्तक.
           अभी 4 दिसंबर को संस्था के वर्षगांठ कार्यक्रम में सामाजिक सन्देश देनेवाली एक शॉर्ट फिल्म 'षड्यंत्र' का प्रदर्शन भी हुआ जो विभा रानी जी की लघुकथा पर आधारित है. और इसके डायरेक्शन, म्यूजिक, सिनेमेटोग्राफी और एडिटिंग से लेकर एक्टिंग तक सभी हमारी ही संस्था के सदस्यों ने किया. पहले इसके निर्माण के लिए इन्होने मार्केट में प्रोफेशनल लोगों से सम्पर्क किया तो उन्होंने 45 हजार चार्ज बताया जो एक बार में शॉर्ट फिल्म के लिए देना इन्हे मुनासिब नहीं लगा. फिर जब फैसला हुआ कि ये लोग खुद ही फिल्म बनाएंगे और फिर इस फिल्म में शामिल 9 लोगों ने पांच- पांच सौ रुपये मिलाये और सिर्फ 45 सौ में लेख्य-मंजूषा की शॉर्ट फिल्म बनकर तैयार हो गयी. इससे संस्था के सदस्य और भी उत्साहित हुए.

नई पीढ़ी को सन्देश : विभा जी कहती हैं, "2013 में बेटे की शादी हुई तो इधर कुछ सालों से मेरी एक्टिविटी पुनः बढ़ी. मेरा मानना है कि कोई भी काम कभी भी किसी भी उम्र में किया जा सकता है. और मैं अपनी संस्था में मैं वैसे लोगों को जायदा से ज्यादा शामिल करती हूँ जो टैलेंट होते हुए भी कभी कुछ नहीं किये हों. कई वैसे लोगों को घर-जा-जाकर ढूंढा मैंने. तो जब मैं इस उम्र में सक्रीय रह सकती हूँ तो आप क्यों नहीं...?"

स्पेशल गेस्ट की मौजूदगी - इस कार्यक्रम में बतौर स्पेशल गेस्ट के रूप में उपस्थित लघुकथा के पितामह डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी ने भी विभा रानी श्रीवास्तव के प्रयासों की भूरी-भूरी प्रशंसा की और अपने संघर्ष के आरम्भिक दिनों के कुछ संस्मरण बोलो ज़िन्दगी के साथ साझा किए. फिर बोलो जिंदगी के रिक्वेस्ट पर विभा रानी और डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी ने अपनी लिखी हुई लघुकथाओं का पाठ करके सुनाया. मौके पर बोलो ज़िन्दगी के निदेशक राकेश सिंह 'सोनू' ने अपनी लिखी पुस्तकें "तुम्हें सोचे बिना नींद आये तो कैसे ?" और "एक जुदा सा लड़का" दोनों ही वरिष्ठ साहित्यकर्मियों को भेंट की.

(इस पूरे कार्यक्रम को बोलोजिन्दगी डॉट कॉम पर भी देखा जा सकता है.)













Wednesday, 4 December 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : शायरा ज़ीनत शेख़ की फैमली, फुलवारीशरीफ़, पटना



 1 दिसंबर, रविवार की शाम 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटना के फुलवारीशरीफ़ इलाके में शायरा ज़ीनत शेख़ जी के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में जीएसटी असिस्टेंट कमिश्नर एवं शायर समीर परिमल भी शामिल हुयें. इस कार्यक्रम को सपोर्ट किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों ज़ीनत जी की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.

फैमली परिचय- जीनत शेख़ शायरा, कवियत्री, फेसबुक आरजे हैं. मायका गिरिडीह, झाड़खंड में है. इनके पिताजी अब्दुल ज़लील मिर्ज़ा सीनियर एडवोकेट हैं. माँ नसीमा मिर्ज़ा गवर्नमेंट स्कूल में प्रिंसिपल रह चुकी हैं. ये एक भाई एक बहन हैं. भाई मिर्ज़ा ज़फर कोलकाता में आईबीएम कम्पनी में सॉफ्टेयर इंजीनियर हैं. ज़ीनत जी का ससुराल रोहतास जिले के विक्रमगंज में है. ससुर शेख़ मोबिन अहमद आर्मी में थें. सास समीमआरा हाउसवाइफ थीं. ज़ीनत जी के हसबैंड साबिर शेख़ पुलिस ऑफिसर हैं. उन्हें पुराने गीत गाने का शौक है. तीन बच्चे हैं. बड़ी बेटी सोबिया फातिमा एनएमसीएच पटना में एमबीबीएस सेकेण्ड ईयर की स्टूडेंट है. छोटी बेटी सानिया फातिमा डीएबी बीएसईबी में 12 वीं क्लास में है. बेटा अयान शेख़ रेडियंट इंटरनेशनल में 8 वीं क्लास में है.


शेरो -शायरी की शुरुआत कैसे हुई ? - ज़ीनत जी को बचपन से ही साइंस की जगह आर्ट्स में रूचि थी. खासकर साहित्य से बहुत लगाव था. तब स्कूल में उर्दू सब्जेक्ट नहीं था इसलिए घर में ही उर्दू ट्यूशन शुरू हो गया. हिंदी-उर्दू की बहुत सारी मैगजीन्स घर में आती थी और बचपन से ही पढ़ने का शौक लग गया. धीरे-धीरे इनका इंट्रेस्ट लिखने-पढ़ने में बहुत बढ़ता चला गया. शुरू में 2 लाइन की शायरी लिखा करती थीं. स्कूल की मैगजीन्स के साथ-साथ राष्ट्रीय पत्रिकाओं में भी रचनाएँ छपने लगीं.  गिरिडीह के वीमेंस कॉलेज से इंग्लिश लिटरेचर में ग्रेजुएशन किया उसके बाद शादी हो गयी. शादी बाद जब बच्चे हुए तो जिम्मेदारियों की वजह से लेखन का सिलसिला बंद हो गया. बच्चे जब बड़े व समझदार हुए, उनका वक़्त स्कूल में गुजरने लगा तो ज़ीनत जी ने फिरसे लिखना शुरू किया. एक दफा चार लाइनें इनकी बड़ी बेटी ने सुना तो कहा - मम्मी मोबाइल में एक ऐप है योरकुट ऐप तो आप क्यों नहीं उसमे लिखती हैं. बेटी ने योरकुट पर इनका एकाउंट बना दिया और उसपर ज़ीनत जी ने रोज लिखना शुरू कर दिया. उसपर बहुत सारे फॉलोवर्स हो गएँ. बहुत से लोग जानने लगें.

एचीवमेंट - जब योरकुट वालों ने पहला ओपेन माइक पटना में किया तो ज़ीनत जी को भी इन्वाइट किया. वहां पर उन्होंने एक कविता नारी पर सुनाई और सभी को बहुत पसंद आयी. फिर जब दूसरी बार ये आयोजन हुआ तो फिर मौका मिला. उसके बाद पेन ऑफ़ पटना के कार्यक्रम के कई एपिसोड इन्होने होस्ट किया. फिर इन्होने फेसबुक पर एमफोबिक पेज बनाया और उसपर ज़ीनत शेख़ के नाम से अपना प्रोग्राम शुरू किया. तो इसतरह से ये इण्डिया की पहली फेसबुक आरजे बन गयीं. उसके बाद विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं के साथ रेडियो -दूरदर्शन के प्रोग्राम के लिए निमंत्रण आने लगें. पहले शायरी ज्यादातर प्रेम के विषय पर लिखती थीं लेकिन अब ये चाहती हैं कि हर टॉपिक पर लिखें और खासकर समाज में बढ़ रही नफरतों के मौहौल में अपनी रफचनाओं के माध्यम से प्रेम का सन्देश देना चाहती हैं.  अबतक 25 -30 मुशायरा-कवि सम्मेलनों में हिस्सा ले चुकी हूँ. पीएजीएसी फाउंडेशन ने जब पटना की 10 सशक्त माँओं को सम्मान के लिए चुना तो उनमे से एक नाम ज़ीनत का भी था. हाल ही में काव्य योद्धा कार्यक्रम में प्रसिद्ध साहित्यकार भगवती प्रसाद दिवेदी जी के साथ जज की भूमिका के लिए भी इन्हे चुना गया. इसी साल पटना एम्स में पोयट्री कम्पटीशन हुआ था मेडिकल स्टूडेंट्स का तो उसमे भी इन्हें दो डॉक्टर्स के साथ बतौर निर्णायक जज सेलेक्ट किया गया था. अख़बारों में आज भी रचनाएँ छपती रहती हैं. समय-समय पर आकाशवाणी-दूरदर्शन के कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेती हैं.

फैमली मेंबर्स का टैलेंट - सोबिया फातिमा- पढ़ाई में तो अव्वल हैं ही उसके साथ-साथ सिंगिंग, डांसिंग, राइटिंग, पेंटिंग, कुकिंग, एम्ब्रायडरी का भी शौक रखती हैं. पटना एम्स में हुए फेस्ट में सारे मेडिकल स्टूडेंट्स के बीच हुए डिबेट में फर्स्ट आयी थीं. अपने स्कूल में बेस्ट ऑलराउंडर स्टूडेंट की ट्रॉफी मिली थी. दो साल लगातार स्कूल की हेड गर्ल भी बनाया गया.
सानिया फातिमा- लेखन एवं अभिनय के अलावा वो अच्छी स्पोर्ट्स गर्ल भी हैं. हमेशा स्कूल में रनिंग में फर्स्ट आती रही हैं.
अयान शेख़ - स्कूल के बेस्ट ओरेटर की ट्रॉफी जीत चुके हैं. स्कूल में हुए डिबेट कम्पटीशन में हमेशा फर्स्ट आते हैं. गाते भी अच्छा हैं. एसकेमेमोरियल में हुए कई कार्यक्रमों में सिंगिंग की है और सम्मानित भी हुए हैं.

फिर बोलो ज़िन्दगी टीम की मौजूदगी में इस फैमली ने अपना फैमिली पैक प्रेजेंटेशन दिया. जहाँ ज़ीनत शेख़ जी ने दो उम्दा गज़लें सुनायीं, उनके हसबैंड शेख़ साबिर जी ने अपनी दिलकश आवाज में दो सदाबहार गीत सुनाएँ. वहीँ इनके बेटे अयान ने कैलाश खेर का एक सूफी गीत सुनाया. बड़ी बेटी सोबिया फातिमा ने अपनी एक कविता एवं एक फ़िल्मी गीत सुनाया. और छोटी बेटी सानिया फातिमा ने एक शार्ट कॉमेडी एक्ट दिखाकर सभी को खूब हंसाया.
स्पेशल गेस्ट की टिप्पणी - इस कार्यक्रम में बतौर स्पेशल गेस्ट के रूप में उपस्थित शायर समीर परिमल जी ने अपनी टिप्पणी में जीनत शेख़ और उनके फैमिली मेंबर्स के टैलेंट की खूब सराहना की और कहा कि हम तो सभी का हुनर देख दंग रह गएँ. फिर आखिर में मजाकिया लहजे में ज़ीनत शेख़ के कुकिंग टैलेंट की तरफ इशारा करते हुए कहा कि - "यहाँ हर कला का डेमो दिखाया जा रहा है जिसके आधार पर हम अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं. लेकिन ज़ीनत जी जो इतना अच्छा खाना बनाती हैं अगर वो बनाकर खिलाएं तब तो हम कुछ खाने पर टिप्पणी करें." फिर एक जोर के ठहाके के साथ यही आम राय बनी कि किसी और दिन ज़ीनत जी के यहाँ फिरसे तशरीफ़ लाते हैं और उनके हाथों के बने लज़ीज व्यंजन चखते हैं. 

(इस पूरे कार्यक्रम को bolozindagi.com पर भी देखा जा सकता है.)
























Wednesday, 27 November 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : सोशल वर्कर विवेक विश्वास की फैमली, राजीवनगर, आशियाना-दीघा रोड, पटना




शनिवार, 23 नवंबर की शाम 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटना के आशियाना-दीघा रोड, राजीवनगर  इलाके में सोशल वर्कर विवेक विश्वास के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में ट्राई  संस्था में कार्यरत बिहार-झाड़खंड की हेल्थ डायरेक्टर अमरूता सोनी भी शामिल हुईं. इस कार्यक्रम को सपोर्ट किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों विवेक विश्वास की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.


फैमली परिचय- विवेक विश्वास राजीव नगर, दीघा-आशियाना रोड इलाके में रहते हैं जो एफएमसीजी में सेल्स ऑफिसर हैं. जॉब के दरम्यान ही राह में जो भी लावारिश व्यक्ति बीमार या घायल अवस्था में दिख जाये तो वे निस्वार्थ भाव से उसकी मदद करते हैं. चोट लगे पशु-पक्षियों की भी सेवा करते हैं. और इस काम के लिए विभिन्न संस्थाओं द्वारा विवेक सम्मानित भी हो चुके हैं. फैमिली में पापा श्री धर्मेंद्र कुमार हैं, भइया-भाभी हैं. भइया विकास कुमार रिटेल सेक्टर में हैं, अभी टाटा में स्टोर मैनेजर हैं. जॉब के अलावे इनके भइया विकास कुमार ब्लड डोनेशन के लिए पर्सनली काम करते हैं. खुद भी डोनेट करते हैं और उनके अंडर काम करनेवाले 150 लड़के हैं, जब भी जरूरत पड़े वे ब्लड डोनेशन को तैयार रहते हैं.  भाभी हॉउस वाईफ हैं. भइया की एक बेटी हुई है जो अभी 2 महीने की है. विवेक की हाल ही में सुमन कुमारी से शादी हुई है. इनकी बहनों का घर भी आस-पास के इलाके में ही है. बड़ी बहनों का नाम है रूचि रंजन और मनीषा. 

सेवा की भावना कब से जगी - विवेक हमेशा ट्रेन से सफर करते रहे हैं, नानी घर गया में है तो पटना - गया बहुत आना-जाना हुआ. उनका अपना पुस्तैनी घर हुआ लखीसराय में तो ट्रेन से ही आते-जाते थें. बचपन से ही जब किसी को देखते थें कि वो भूखा है, लावारिस सा गिरा पड़ा है, सिसक रहा है, उसको कोई देखनेवाला नहीं है तो वहीँ से भावना जगी कि अगर बड़ा हुए तो इनके लिए कुछ करेंगे. जब आठवीं कक्षा में थें तो एक पोस्टर पर स्लोगन देखें विवेकानद जी का कि "मैं उस प्रभु की सेवा करता हूँ जिसे ज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं." वो पंक्तियाँ बहुत गहरे से विवेक के जेहन में समा गयीं. जैसे-जैसे बड़े होते गएँ अच्छे लोगों का भी साथ मिलता गया और लोगों की सेवा बदस्तूर जारी रही.

सोशल वर्क की शुरुआत कैसे हुई - शिवपुरी में पहले विवेक जी का ब्वॉयस हॉस्टल चलता था, तब रोजाना 50-60 रोटियां बच जाने पर फेंकनी पड़ जाती थी. एक तो दिमाग में था कि बाहर कुछ लोग भूखे हैं और दूसरी ये कि इधर रोटियां नाली में डाली जा रही हैं. तो उन बची हुई रोटियों के इस्तेमाल के लिए विवेक ने एक आइडिया निकाला. तब  दो-ढ़ाई किलो आलू का भुजिया बनवाते थें और सबका चार-चार का बंडल बनाकर बाहर ले जाकर भूखों को बाँट देते थें. यह लगातार दो-तीन साल चला. लेकिन बॉयस हॉस्टल बंद होने के बाद ये काम बीच में बंद हो गया. उस दरम्यान रोटी का बंडल बनाकर जब बांटते थें तब देखते कि कोई बीमार है, चोट से कराह रहा है तो वैसे लोगों को पीएमसीएच में ले जाकर इलाज करा देते थें. तो निःसहायों की सेवा की आदत उसी समय से लगनी शुरू हो गयी. और तब से लेकर आजतक वो सिलसिला जारी है. विवेक ऐसे असहाय-लावारिस लोगों का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने लगें और लोगों से अपील करने लगें कि आप भी अपने आस-पास के ऐसे लोगों की मदद करें. अब इन्हें सामने से कॉल भी आते हैं कि कोई यहाँ बीमार है, कोई इंसान लावारिस हालत में पड़ा हुआ है, उसे देखनेवाला कोई नहीं है तो फिर विवेक वहां पहुँचते हैं, सरकारी एम्बुलेंस जो फ्री है को बुलाते हैं, सरकारी डॉक्टर जो फ्री में इलाज करने के लिए तैयार हैं, ऐसे लोगों के लिए सरकारी हॉस्पिटल पीएमसीएच में लावारिश वार्ड है जहाँ सारी दवाएं मुफ्त में मुहैया हो जाती हैं. लेकिन बहुत से लोग जो इनकी मदद करना चाहते हैं उनको जानकारी का आभाव रहता है तो उनको कैसे जागरूक किया जाये, उसके लिए ही ये ऐसे लोगों का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया के माध्यम से अवेयरनेस फैलाते हैं. विवेक की रिक्वेस्ट पर अच्छे समाजसेवक लोग अब खुद से आगे आने लगे हैं. अभी तक इन कामों के लिए चाहे वो कोई आम व्यक्ति हो या प्रशासनिक अधिकारी कभी किसी ने मना नहीं किया. रिस्पॉन्स अच्छा मिलता है. इससे एक फायदा ये भी होता है कि ऐसे कुछ विक्षिप्त लोग जो लावारिस हालत में अपने घर-परिवार से दूर हो गए हैं, सोशल मीडिया के माध्यम से जब उनके घरवालों को उनका पता चलता है तो वे उन्हें लेने भी आते हैं.


बेजुबां जानवरों के भी मसीहा - जब विवेक जी को पता चलता है या कोई कॉल कर के बताता है कि यहाँ एक गाय या कुत्ता बीमार पड़ा है, लहूलुहान है, दर्द से कराह रहा है तो विवेक वहां भी जानवरों की सेवा करने पहुँच जाते हैं. विवेक अबतक 15-20 जानवरों को हॉस्पिटल में एडमिट करा चुके हैं. ऐसे में उनके मित्र जो वेटनरी डॉक्टर हैं बंटी जी उनका बहुत सहयोग मिलता है. उन्हें कभी भी बुलाएँ वे हाजिर हो जाते हैं, रात के 10-11 बजे भी अगर कॉल चला जाये तो वे आ जाते हैं और निशुल्क सेवा देते हैं.

फैमिली की रोकटोक - फैमिली की रोकटोक चलती रहती है, इसलिए उनसे छुप-छुपाकर ये काम करना पड़ता है. भइया को विवेक के काम से नफरत नहीं है बल्कि उन्हें हमेशा डर लगा रहता है कि कहीं वे किसी लफड़े में ना फंस जाएँ. अच्छा करने के चक्कर में कहीं अपनी जिंदगी जोखिम में न डाल दें. कई लावारिस इंसान, जानवरों के शरीर से इतनी बदबू आती है, मख्खियां भिनभिनाती हैं, जहाँ लोग नाक बंद करके निकल लेते हैं, कोई उनके पास नहीं जाना चाहता. ऐसे में जब विवेक उनकी देखभाल करते हैं   तो उनके परिवार को भी ये भय लगा रहता है कि कहीं वे  भी किसी महामारी के चपेट में ना आ जाएँ. बड़ी बहनों ने बताया कि "वैसे विवेक काम तो बहुत अच्छा कर रहा है लेकिन बचपन से ही मानव सेवा का इसको इतना क्रेज है कि अगर इसे कोई घर का काम करने सौंपा जाये तो वे बीच रास्ते में असहाय लोगों को देखकर जिस काम से जा रहा है उसे भूलकर लोगों की सहायता में लग जाता है. इसलिए कभी-कभी उसे घर का ज़रूरी काम सौंपते हुए सबको हिचक भी होती है." विवेक के घरवाले इस बात पर भी नाराज रहते हैं कि रोजाना टिफिन ले जाने के बावजूद ये खुद ना खाकर किसी ना किसी को खिला देते हैं और जब रात में घर आते हैं तो पता चलता है कि ज्यादा देर भूखे रहने की वजह से एसिडिटी की प्रॉब्लम हो गयी. इस बाबत विवेक कहते हैं कि "मेरे पास खाना है और हम किसी भूखे को देखकर नज़र फेरकर चले जाएँ यह दिल इजाजत नहीं देता. और यही वजह है कि मेरी पत्नी भी मेरे से नाराज़ होती है कि लोगों की सेवा करते हुए खुद को बीमार क्यों कर लेते हैं. और यह काम हम अपना जॉब छोड़कर नहीं करतें बल्कि मेरा मार्केटिंग का काम है, दिनभर रोड पर ही आना-जाना लगा रहता है तो राह चलते अगर हम लावारिस लोगों के कुछ काम आ भी गएँ तो उससे मुझे क्या हानि होगी ?"

स्पेशल गेस्ट की टिप्पणी - इस कार्यक्रम में बतौर स्पेशल गेस्ट के रूप में उपस्थित ट्राई की हेल्थ डायरेक्टर अमरूता सोनी ने बोलो ज़िंदगी टीम के साथ विवेक जी की कहानी से रूबरू होने पर विवेक जी की तारीफ करते हुए कहा कि "एक लावारिस का दर्द क्या होता है वह मैंने बहुत करीब से देखा है इसलिए मैं समझ सकती हूँ कि ऐसे रह चलते लावारिसों की सेवा तो दूर लोग जल्दी उनके आस-पास भी नहीं फटकते हैं. ऐसे में विवेक जी निस्वार्थ भाव से इनकी मदद को तैयार रहते हैं तो यह बहुत बड़ी बात है. इंसान ही नहीं बीमार और लाचार जानवरों के दर्द को देखकर भी विवेक जी का दिल धड़कता है तो इससे ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये कितने नेकदिल इंसान होंगे. मैं यही कहना चाहूंगी कि यह काम आप आगे भी जारी रखिये चाहे कितनी ही परेशानियाँ क्यों न आएं, क्यूंकि एक तो दूसरे लोग भी जागरूक होंगे और ऐसे असहायों की सेवा से ईश्वर की भी दुआ मिलती है."
(इस पूरे कार्यक्रम को bolozindagi.com पर भी देखा जा सकता है.)

Friday, 15 November 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : फ्लूट आर्टिस्ट बीएमपी जवान विष्णु थापा की फैमली, अनीसाबाद , पटना



शुक्रवार,15 नवंबर को 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटना के अनीसाबाद इलाके में फ्लूट आर्टिस्ट विष्णु थापा के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में एक्टर एवं डांस टीचर विकास मेहरा भी शामिल हुयें. इस कार्यक्रम को स्पॉन्सर्ड किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों विष्णु थापा की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.

फैमली परिचय- विष्णु थापा बिहार पुलिस के अंतर्गत आर्मर के रूप में बी.एम.पी.1 गोरखा बटालियन में तैनात हैं जिनका काम है हथियारों की जाँच-परख करना. ये अगस्त 2002 में बहाल हुए थें. सिलीगुड़ी से बिलॉन्ग करते हैं. इनका एक घर नेपाल के जनकपुर में भी है. चूँकि इनका परिवार बिहार में है तो वहां बहुत कम आना-जाना होता है. इनके पिताजी का स्वर्गवास हुए तीन साल हो गए हैं. इनकी माँ दीदी के पास जनकपुर में रहती हैं. विष्णु जी दो भाई दो बहन हैं. बहनों की शादी हो चुकी है. इनके भइया कविराज आर्मी में हैं, दानापुर में पोस्टेड हैं. विष्णु जी ने बहुत कम उम्र में ही लव मैरेज कर ली थी. इनका ससुराल पटना,बिहार में ही है. इनकी पत्नी बसंती देवी का जन्म एवं परवरिश यहीं पटना में हुई है. इसलिए वो इनसे ज्यादा अच्छी भोजपुरी बोल लेती हैं. विष्णु जी का बड़ा बेटा तिलक कुमार थापा संत कैरेंस में 12 वीं का स्टूडेंट है तो छोटा बेटा रोहित थापा एस.राजा स्कूल में 8 वीं क्लास में है.

https://www.youtube.com/watch?v=G6NN91EV3PE&t=8s

संगीत से जुड़ाव - म्यूजिक में बचपन से शौक था. 15 साल से बांसुरी वादन कर रहे हैं. इनके गुरु जी हैं बजेन्द्र सिंह जी जो पंजाब से बिलॉन्ग करते हैं और बहुत बड़े फ्लूट आर्टिस्ट हैं. ये ऑनलाइन उनको ही फॉलो करते हुए सीखते हैं. शुरुआत में बीएमपी के ही सुखबीर भइया से बेसिक सीखा था. पहले जब बचपन में बहुत सारा सॉन्ग सुनते थें तो उसमे बांसुरी की धुन बहुत ज्यादा पसंद आती थी. कृष्ण भगवान के भजन भी बहुत सुना करते थें तो फिर बांसुरी वादन के प्रति आकर्षित हुए. फिर पहले खुद से ही सीखने लगें. विष्णु जी बताते हैं- बांसुरी वादन को शास्त्रीय संगीत में ही लिया जाता है. जब आप राग वगैरह सारी चीजें सीख लेते हैं तो उन्ही रागों के आधार पर आप खुद भी स्वरों की रचना कर सकते हैं.

स्ट्रगल- मैट्रिक तक की पढ़ाई सिलीगुड़ी में हुई फिर पुलिस सेवा में आ गएँ और पहली पोस्टिंग बिहार में हुई. विष्णु जी के परिवार में इससे पहले किसी का सरकारी जॉब नहीं था. इनका पहले प्रयास में ही जॉब हो गया. पुलिस का जॉब ही क्यों...? यह पूछने पर थापा जी बताते हैं, "क्यूंकि मेरा शौक था कि देश के लिए कुछ करें.चाहे संगीत के माध्यम से या सरकारी सेवा के माध्यम से देश का नाम रौशन करूँ." ये मीडिल क्लास फैमली से हैं तो जानते हैं कि ऐसे में जॉब कितना मायने रखता है. परिस्थितियां इनको सरकारी सेवा में ले आयी. पुलिस जॉब और म्यूजिक दोनों अलग-अलग क्षेत्र है फिर भी विष्णु जी बैलेंस कर लेते हैं.

अब तक कला का प्रदर्शन - बिहार के बहुत से सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे सोनपुर महोत्सव, राजगीर महोत्सव, पाटलिपुत्र महोत्सव, और पुलिस विभाग के जितने भी कार्यक्रम हैं उसमे अवसर मिलता रहा है. दूरदर्शन अदि के कई कार्यक्रमों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं.

समझते हैं संयुक्त परिवार का महत्व - कभी कभी फेस्टिवल और बच्चों की स्कूली छुटियों के समय जब विष्णु जी की पूरी फॅमिली पटना इनके घर पर इकट्ठी होती है. बहन और बहनोई भी यहाँ आ जाते हैं तो सभी को एक भरे-पूरे परिवार में इंज्वाय करते हुए बहुत अच्छा लगता है. फिर थापा जी ने बोलो जिंदगी टीम से अपने बीवी-बच्चों और सिलीगुड़ी से आयी हुई अपनी बहन, जीजा और ससुर जी से मिलवाया. अपने भइया से भी मिलवाया. जब बोलो जिंदगी टीम की तबस्सुम ने पूछा- "आप अरसे से बिहार में हैं, ससुराल भी यहीं है तो अब आप खुद को नेपाली कहलाना पसंद करते हैं या बिहारी..?" थापा जी का सॉलिड जवाब आया - "मैं खुद को हिंदुस्तानी कहलाना पसंद करता हूँ क्यूंकि हिंदुस्तानी देश के किसी कोने में भी रह सकते हैं."


जब मजाक में ही तबस्सुम ने पूछा- "संगीतकार लोग तो बहुत सॉफ्ट दिल के होते हैं, ऐसे में जब आपको क्रिमनल मिल जाते होंगे तो आप कहाँ उन्हें पकड़ते होंगे ? आप तो उसको बांसुरी सुनाकर छोड़ देते होंगे." सभी हंस पड़ें. थापा जी हंसकर बोले - "ऐसा नहीं है, हमलोग शपथ लिए होते हैं.... भले ही हम गाने-बजाने का शौक रखते हैं लेकिन जब देश सेवा की बात आती है तो हम पीछे नहीं हटते." 


लाइव परफॉर्मेंस -  फिर बोलो जिंदगी टीम के सामने जब थापा जी ने बांसुरी वादन शुरू किया तो बोलो जिंदगी के निदेशक राकेश सिंह सोनू ने उनसे एक विशेष फरमाईस की कि " पहले आप मेरी पसंद का एक सॉन्ग हाफ गर्लफ्रेंड फिल्म से 'मैं फिर भी तुमो चाहूंगा....' की धुन बजाकर सुनाएँ क्यूंकि आपके माध्यम से यह सॉन्ग मैं अपनी प्रेमिका को डेडिकेट करना चाहता हूँ."  और फिर.... सच में उनकी बांसुरी की धुन सुनकर सभी भावुक हो गएँ. कुछ और अपनी पसंदीदा गीतों पर थापा जी ने बांसुरी की धुन सुनाई जो एकदम रूह को छूकर निकल रही थी.


स्पेशल गेस्ट की टिप्पणी - इस कार्यक्रम में बतौर स्पेशल गेस्ट के रूप में उपस्थित एक्टर एवं डांस टीचर विकास मेहरा जी ने बोलो ज़िंदगी टीम के साथ विष्णु जी का टैलेंट देखकर उनकी खुलकर तारीफ करते हुए कहा कि "पारिवारिक जिम्मेदारियों तले दबे होने के बावजूद भी ये दोनों क्षेत्रों के साथ न्याय कर रहे हैं. अपनी कला को कभी मरने नहीं दिए ये बहुत बड़ी बात है. और आज भी संयुक्त परिवार से जुड़े हुए हैं और उसका महत्त्व समझते हैं."

(इस पूरे कार्यक्रम को बोलोजिन्दगी डॉट कॉम पर भी देखा जा सकता है.)























Saturday, 9 November 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : रंगकर्मी एवं नर्तक कुमार उदय सिंह की फैमिली, पूर्वी लोहानीपुर, पटना






दीपावली के पहले 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू' एवं प्रीतम कुमार के साथ) पहुंची पटना के पूर्वी लोहानीपुर इलाके में 'द लिपस्टिक ब्वाय' फेम रंगकर्मी एवं नर्तक कुमार उदय सिंह के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में वरिष्ठ रंगकर्मी एवं उद्घोषिका सोमा चक्रवर्ती भी शामिल हुईं. इस कार्यक्रम को स्पॉन्सर्ड किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों कुमार उदय की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.

फैमली परिचय- नालंदा जिले से बिलॉन्ग करनेवाले कुमार उदय सिंह रंगकर्मी एवं नर्तक हैं और विशेषकर 'लौंडा नाच' के लिए ख्याति बटोर चुके हैं. अब उनकी जीवनी पर एक फिल्म भी बन रही है 'द लिपस्टिक ब्वाय'. उदय सिंह के पिता जी का नाम है श्री नन्दलाल यादव और माता जी का नाम है सुंदरी देवी. जब एक-डेढ़ साल के थें तभी माँ का देहांत हो गया था. ये दो भाई हैं. अभी पटना स्थित फैमली में इनकी पत्नी सोनी कुमारी, भाभी मंजू देवी, भतीजा सोनू कुमार, सौरभ कुमार और एक चार साल का बेटा आलेख राज है.

उनके जीवन पर कैसे बनी फिल्म 'द लिपस्टिक ब्वाय' ? - एकबार कुमार उदय एनएसडी गए थें एक नाटक लेकर, वहां एक डायरेक्टर थें मुंबई के अभिनव ठाकुर जी, वो कुछ काम से वहां आये थें. इनसे मिलें तो पूछें- "आप लौंडा नाच कबसे करते हैं ?" कुमार उदय ने बताया कि "बचपन से ही.... तब घर में भी बहुत मार पड़ता था, समाज में भी बहुत कुछ सुनने को मिला. लौंडा, मउगा और न जाने क्या क्या..? लोग अच्छी दृष्टि से नहीं देखते थें. फिर भी हम लगातार करते रहें." इसपर वे बोलें कि "25-30 साल की जर्नी में जो इतना कुछ सहे हैं तो आपके जीवन पर हम बायोपिक बनाएंगे." फिर वे सहमति देने के बाद कुमार उदय की पूरी कहानी रिकॉर्ड करके 2 साल पहले ले गए थें. और अब वो आकर बोलें कि "हमको एक प्रोड्यूसर मिले हैं अमिताभ बच्चन जी के मेकअप मैन दीपक सावंत जी, वे आपकी जीवनी पर फिल्म बनाना चाहते हैं और उनको आपकी स्क्रिप्ट पसंद आयी है." फिर मुंबई से लोग आएं और फिल्म का शूट हुआ. कुमार उदय ने बोलो ज़िन्दगी को यह जानकारी दी कि वो स्क्रिप्ट चार फिल्म फेस्टिवल में सलेक्ट हो चुकी है. फिल्म के नाम के बारे में जब पूछा गया कि 'द लिपस्टिक ब्वॉय' ही नाम आखिर क्यों ? कुमार उदय ने बताया कि "डायरेक्टर साहब बोलें, तुम्हारे अनुसार जब एक लड़के का लड़की बनकर डांस करना मुश्किल काम है तो लिपस्टिक लगाना उसके लिए कितना मुश्किल होगा. इसलिए इस फिल्म का नाम पड़ा 'द लिपस्टिक ब्वॉय'." इस फिल्म में उदय भी थोड़ा बहुत एक्टिंग किये हैं लेकिन इनका रोल मनोज पटेल जी ने किया है. फिल्म 2020 में नवंबर तक बनकर रिलीज हो जाएगी.


कला जगत से जुड़ाव - उदय गांव में बचपन से नाच वगैरह होते देखते थें तो खुद भी करते थें. कहीं भी गाना सुनने को मिल जाता तो नाचना शुरू हो जाता. पिताजी को अच्छा नहीं लगता था, मारने-पीटने लगते थें. बोलते - "घर में कोई ऐसा नहीं है, तुम नचनिया-बजनिया बनोगे, कहाँ से आ गए हो तुम हमारे खानदान में..!" फिर उदय के बड़े भाई को बोलें कि "इसको पटना ले जाओ साथ में रखना और पढ़ाना. यहाँ नहीं पढ़ पायेगा, नाच-गाना में ही रह जायेगा." फिर उदय के भइया पटना लेकर उनका एडमिशन कराएं 7 वीं क्लास में. लेकिन यहाँ भी पढाई से ज्यादा कल्चरल प्रोग्राम में मन लगता. हमेशा इंतज़ार में रहतें कि कब 15 अगस्त, 26 जनवरी, सरस्वती पूजा आये. इनमे आगे रहते थें, टीचर को भी अच्छा लगता था, प्रोत्साहन मिलता था. लेकिन घर से सपोर्ट नहीं मिलने के कारण सीख नहीं पाएं कहीं, बस खुद से ही करते जाते थें. एक बार अख़बार में निकला कि कुमार उदय ने बहुत अच्छा डांस किया तो यह बात उनके भइया को पता चल गयी और वो पापा को बोल दिए. उस वक़्त 8-9 वीं में थें. तब फिर पापा आएं और गुस्से में बोलें कि "क्या है ये, फिर नाचने-गाने लगा तुम, कैसे निकल गया अख़बार में, ये अच्छा काम कर रहे हो कि ऐसा खबर छप रहा है...?" तब उदय बोले- "अच्छा काम ही तो है डांस करना तभी तो पेपर में निकला." लेकिन फिर पिटाई हुआ और उनके पापा बोलें "अब तुम्हें कहाँ भेजें...? गांव से तो पटना शहर में भेजें. तुम नहीं सुधरोगे." उदय ने कहा- "अच्छा ठीक है, अब से नहीं करेंगे." पापा चले गएँ. कुमार उदय ने इंटर में कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स में एडमिशन लिए. वहां मगध यूनिवर्सिटी का 'तरंग' कार्यक्रम होता था. उसमे भाग लिए तो 2002 में डांस में गोल्ड मैडल जीतें और तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा सम्मानित हुए. जब पापा सुनें कि यूनिवर्सिटी में पूरे कॉलेज में ये जीता है, अच्छा किया है तभी तो राष्ट्रपति से सम्मानित हुआ है. तब उनमे थोड़ा परिवर्तन देखने को मिला. वे बोलें- "ठीक है करो, लेकिन वो वाला डांस नहीं करना साड़ी पहनकर जो करते हो. सब हँसता है." लेकिन फिर भी उदय वो करते रहते थें छुप-छुपाकर. तब उन्होंने  सुन रखा था कि बिहार का लौंडा नाच पहला नाच है, ये भोजपुर जिले में ज्यादा लोकप्रिय है. और भोजपुरी के सेक्सपियर कहे जानेवाले भिखारी ठाकुर जी ने भी इस नाच को आगे बढ़ाया था. यही सोचकर कि जब वो कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं, उन्होंने जारी रखा और ये सब करते हुए बहुत सारे शो करने का मौका मिला. बिहार गौरव गान जो 18 -20 मिनट का गाना है उसमे बीच में लौंडा नाच भी है जिसे कुमार उदय करते हैं. इनकी प्लानिंग ये है कि इस लौंडा नाच को पूरी दुनिया में लोकप्रिय बनायें.


अचीवमेंट -  2006 में हुए युवा महोत्सव में कुमार उदय ने फर्स्ट किया था, मुख्यमंत्री भी प्रभावित हुए थें इनका खास नृत्य देखकर. बिहार गौरवगान का शो 2006 से अभी तक ये करते आ रहे हैं. 2008 में मॉरीशस गएँ जहाँ इनके ग्रुप का लौंडा नाच देखकर प्रधानमंत्री चकित रह गएँ. एक रोज भिखारी ठाकुर जी के नाती ने लेटर भेजा कि आपको भिखारी ठाकुर सम्मान मिलेगा. तभी से कुमार उदय ने ठान लिया कि इस नाच को, कला को आगे बढ़ाना है और जबतक सांसें रहेंगी तबतक वे इसको करते रहेंगे. उदय चाहते हैं कि इसमें भी युवा आगे आएं, इसको बढ़ाएं. ये खराब डांस नहीं है, बस इसको बिहार सरकार की तरफ से कोई सपोर्ट नहीं मिल रहा है. 2008 में इसी डांस में कुमार उदय भारत सरकार से स्कॉलरशिप लिए. इसी डांस में 2017 में फेलोशिप भी मिला. पहली बार होली के पहले ये लालकिला में नृत्य प्रस्तुत किए. संस्था 'प्रांगण' की तरफ से बहुत तरह के नाटक, नृत्य सब करते रहें. लगभग 60 से ऊपर नाटक कर चुके हैं. डांस की वजह से ही रंगमंच से जुड़ाव हो गया. लौंडा डांस के बिना 'विदेसिया' अधूरा है. इसी तरह महिला कैरेक्टर में ये लोकप्रिय हुए. एक सीरियल 'दुनिया नाच पार्टी' जो जी- पुरवैया पर आता था जिसमे 100  एपिसोड से जायदा काम किए. सीरियल में ये किन्नर बनें थें और लौंडा नाच सबको बहुत पसंद आया था.

नाराज पत्नी को कई बार मनाना पड़ा - 2011 में पापा ने जानबूझकर इनकी शादी कर दी यह सोचकर कि शायद अब सुधर जायेगा नहीं तो लगता है ये नाच- गाना करता ही रह जायेगा, कुछ जीवन में करेगा नहीं. फिर उनके दबाव से शादी करनी पड़ी. लेकिन फिर भी लौंडा नाच नहीं छोड़ें. ससुराल गएँ तो वे लोग भी बोलें कि "छोड़ दीजिये महाराज, अलग कोई नौकरी कीजिये." बहुत मुश्किल से कुमार उदय उनको समझाएं. जब पत्नी आयीं शादी बाद तो बहुत लड़ाई करतीं कि "क्या आप ये सब करते हैं ? हम छोड़कर भाग जायेंगे, ये सब बंद करिये." कई बार भागा-भागी भी हो गया. तब कुमार उदय ने पत्नी को समझाते हुए कहा - "मेरी पहली पत्नी कला है, दूसरी तुम हो. पहले कला को मान देंगे फिर तुमको. जब तुम कला को एक्सेप्ट करोगी तब हमको भी कर पाओगी."


स्पेशल गेस्ट की टिप्पणी - इस कार्यक्रम में बतौर स्पेशल गेस्ट के रूप में उपस्थित वरिष्ठ रंगकर्मी सोमा चक्रवर्ती जी ने बोलो ज़िंदगी टीम के साथ कुमार उदय का नृत्य और अभिनय देखा और जितना उनके बारे में जानती हैं उस आधार पर अपना मंतव्य दिया कि "लौंडा नृत्य जो आज के समय में विलुप्त होने के कगार पर है, ऐसी संस्कृति, ऐसी लोककला को कुमार उदय आज भी अगर जीवित रखे हुए हैं तो यह हटकर और बहुत सराहनीय काम हुआ. इसके लिए बहुत हिम्मत और जिगर की ज़रूरत पड़ती है. और मैंने उदय के संघर्ष को करीब से देखा है तो मुझे पता है कि इन्होने क्या कुछ झेला है. तभी तो आज इनकी जीवनी पर बॉलीवुड में एक फिल्म भी बन रही है जो कि हमसब के लिए बहुत ख़ुशी कि बात है."

(इस पूरे कार्यक्रम को बोलोजिन्दगी डॉट कॉम पर भी देखा जा सकता है.)



















Friday, 11 October 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : 'बीइंग हेल्पर' के फाउंडर शुभम कुमार 'सन्नी', राजीवनगर, पटना


पिछले हफ्ते 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटना के राजीवनगर इलाके में बीइंग हेल्पर टीम के फाउंडर व युवा समाजसेवी शुभम कुमार 'सन्नी' के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में जानेमाने चिकित्स्क एवं सोशल एक्टिविस्ट डॉ. दिवाकर तेजस्वी भी शामिल हुयें. इस कार्यक्रम को स्पॉन्सर्ड किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों शुभम की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.
https://www.youtube.com/watch?v=AhktzrP6-Gs

फैमली परिचय- बिहार के भागलपुर से ताल्लुक रखनेवाले सोशल वर्कर एवं बीइंग हेल्पर के फाउंडर शुभम कुमार 'सन्नी' एक सिविल इंजीनियर हैं. एलएनटी, बैंगलोर में साढ़े चार साल जॉब कर चुके हैं.  बाइक राइडिंग में लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में नाम दर्ज करा चुके हैं. डांस का भी बहुत शौक है, कभी बूगी-बूगी में भी हाथ आजमा चुके हैं. उनकी पत्नी दीपशिखा पहले हिंदुस्तान लिवर कम्पनी, बैंगलोर  में काम करती थीं. वहां ढ़ाई साल जॉब करने के दौरान टीम लीडर भी रहीं. शुभम के पापा अमरेंद्र सिंह रियल स्टेट में हैं. माँ शोभा सिंह गृहणी हैं. पहले इनके पापा-मम्मी दोनों ही जॉब करते थें. माँ शोभा सिंह डबल एम ए की हैं. भइया कुमार आनंद लोयला स्कूल का टॉपर था और भूतपूर्व राष्ट्रपति ए पीजे अब्दुल कलाम द्वारा सम्मानित हो चुके हैं.


समाज सेवा से जुड़ाव - शुभम की पत्नी का बैंगलोर में ही जब एक्सीडेंट हुआ और कोई देखरेख करनेवाला नहीं था तो वे पत्नी संग पटना शिफ्ट हो गएँ. पटना में उन्हें कोई ऐसा कंस्ट्रक्शन कम्पनी नहीं दिखा जिसे ज्वाइन कर सकें तो फिर पापा के ही रियल स्टेट वर्क में जुड़कर छोटा सा काम शुरू किए. इस काम के बावजूद शुभम को दिनभर में बहुत टाइम मिल जाता था. तो टाइमपास घर में यूँ ही टीवी देखकर करते थें. तभी ख्याल आया कि कुछ किया जाये. फिर 15 अगस्त 2018 के दिन एक-दो लोगों के साथ वाईफ को लेकर एक स्लम एरिया में गएँ और वहां के बच्चों को जलेबी खिलाई. उनकी ख़ुशी देखकर उन्हें एहसास हुआ कि समाज के ऐसे लोगों के लिए हमे कुछ करना चाहिए. तब वाईफ को एक एक्सीडेंट की वजह से बच्चा नहीं हो पा रहा था. बहुत जगह दिखाएँ और बहुत पैसा भी खर्चा हुआ. लेकिन जैसे ही सोशल वर्क शुरू किए तीन महीने बाद ही गुड न्यूज सुनने को मिली और आखिर में उनकी पत्नी माँ बन पायीं. शुभम कहते हैं, "समझ लीजिये कि मदद किये गए लोगों की मुझे दुआएं लग गयीं. उसके बाद से ही मैं हर दिन कम-से-कम 2 घंटा सोशल वर्क के लिए देने लगा."

बीइंग हेल्पर टीम के बारे में - अभी टीम में 166  सक्रीय मेंबर हैं. सारे ग्रुप मेंबर चाहे वो वर्किंग पीपुल हों या स्टूडेंट्स जब भी फ्री होते हैं अपना योगदान देने आ जाते हैं. पटना के साथ-साथ बीइंग हेल्पर का सेटअप मुंगेर, भागलपुर और दिल्ली में भी जल्द शुरू होने जा रहा है. ये किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं लेते. बीइंग हेल्पर का मुख्य काम है गरीब, बेसहारा लोगों की मदद करना, स्लम एरिया के बच्चों को पढ़ाना. स्लम के बच्चों को पढ़ाने के लिए अभी खाजपुरा में एक स्कूल भी ओपन किया गया है. बहुत ही ज्यादा गरीब लोगों को ढूंढकर हर महीना इनकी टीम राशन भी मुहैया कराती है. बहुत बड़ी संख्या में लोगों का और बहुत सी संस्थाओं का भी सपोर्ट मिल रहा है. मुजफ्फरपुर के चमकी बुखार से पीड़ित बच्चे हों या पटना का बाढ़ग्रस्त इलाका टीम ने बहुत अच्छा वर्क किया.  पटना के डूबे इलाकों में कुछ लोगों के सपोर्ट से अबतक लगभग 10 हजार लोगों तक राहत सामग्री पहुंचा चुके हैं.

शुभम का स्ट्रगल - एक समय ऐसा आया कि घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गयी थी. पापा-मम्मी का जॉब छूट गया था और फिर परिवार को बहुत स्ट्रगल करना पड़ा. फिर धीरे धीरे जब शुभम के पापा रियल स्टेट में चले आएं और शुभम को उनके भइया पढ़ने के लिए बैंगलोर बुला लियें तो कुछ स्थिति में सुधार हुआ. सुभम का मैथेमैटिक्स मजबूत था तो पूरा इंजीनियरिंग इन्होने बैंगलोर में बच्चों को कोचिंग पढ़ाकर कम्प्लीट किया. उसके बाद वहीँ एलएनटी कम्पनी में जॉब किए.

https://www.youtube.com/watch?v=RWyCRn4V3RM&t=3s

स्पेशल गेस्ट की टिप्पणी - इस कार्यक्रम में बतौर स्पेशल गेस्ट के रूप में उपस्थित हुए डॉ. दिवाकर तेजस्वी जी शुभम और उनकी फॅमिली से मिलकर बहुत प्रभावित हुयें. उन्होंने शुभम के ज़ज़्बे और उसकी सेवा भावना को देखकर कहा कि "ऐसे युवाओं को देखकर हमलोगों को भी बहुत एनर्जी मिलती है."

(इस पूरे कार्यक्रम को बोलोजिन्दगी डॉट कॉम पर भी देखा जा सकता है.)
















Sunday, 22 September 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : डांस टीचर नवीन की फैमिली, खगौल, पटना




21 सितंबर, शनिवार की शाम 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटना के खगौल इलाके में 'ओपन लाइफ डांस एकेडमी' के ऑनर नवीन कुमार के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में एमवे कम्पनी में कार्यरत और Iconoclasts Sports & Entertainment Pvt Ltd कम्पनी के ऑनर अजय झा भी शामिल हुयें. इस कार्यक्रम को स्पॉन्सर्ड किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों नवीन कुमार की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.

फैमली परिचय-  पापा श्री कृष्णा प्रसाद रेलवे में जॉब करते थें अब रिटायर्ड हैं. माँ संध्या देवी गृहणी हैं, भाई नितीश कुमार अभी कम्पटीशन की तैयारी कर रहे हैं. दो बहने हैं जिनकी शादी हो चुकी है. परिवार में किसी को डांस में रूचि नहीं थी लेकिन नवीन को देखते-देखते उनकी भतीजी रतन प्रिया जो अभी 5 वीं में है डांस सीखने लगी. नवीन को शुरू से ही फैमिली सपोर्ट मिला है.

ओपन लाइफ डांस एकेडमी की शुरुआत - नवीन फिजिक्स ऑनर्स से ग्रेजुएशन करने के बाद डांस के क्षेत्र में ही रम गएँ. चार-पांच सालों से डांस सीख रहे थें. पहले एक फ्रेंड की एकेडमी में डांस सिखाते थें लेकिन बाद में कुछ मनमुटाव होने के बाद वहां छोड़कर खुद की डांस एकेडमी शुरू की. रोहित पार्टनर के रूप में साथ दे रहे हैं. इनके एक भइया हैं विशाल यादव उनके सपोर्ट से ही इन्होने एकेडमी खोली. पहले दूसरे एकेडमी में जहाँ बच्चों को सिखाते थें फिर जब छोड़ दिए तो उन्ही बच्चों में से कुछ ने कहा कि "सर आप अपना एकेडमी खोलिये हमलोग आपसे वहां सीखने आएंगे." क्यूंकि पहले वाली एकेडमी में बच्चे संतुष्ट नहीं थें, वहां के टीचर से वे खुश नहीं थें. जब पहलेवाली डांस एकेडमी छोड़ी तब नवीन को बहुत अकेलापन महसूस हुआ. बच्चों को सिखाते थें तो उनके साथ की उन्हें आदत पड़ चुकी थी. जब खाली होकर घर बैठ गएँ तो वही बच्चे अक्सर पूछा करते कि "सर अपना डांस एकेडमी आप कब खोल रहे हैं...?" फिर उसी वक़्त विशाल यादव मिलें और उन्होंने अपने स्कूल में नवीन को डांस सिखाने का ऑफर किया. फिर उनके सलाह पर ही नवीन ने खुद की एकेडमी भी खोली. उन्होंने ही जगह दिलाई और करीब एक साल तक एकेडमी का किराया भी नहीं लिया. फिर जैसे-जैसे नवीन के पास स्टूडेंट बढ़ते गएँ उन्होंने कुछ किराया देना चालू किया. एकेडमी में 3 साल के बच्चों से लेकर 25 साल तक के युवा भी हैं. नवीन एकेडमी क्लास में हिप हॉप, क्लासिकल, लिरिकल, स्टंट, फोक, सेमि क्लासिकल इत्यादि सिखाते हैं.

गरीब बच्चों को फ्री ट्रेनिंग - जब नवीन ने एकेडमी खोली तो बहुत से बच्चे ऐसे आएं जो बहुत ही गरीब फैमली से थें और वो फ़ीस देने में सक्षम नहीं थें. लेकिन उन्हें डांस सीखने का जुनून था तो हुआ यूँ कि जब उन्हें ट्यूशन पढ़ने के लिए घर से कुछ पैसे मिलते थें तो वे लाकर पैसे नवीन को दे देते थें. फिर जब नवीन को उनकी सच्चाई पता चली तब उन्होंने उन बच्चों का फीस माफ़ कर दिया. अभी एकेडमी में 35 बच्चे हैं जिनमे लगभग 20 बच्चों से वे फ़ीस नहीं लेते क्यूंकि वो सक्षम नहीं हैं. इसलिए अभी डांस एकेडमी चलाने में नवीन को थोड़ी दिक्कतों का भी सामना करना पड़ रहा है. फिर भी नवीन कहते हैं, "लेकिन बच्चों के चेहरों पर जो ख़ुशी देखने को मिलती है वो अनमोल है."

डांस से जुड़ाव - नवीन को बचपन से ही डांस का शौक था. टीवी पर देखकर खुद से डांस करने की कोशिश करते थें. इनके गुरु का नाम है राजकुमार जो डांस की बदौलत ही रेलवे में जॉब पाएं तो उनसे प्रभावित होकर नवीन भी डांस सीखना शुरू किएँ. 13 साल की उम्र में जब राजकुमार सर के पास गए तो वहां उनसे 5 साल तक डांस सीखा.

अबतक क्या कुछ किया ? - 3 सालों से अपनी एकेडमी की तरफ से कुछ स्कूलों में भी परफॉर्म किया है. कम्पटीशन में भी हिस्सा लिए,शो के लिए समस्तीपुर, डेहरी ऑन सोन, लखनऊ इत्यादि जगहों पर जाकर शो कर चुके हैं. रेलवे के कार्यक्रमों में भी ये शो करते रहते हैं.

गेस्ट का सवाल - जब स्पेशल गेस्ट अजय झा ने नवीन से सवाल किया कि "अपने एकेडमी को लेकर या अपनी पर्स्नल लाइफ को लेकर अगले 5 सालों में देखें तो आपका विजन क्या है ?" नवीन ने कहा -  "एकेडमी की बात करें तो मेरा गोल है कि अभावग्रस्त बच्चों को सलेक्ट करके उन्हें उस मुकाम तक पहुंचाऊं कि मेरी एकेडमी का भी नाम हो और उन्हें भी एक मंजिल मिले. जहाँ तक मेरी पर्स्नल लाइफ की बात है तो मेरी अलग से कोई ख्वाहिश नहीं है. मेरे एकेडमी के बच्चे ही मेरे सपने हैं. अगर ये बच्चे हैं तभी मैं भी हूँ. उनकी सफलता ही मेरी सफलता होगी."

नवीन जब हमें अपनी डांस एकेडमी दिखाने और अपने एकेडमी के बच्चों से मिलवाने ले गएँ जो घर से थोड़ी ही दूर पर है तो बोलो जिंदगी टीम और स्पेशल गेस्ट की फरमाईश पर नवीन ने खुद और फिर एकेडमी के बच्चों का डांस भी दिखाया जिसे देख सभी ने दिल खोलकर सराहना की.
(इस पूरे कार्यक्रम को bolozindagi.com पर भी देखा जा सकता है.)







Monday, 16 September 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : नवोदित कवि केशव कौशिक की फैमिली, महेन्द्रू, पटना



15 सितंबर, रविवार की शाम 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटना के महेन्द्रू इलाके में नवोदित कवि केशव कौशिक के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में इग्नू, दिल्ली में कार्यरत, सामायिक परिवेश पत्रिका के संपादक एवं कवि संजीव कुमार 'मुकेश' भी शामिल हुयें. इस कार्यक्रम को स्पॉन्सर्ड किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों केशव कौशिक की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.

फैमली परिचय- केशव सुपौल जिले के कोरियापट्टी गांव से ताल्लुक रखते हैं. अभी पटना कॉलेज में इंग्लिश ऑनर्स, थर्ड ईयर के स्टूडेंट हैं. पिता जी स्व. शम्भू प्रसाद सुमन जो किसान थें, उनका अपना बिजनेस भी था. केशव की माँ सुलेखा देवी सुपौल के कोरियापट्टी में कन्या प्राथमिक विधालय में हेडमास्टर हैं. सुलेखा जी को पहले सिलाई-कढ़ाई का बहुत शौक था लेकिन अब समय नहीं मिल पाता. केशव दो बहन एक भाई हैं. बड़ी बहन की शादी हो चुकी है और छोटी बहन अनुपम कुमारी, मगध महिला कॉलेज में केमस्ट्री ऑनर्स सेकेण्ड ईयर की स्टूडेंट है. अनुपम की हॉबी डांस है. केशव जब 4 साल की उम्र के थें तभी उनके सर से पिता का साया उठ गया था. तब उनकी माँ ने कठिन संघर्ष करते हुए सबकी परवरिश की, पढ़ाया-लिखाया और अभी भी इनके अच्छे करियर के लिए प्रयत्नशील हैं.

साहित्य से जुड़ाव - केशव बताते है कि "12 वीं के दौरान ही कुछ चीजें बिल्कुल पास से यूँ गुजरीं कि साहित्य के क्षेत्र में आने का रुझान पैदा हो गया. लिखने की शुरुआत हुई थी क्लास 10 वीं में. तब ही पहली कविता लिखी थी." पहले जब केशव बेगूसराय रहते थें तो वहां का हॉस्टल, टीचर्स और हिंदी का बेहतर माहौल होते हुए भी वहां चीजें महसूस नहीं हुई लेकिन तब एक पृष्ठभूमि जरूर तैयार हो रही थी. जब केशव 8 वीं -9 वीं में गएँ तो उन्हें ऐसा लगा कि हिंदी बेहतर तरीके से है मुझमे. फिर 10 वीं आते- आते उनके अंदर से कविता आयी. पिछले साल केशव के पटना में आने के साथ ही मंचों पर कविताई शुरू हो गयी. फिर 2018 के फरवरी में पहली बार मंच पर आने का अनुभव मिला. उसके बाद बिहार के बहुत सारे जिलों में कार्यक्रम किएँ.

अबतक क्या कुछ किया ? - कविताओं में श्रृंगार रस ज्यादा पसंद करनेवाले केशव कौशिक हाल-फ़िलहाल काठमांडू के अंतराष्ट्रीय कवि समेलन में भाग लेकर लौटे हैं. अबतक लगभग 30-40 मंचों पर कवितायेँ सुना चुके हैं. राष्ट्रिय कवि संगम में पटना जिला इकाई के सचिव भी रह चुके हैं. राष्ट्रिय कवि संगम के पटना इकाई के तहत पटना में दो कार्यक्रम करा चुके हैं. जब केशव ने ये संस्था छोड़ी तो बहुत से ऑफर आएं विभिन्न संस्थाओं में जुड़ने के लिए लेकिन तब उनके शुभचिंतकों ने समझाया कि - "संस्था के पीछे मत पड़ो अपनी रचना पर ध्यान दो वही तुम्हें आगे लेकर जाएगी, कभी संस्था तुम्हें आगे नहीं बढ़ाएगी." इसलिए तबसे कई संस्थाओं के आयोजन में परफॉर्म करने तो गएँ लेकिन कभी उसमे मेंबर के रूप में नहीं जुड़ें. पिछले साल केशव ने 'बनारसिया' के तत्वाधान में युवा रचनाकारों को लेकर तीन कार्यक्रम करवाया.


अभी क्या चल रहा है ? - पटना कॉलेज का स्टूडेंट होने के नाते केशव युवाओं को लेकर एक कार्यक्रम वहां भी कराना चाहते हैं लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है, प्रयास जारी है, कॉलेज प्रशासन अगर ध्यान दे तो यह सम्भव है. आगे का लक्ष्य लिटरेचर के क्षेत्र में ही कुछ करने का है. पोस्ट ग्रेजुएशन सेंट्रल यूनिवर्सिटी से करने की इक्छा है.


बोलो जिंदगी टीम और स्पेशल गेस्ट की फरमाईश पर केशव ने अपनी कुछ उम्दा रचनाएँ सुनायीं जिसे सुनकर सभी ने उनकी खूब सराहना की. फिर विदा लेने से पहले इस कार्यक्रम के स्पेशल गेस्ट संजीव कुमार 'मुकेश' जी ने बोलो जिंदगी के विशेष आग्रह पर अपनी भी एकाध रचनाएँ सुनायीं.
(इस पूरे कार्यक्रम को bolozindagi.com पर भी देखा जा सकता है.)

Sunday, 8 September 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : रीना सिन्हा जी की फैमिली, कालिकेत नगर, पटना



8 सितंबर, रविवार की शाम 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटना के बेली रोड, कालिकेत नगर में गायिका रीना सिन्हा जी के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में बीजेपी कला संस्कृति प्रकोष्ठ बिहार के प्रदेश अध्यक्ष वरुण कुमार सिंह भी शामिल हुयें. इस कार्यक्रम को स्पॉन्सर्ड किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों रीना जी की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.

फैमली परिचय- रीना सिन्हा ने इकोनॉमिक्स ऑनर्स में ग्रेजुएशन किया है. हसबैंड श्री अभय कुमार सिन्हा दो भाई दो बहन हुए. वे वैशाली जिले में सांख्यिकी विभाग में कार्यरत हैं. बिहार कोकिला के नाम से जनि जानेवाली लोकगायिका पद्मश्री स्व. विंध्यवासिनी देवी रीना सिन्हा जी के हसबैंड की फुआ थीं यानि वो रीना जी की फुआ सास लगीं. रीना सिन्हा का ससुराल बाढ़ में है और मायका मुजफ्फरपुर हुआ. इनकी सासु माँ कुसुम कुमारी सिन्हा बाढ़ गर्ल्स स्कूल की हेडमास्टर थीं. ससुर जी स्व. हरिनंदन प्रसाद सिन्हा कोलकाता यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थें जो रीना जी की शादी के पहले ही गुजर चुके थें. रीना जी को दो बेटे हैं, बड़े बेटे कुमार सौरभ मैकेनिकल से बीटेक करके पुणे की एक कम्पनी में ट्रेनिंग कर रहे हैं. बड़े बेटे को क्रिकेट में बहुत रूचि रही है. छोटा बेटा अपूर्व कुमार न्यू मॉडल दिल्ली पब्लिक स्कूल में 12 वीं का स्टूडेंट है.


संगीत से लगाव - बचपन से ही जब 8-9 साल के थें तो आकाशवाणी के बालमंडली एवं घरौंदा में गाते थें. स्कूल में एक विषय संगीत भी था जिसके तहत प्रोग्राम भी देते थें. फिर आगे पढ़ाई-लिखाई के क्रम में कुछ समय के लिए संगीत से नाता छूट गया. फिर 1991 जून में शादी हुई तो घर-गृहस्ती की वजह से संगीत साधना में थोड़ी कमी हुई. फिर जब बच्चे बड़े हुए तब संगीत का सफर पुनः शुरू हुआ. फिर से आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़ें. राजेंद्रनगर में विंध्य कला केंद्र स्व. विंध्यवासिनी देवी जी की संस्था है जो बहुत वर्षों से चल रही है. उनकी बेटी चला रही हैं. रीना जी वहां की स्टूडेंट भी हैं, वहीँ से इन्होने लखनऊ से लोकगीत में डिग्री ली हुई है. 18 अप्रैल को स्व. विंध्यवासिनी देवी की पुण्यतिथि पर सांस्कृतिक कार्यक्रम जो कालिदास रंगालय या प्रेमचंद रंगशाला में आयोजित होते हैं में रीना सिन्हा मुख्य रूप से गाती हैं. पूर्णिया जिले में हुए श्रावणी महोत्सव में भी भाग लिया है. ये खुद के लिखे संस्कार गीत और देवी गीत को भी गाती हैं. हिंदी, मगही, बज्जिका भाषा में लिख चुकी हैं और म्यूजिक एलबम के लिए बात चल रही है. यू ट्यूब चैनल है रीना सिन्हा ट्रेडिशनल के नाम से जिसमे फुआ जी का गीत गायी हैं.

अभी क्या चल रहा है ? -  जब बिन्ध्य कला केंद्र में स्व.विंध्यवासिनी देवी जी की बेटी यानि दीदी आती हैं तो उनसे वहां रीना जी संगीत सीखती हैं लेकिन अभी जब दीदी अस्वस्थ हैं तो ये वहां के नए स्टूडेंट्स को सिखाती हैं.

बोलो जिंदगी टीम और स्पेशल गेस्ट वरुण सिंह जी की फरमाईश पर रीना जी ने अपनी फुआ सास स्व. विंध्यवासिनी जी के लिखे कजरी, धनकटनी और विवाह गीत को गाकर सुनाया जिसे सुनकर सभी ने उनकी खूब सराहना की.


(इस पूरे कार्यक्रम को bolozindagi.com पर भी देखा जा सकता है.)

Monday, 2 September 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : वागीशा झा की फैमिली, खगौल, पटना



2 सितंबर, सोमवार की शाम 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', तबस्सुम अली एवं प्रीतम कुमार) पहुंची खगौल इलाके में गायिका वागीशा झा के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में श्री सच्चा कला केंद्र संस्था की सचिव श्रीमती जनककिशोरी जी भी शामिल हुईं. इस कार्यक्रम को स्पॉन्सर्ड किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों वागीशा की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.

फैमली परिचय- गायिका वागीशा झा जेडी वीमेंस कॉलेज में म्यूजिक में पीजी सेकेण्ड सेमेस्टर की स्टूडेंट. 24 मई 2019 को इनकी शादी हुई है. इनके हसबैंड मि. पारस कुमार झा मुंबई में केमिकल इंजिनियर हैं. वागीशा का मायका और ससुराल दोनों ही पटना के खगौल में है. ससुराल में दो ननदें हैं जिनकी शादी हो चुकी है. सासु माँ हैं, एक देवर हैं जो दिल्ली में जॉब करते हैं. वागीशा दो भाई-बहन हैं. इनके भैया मि. देशबंधु कुमार गुड़गांव में जॉब करते हैं. वागीशा के पापा श्री जयमुकुंद झा बिजली विभाग में कार्यरत थें और मम्मी श्रीमती नीतू देवी गृहणी हैं.



वागीशा और उनके फैमिली मेंबर का टैलेंट - वागीशा के पापा तबला, नाल और हारमोनियम बजाने के साथ-साथ गाने भी बहुत अच्छा गाते हैं. वागीशा की मम्मी और सासु माँ भी संस्कर गीत गाती हैं. इनके पति पारस कभी बहुत अच्छा क्रिकेट खेला करते थें. कई बार स्टेट लेवल अवार्ड जीते हैं. परिस्थितियां ऐसी बनी कि पिता जी के बहुत जल्दी खो दने के बाद घर-परिवार की सारी जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गयीं. वागीशा की सासु माँ ने बेटे से बोला भी था कि "क्रिकेट में मन लगता है तो तुम क्रिकेट में ही जाओ". लेकिन पारस सिचुएशन देखते हुए पढ़ाई फिर जॉब में ज्यादा मन लगाने लगें.


वागीशा के संगीतमय सफऱ की कहानी - वागीशा जब डीएवी खगौल में पढ़ती थी तो स्कूल में सलेक्टेड लोगों को मौका मिलता था और तब वे दरवाजे के पास से देखती थी. क्लास में जब कोई पीरियड नहीं होता था तो सबको गाना सुनाती थी. क्लास में टीचर लोग आतीं तो जब उन्हें पढ़ाने का मन नहीं होता या स्टूडेंट्स को पढ़ने का मन नहीं होता तो वे बोलतीं कि जिसमे जो टैलेंट है वो प्रस्तुत करे. तब सब स्टूडेंट वागीशा का नाम लेकर बोलतें कि बहुत अच्छा गाती है. फिर टीचर इनको बुलातीं गाना सुनाने के लिए. फिर धीरे-धीरे लोगों को पता चला और तभी से स्कूल के सारे प्रोग्राम में गाने लगी. कॉलेज में भी कुछ मौके मिलें. स्टेज का पहला अनुभव खगौल में मिला. एक थें बिनू अंकल जो रेलवे में ऑफिसर थें, जिन्हे म्यूजिक से बहुत लगाव था और वे वागीशा के घर के बगल में रहते थें . सन्डे को उनके घर पर प्रैक्टिस होता था. वागीशा वहां जाती तो अंकल सिखाते थें. एक दफा खगौल में ही जागरण हो रहा था उसमे बिनू अंकल ने ही वागीशा को पहला ब्रेक दिया.  वागीशा का जन्म भले ही सहरसा में हुआ लेकिन खगौल से ज्याद लगाव था. क्यूंकि यहीं से ये चलना शुरू की थीं. पापा बिजली विभाग में थें तो उन्हें हर कोई जाननेवाला था. इसलिए तब वागीशा बहुत ज्यादा एक्साइटेड थी कि क्या पहनेंगी, सबलोग देखेंगे. इस तरह उनका पहला स्टेज परफॉर्मेंस खगौल से ही शुरू हुआ.

संगीत विरासत में मिला - वागीशा के पापा बचपन से ही गाते थें मगर उस वक़्त उनके पैरेंट चाहते थें कि पढ़ाई-लिखाई करें और सेटल हो जाएँ. लेकिन इनके पापा को म्यूजिक में बहुत इंट्रेस्ट था लेकिन उन्हें सपोर्ट नहीं मिल पाया. जब वागीशा जन्म ली तो उनके पापा वागीशा में वो ख्वाब देखने लगें. जब वागीशा 5 साल की हुई तो थोड़ा बहुत गुनगुनाने लगी जिसे देखकर पापा-मम्मी को लगा कि ये गायेगी, फिर पापा हारमोनियम पर बैठाकर सारेगामापादानिशा सिखाना शुरू कर दिए. वागीशा के पहले गुरु इस तरह उनके पापा बन गएँ.


वहां से बड़ा अचीवमेंट - वागीशा पटना में 2016 में कराओके सिंगिंग स्टार में फर्स्ट रनरअप चुनी गयीं, 2017 में सारेगामापा रंग पुरवैया में टॉप 12 तक गयी. रेडियो मिर्ची सिंगिंग कम्पटीशन में फर्स्ट रही, पीटीएन चैनल के 'स्वर-झंकार' में फर्स्ट आयीं, जिसमे लोकगायिका देवी द्वारा 51 हज़ार रुपए इनाम में मिलें. इसके बाद सरस मेला, बसंत उत्सव, सावन महोत्सव, सोनपुर मेला, एक शाम शहीदों के नाम जैसे समारोहों में अपनी गायिकी का जादू चलाया. अभी 2019 में बिहार गौरव सम्मान से भी सम्मानित हुईं. संगीत में गोल्ड मेडलिस्ट हैं और दो-बार इनको गोल्ड मैडल मिला, 2013 और 2015 में. 2013 में मधुबनी में हुए युवा महोत्सव में स्टेट लेवल टॉपर भी बनीं.

फोक में दिलचस्पी कब से बढ़ी ? - चांदनी फेम प्ले बाइक सिंगर जॉली मुखर्जी जब धूम-3 का कमली-कमली इनका गाना सुने थें तो उन्होंने कहा था - "तुम्हारी आवाज बिल्कुल फोक के लिए बनी हुई है. तुम फोक पर फोकस करो. तब देखना तुम बहुत आगे जाओगी." उस दिन से ही सही मायने में वागीशा ने फोक गाना शुरू किया.

फोक के आलावा ये सूफी, सुगम संगीत, फ़िल्मी गीत भी गाती हैं. लोकल म्यूजिक एलबमों में बहुत काम किया है लेकिन अब तमन्ना है राष्ट्रिय स्तर की म्यूजिक कंपनियों में गाने की. इस बाबत वागीशा कहती हैं "लेकिन वहां मैं अपनी कला की वजह से जाना चाहती हूँ ना कि किसी पैरवी-पहुँच से."

जब बोलो ज़िंदगी की टीम वागीशा के ससुराल पहुंची तो वहां इनके पति पारस भी मुंबई से आये हुए थें. वागीशा की सासु माँ और उनके मम्मी-पापा भी मौके पर मौजूद थें. तब बोलो जिंदगी की फरमाईश पर वागीशा के साथ-साथ उनके पापा श्री जयमुकुंद झा ने भी गीत गाकर सुनाया.


(इस पूरे कार्यक्रम को bolozindagi.com पर भी देखा जा सकता है)

Sunday, 25 August 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : पूनम त्रिवेदी की फैमिली, ईस्ट बोरिंग कैनाल रोड, पटना





24 अगस्त, शनिवार की शाम 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', तबस्सुम अली एवं प्रीतम कुमार) पहुंची ईस्ट बोरिंग कैनाल रोड इलाके में आर्ट ऑफ़ लिविंग की टीचर व सिंगर पूनम त्रिवेदी के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में पुरोधालय के सचिव श्री प्रणय कुमार सिन्हा भी शामिल हुयें. इस कार्यक्रम को स्पॉन्सर्ड किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों पूनम त्रिवेदी जी की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.
फैमली परिचय- पूनम त्रिवेदी आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था में टीचर हैं और योग, प्राणायाम, ध्यान और सुदर्शन क्रिया सिखाती हैं. सोशल वर्क से भी जुड़ाव है, मायका और ससुराल दोनों भागलपुर में ही है. पति श्री सचिन्द्र कुमार त्रिवेदी स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से एक्सक्यूटिव मैनेजर के पद से रिटायर्ड हैं. इनकी इकलौती बेटी शाम्भवी त्रिवेदी इंजीनियरिंग करके बिहार से बाहर गयी हैं. अभी टीसीएस कम्पनी में असिस्टेंट इंजीनयर हैं.
पूनम त्रिवेदी और उनके फैमिली मेंबर का टैलेंट -  सिंगिंग हॉबी है, संगीत में प्रभाकर किया है प्रयाग समिति से और गुरु श्री राजीव सिन्हा से संगीत की तालीम ली है. पूनम त्रिवेदी को भजन के अलावा फोक, गजल और सूफी गाना पसंद है. बेटी शाम्भवी ने वहीँ से 6 ठा ईयर कम्प्लीट किया है. गवर्नमेंट के कई प्रोग्राम में भी पटना में वो गए चुकी हैं. हारमोनियम तो अब चलता नहीं है तो पूनम जी तानपुरा रखकर काम करती हैं और इनको साथ देते हैं प्रवीर कुमार जी जो आर्ट ऑफ़ लिविंग में तबला बजाते हैं. जब पूनम जी की बेटी शाम्भवी छुटियों में पटना आती है तो हर 8 दिन में तबलावादक प्रवीर जी को बुलाते हैं और फिर साथ में रियाज करते हैं.
पूनम त्रिवेदी के संगीतमय सफऱ की कहानी - पूनम जी जब शादी करके ससुराल आयीं तो संगीत का इतना शौक था कि तब भी गाती थी. शुरू में गुरु तो नहीं मिलें लेकिन कुछ लोग ज़रूर मिलें जो इन्हे गाइड करते थें. स्कूल और कॉलेज में भी स्टेज पर चांस मिला गायन का उसके बाद फिर जब शादी हो गयी तब लगा कि अब संगीत छूट जायेगा लेकिन जब सौरल आयीं तो देखीं पति के पास गजल का बहुत सारा कलेक्शंस था. उस वक़्त पूनम गजल भी बहुत गाती थीं. इसपर पूनम खुश हुईं कि पति को भी गाने सुनने का शौक है तभी तो इतना नायाब कलेक्शंस है. कम से कम ये तो नहीं होगा कि उन्हें गाने को लेकर कोई टोक-टाक करे. उसके बाद जब पूनम ने अपनी इक्छा जाहिर की और जब ससुरालवालों ने गायन सुना तो फिर एक टीचर प्रोवाइड किया शुबीर मुखोपाध्याय जी को जो सिखाने लगें. हारमोनियम वगैरह की व्यवस्था हुई. फिर वहां से सीखते-सीखते करीब चार साल बाद पति का ट्रांसफर धनबाद से गिरिडीह में हो गया. उसके बाद गिरिडीह में थोड़ा बहुत गाने का चला लेकिन फिर जब पूनम ने देखा कि कुछ खास नहीं हो रहा तब लॉ की पढ़ाई शुरू कर दी. फिर कुछ समय बाद वहाँ पर जो भी स्टेज वैगेरह का प्रोग्राम होता था पूनम जी ने भाग लेना शुरू किया. फिर धीरे-धीरे मौके मिलते चले गएँ. जब पटना आयीं तो लगा कि अब इनसे गायन नहीं हो पायेगा. लेकिन जब आर्ट ऑफ़ लिविंग ज्वाइन किया तो वहाँ पर जो भजन होते हैं वो बहुत मधुर और राग पर आधारित होते हैं, वो इनको बहुत अट्रैक्ट किया. पूनम जी ने जब उसको ज्वाइन किया तो बहुत अच्छा लगा. फिर वहां सिंगर के रूप में सत्संग में गाने लगीं. फिर जब एहसास हुआ कि उनका हारमोनियम वगैरह पड़ा हुआ है तो फिर पूनम जी ने अपनी बेटी को भी सिखाना शुरू किया. सेकेण्ड ईयर उसने जब कर लिया तब पता चला संस्था निनाद के बारे में तो फिर पूनम त्रिवेदी अपनी बेटी के लिए वहां गयी लेकिन फिर वे खुद भी वहां के राजीव सिन्हा जी से संगीत की बारीकियां सीखीं. 

संगीत विरासत में मिला - पूनम जी की माँ का नाम विशाखा पांडेय है जो एक ज़माने में गाया करती थीं और इनके पापा श्री कृष्णानंद पांडेय जो बहुत अच्छी बांसुरी बजाया करते थें. मायके में भी संगीत का शौक सबमे होते हुए भी बाकि लोगों ने संगीत सीखने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई लेकिन पूनम इस दिशा में थोड़ा आगे बढ़ गयीं.

ससुराल का सपोर्ट - ससुराल वालों ने बहुत सपोर्ट किया तभी आगे बढ़ पायीं. पूनम जी ने एक राज की बात बताई कि "ससुराल में जब हमलोग टेबल पर खाना खाते थें तो खाना खाने के बाद टेबल पर ही बैठकर हमलोग गाना सुनने-सुनाने लगते थें. फिर 11-12 बजने को आएं, तानपुरा लगा हुआ है और हमलोगों का गायन चल रहा है, इस तरह से बहुत मज़ा आता था. जब गलतियां होतीं तो लोग टोकते भी थें कि यहाँ गलती हुई है, ऐसा नहीं कि कुछ भी सुनकर आप बस वाह-वाह कर रहे हैं."

अब विदा लेने से पहले बोलो ज़िन्दगी टीम ने पूनम त्रिवेदी की फैमली को एक साथ बैठाया और प्रीतम कुमार ने उनका फैमिली पिक्चर क्लिक कर लिया.
(इस पूरे कार्यक्रम को bolozindagi.com पर भी देखा जा सकता है)


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