ticker

'बोलो ज़िन्दगी' ऑनलाइन मैगजीन के एडिटर हैं राकेश सिंह 'सोनू'

Friday, 18 January 2019

मेरा कैरेक्टर था बहुत सीरियस टाइप का, ज्यादा बोलनेवाला नहीं, जो बिल्कुल विपरीत था मेरी रियल लाइफ से : सुलगना चटर्जी, अभिनेत्री

By: Rakesh Singh 'Sonu'


सबसे पहला जो मैंने कैमरा फेस किया वो पुणे में था फिल्म 'पुणे टीसी' के लिए. जब मैं पढ़ रही थी तभी से मेरे अंदर एक्टिंग का कीड़ा था. मैं शुरू से ही स्कूल-कॉलेज के कल्चरल एक्टिविटीज में हमेशा से एक्टिव रही शायद वहीँ से एक्टिंग का बीज पड़ा. मैंने यहाँ-वहां काफी ऑडिशन दिए. मेरा एक दोस्त था वो भी ट्राई कर रहा था. शायद उसने कहीं पेपर पढ़ा था कि किसी हिंदी फिल्म के लिए ऑडिशंस हो रहा है. उसने मुझसे कहा तो हमने कहा 'चलो चलते हैं'. फिर हम दोनों ने जाकर ऑडिशन दिया. सैडली वो सेलेक्ट नहीं हुआ. उसे फर्स्ट राउंड में ही बोल दिया गया कि आप सेलेक्ट नहीं हो तो वह चला गया. फिर मुझे सेकेण्ड, थर्ड राउंड ऑडिशन के बाद अलग-अलग तरह के इमोशन कि हंस के दिखाओ-रो के दिखाओ कहा गया तो सब करके दिखाया. हम दोपहर को गए थें और जब शाम अँधेरा हो गया तो मैं वहां से निकली. निकलते ही फोन पर मम्मी से बात करने लगी कि 'आज मैंने फिल्म के लिए ऑडिशन दिया.' सब खुश हुए. उनका फोन डिस्कनेक्ट किया था कि इतने में ऑडिशन लेनेवालों का फोन आया 'आप सेलेक्ट हो हमारी फिल्म के लिए' और तब मैं उनके कैम्पस गेट से निकल ही रही थी. मैं 'व्हाट' ऐसे कहते हुए शॉक्ड हुई तो वे बोले -'हाँ आप सेलेक्ट हो.' मेरे लिए यह बड़ा ब्रेक था. उस दिन अगर मुझे पंख होते तो सच में मैं उड़ जाती. मेरे लिए वो बहुत बड़ी बात थी. अगर बिना किसी कॉन्टेक्ट के, बिना किसी बैकअप के सिर्फ आपके टैलेंट के बलबूते पहला ब्रेक मिलता है तो बहुत ख़ुशी होती है.
सेलेक्शन होने के बाद ये टेंशन हुआ कि मेरी ग्रेजुएशन की जो पढ़ाई चल रही थी कहीं एक्जाम के डेट्स के साथ शूट के डेट क्लैश न हो जाये. लेकिन फिर हर चीज अपने आप ही जैसे पिरो दिए थें भगवान ने कि जैसे ही एक्जाम खत्म हुए शूट शुरू हुआ. मेरे पास काफी टाइम था, अच्छे से तयारी की. हमलोग वर्कशॉप पर जाते थें. वहां अलग-अलग रोल्स करने को बोलते थें. ऐसा भी हुआ कि जो राइटर्स लिख रहे थें उन्होंने बीच में बोला कि 'अरे ये प्रोजेक्ट अच्छा नहीं है, हम नहीं लिख पाएंगे.' और उन्होंने बायकॉट कर लिया. फिर मन में आया कि मेरा पहला प्रोजेक्ट है और ये बनेगा ही नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है. फिर सारी ख़ुशी हवा हो गयी. फिर उसके बाद हमारे प्रोड्यूसर ने बोला 'कुछ भी हो जाये, मुझे पूरी समझ है कि ये एक अच्छी स्टोरी है और ये जब बनेगी तो अच्छे से ही बनकर रिलीज होगी. उनके समझाने पर पूरी टीम वापस नए जोश में आ गयी. डायरेक्टर्स और जो दूसरे बन्दे उनके टीम में थें सबने मिलकर राइटिंग कम्प्लीट की और हम सबने फिल्म बनायी. जब हम शुरू-शुरू में शूट पर गए तो हम सभी कम अनुभवी थें. सेट पर अपने काम का एक विभाजन होता है कि एक एक्टर को एक्टिंग करनी है, डायरेक्टर को डायरेक्शन करना है, स्पॉटबॉय को चाय पिलानी है और लाइटमैन को लाइट दिखानी है. लेकिन वहां पर किसी को कुछ पता ही नहीं था. जो असिस्टेंट डायरेक्टर थें वो कभी-कभी चाय भी पीला दे रहे थें. अब जब हम प्रोफेशनली काम करते हैं तो लगता है, अरे यार हम क्या-क्या करते थें. मैं खुद जाकर कॉस्ट्यूम लेकर आती थी कि चलो यार मेरे पास टू वीलर है फटाफट जाकर ले आओ. जबकि वो मेरा काम ही नहीं था. हमने काफी कुछ सीखा, कैमरा फेसिंग, लाइटिंग क्या होती है. थोड़ा डांस-वांस करने को भी मिला. क्यूंकि मेरा कैरेक्टर था कि बहुत सीरियस टाइप की है, ज्यादा बोलती नहीं है, जो बिल्कुल विपरीत था मेरी रियल लाइफ से. और सेट पर सबसे ज्यादा मस्ती मैं ही करती थी. तो बाद में सब बोले कि 'अरे यार तुमको ये कैरेक्टर देकर गलती की, तुम कुछ ज्यादा ही अपोजिट हो इस कैरेक्टर के.' मैं बोली- 'वही तो चैलेन्ज है कि मैं अपोजिट होकर भी उसे निभा सकूँ. 'पुणे टीसी' में मेरा रोल था अनन्या बनर्जी का जो एक एम.बी.ए. फाइनांस लड़की है जो बहुत अच्छे फर्म में जॉब करती है. कुछ लड़कियों के साथ शेयरिंग में रहती है. उसकी एक फ्रेंड है वो बहुत लड़के पटाऊ टाइप की है जो कॉलसेंटर में जॉब करती है. लेकिन उसके साथ बॉन्डिंग अच्छी है जो बेस्ट फ्रेंड की तरह रहती है. मेरा जो कैरेक्टर है वो बहुत कम बोलती है, बस खाली आँखों के इशारे से जो भी कहना है कह देती है. और लास्ट में पता चलता है कि वो भी उनमे से एक है जिसे हीरो पसंद है. और ये एक शॉकिंग सा बम फटता है ऑडियंस पर क्यूंकि लास्ट में मैं ही हूँ जो हीरो के साथ जोड़ी बनाती हूँ.
और ऐसा करके फाइनली एक महीने का सूट पूरा हुआ, फिर कुछ पैच वर्क भी निकला उसके बाद मैं मुंबई आ गयी अपना करियर आगे ले जाने के लिए. 'पुणे टीसी' के शूटिंग के दरम्यान पहले दिन एक एक्साइटमेंट तो थी, सबको हम पहले से जानते थें क्यूंकि हम एक महीने से वर्कशॉप कर रहे थें. पहला दिन मुझे याद है, एक सीन था जहाँ पर हम पांचों लड़कियां एक घर में पेइंग गेस्ट रहती हैं और जो हमारे ऑनर हैं उनके घर पर पूजा है. हम सबलोग उनकी पूजा में इन्वाइटेड हैं. वहीँ पर हमलोग हीरो को देखते हैं. तब वह बहुत फनी सा कैरेक्टर लगता है क्यूंकि वो गांव का लड़का है जो लुंगी पहने हुए है. उसे देखकर हमलोग हंस रहे हैं, मजाक कर रहे हैं. तो इस सिन में पूरा दिन निकल गया. पहले दिन मैं जो शूट पर गयी तो अपने घुंघराले बालों को स्ट्रेट करके गयी. जैसे ही सबकी नजर पड़ी तो बोले - 'वाह सुलगना, तेरे बाल कितने अच्छे हैं, तू कितनी अलग दिख रही है. पहली बार खुद को अलग लुक में देखा था, तब तक बाल स्ट्रेट करवाना ये सब उतना पता नहीं था. और फिर जब मेकअप लगा तो पहली बार मेकअप में खुद को देखकर मेरे मुँह से निकला 'छी: मैं कितनी गन्दी लग रही हूँ.' तब मुझे आदत नहीं थी इतने हैवी मेकअप में खुद को देखने की. तब मेकअप वाले दादा ने कहा कि 'अभी जस्ट किया है, थोड़ी देर में जब 5 -10 मिनट में ये सेट हो जायेगा तब आप देखना और कैमरे पर देखना आपका लुक अच्छा आएगा. उनकी बात सही निकली. जब वो शॉर्ट्स हमने रात को बैठकर देखे तो वहीँ बैठी हमारी एक एडी जो फिल्म में एक्टिंग भी कर रही थी उसने कहा कि 'सुलगना तेरे शॉर्ट्स कितने अच्छे आये हैं, तू इतनी अच्छी दिख रही है कि तू सच में हीरोइन लग रही है.' तब मेरा मन ख़ुशी से झूम उठा. उसमे परफॉर्मेंस उतना नहीं था लेकिन अनुभव बहुत मिला. जैसा फोर वीलर स्टार्ट करने में थोड़ी प्रॉब्लम आती है ना लेकिन एक बार जब गाडी चालू हो जाती है तो फर्राटे से चलती है. उसी तरह धीरे-धीरे उनके साथ रहते-रहते मैं ओपन होती तो वे सर पकड़ लेते कि अरे यार यह तो ज्यादा ही बकबक करती है. जब फर्स्ट वर्कशॉप में गयी थी तो बहुत कम बोलती थी, हाय-हैलो तक ही क्यूंकि डर था कि निकाल दिया तो. इसलिए मैं बहुत लिमिटेड रहती थी. जब शूट पर पहुंची तो लगा कि अब नहीं निकालेंगे तो फिर असली रूप सामने आ गया मेरा. मैं खूब मस्ती करने लगी.
एक सीन ऐसा था जहाँ पर एन्ड में ऐसा होता है कि मेरा पैर टूट जाता है, मैं ख़ुशी से जम्प कर रही हूँ और मिस बैलेंस होकर गिर जाती हूँ और मेरा पैर टूट जाता है. तो एक प्रेशर होता है ना कि मैं सच में लंगड़ी हो गयी हूँ ऐसा लोगों को लगना चाहिए. यह ना लगे कि मैं नाटक कर रही हूँ. फिर मैंने अपने एक असिस्टेंट डायरेक्टर से कहा- 'एक काम करोगे मेरे पैर पर जोड़ से कुछ मारो कि मेरे पैर में दर्द हो.' वो चौंककर बोला 'क्यों?' मैंने बोला- 'मुझे लंगड़ी वाली फिलिंग नहीं आ रही है तो मैं लँगड़ाउंगी कैसे? स्क्रीन पर नकली लगेगा.' तो उसने कहा- 'अच्छा तो तुम्हारा मर्डर का सिन होगा तो क्या तुम्हारा सच में खून कर देंगे. ऐसा नहीं होता, वो तुम्हें एक्ट करके ही लाना पड़ेगा.' फिर ऐसे छोटे-मोटे मूवमेंट पर आप खुद को चैलेंज कर रहे थें. क्यूंकि वहां पर हमलोग फर्स्ट टाइम कर रहे थें. आज अगर मैं वह शॉर्ट देखती हूँ तो मैं मुँह पलटकर भाग जाती हूँ.
यह शूट किया था 2010 में और फिल्म रिलीज हुई थी 2011 में. सारे न्यूकमर्स थें इसलिए हमें प्राइम स्लॉट की जगह मॉर्निंग स्लॉट मिला था. और फिल्म सिर्फ मैसूर और पुणे में रिलीज हुई थी. रिलीज के वक़्त मैं मुंबई में थी और बहुत एक्साइटेड थी. तब मैं स्पेशली देखने के लिए मुंबई से कैब बुक करके पुणे गयी थी. बहुत अच्छा लग रहा था कि फाइनली हमारा हार्ड वर्क हम 70 एम.एम. स्क्रीन पर देख रहे हैं. जो भी बना, जैसा भी बना. वैसे वह टेक्निकली बहुत वीक फिल्म थी. लेकिन फिर भी होता है ना कि अपना पहला बच्चा चाहे जैसा भी हो सबसे प्यारा होता है. और उस पूरी टीम में मैं इकलौती हूँ जो मुंबई में आकर स्ट्रगल करके अभी तक इंडस्ट्री में टिकी हुई हूँ. लेकिन उस पहले प्रोजेक्ट में जो मेरे रिश्ते बने वो आज भी कायम हैं. 'पुणे टीसी' ने कहीं-ना-कहीं मुझे मोटिवेशन दिया कि हाँ मैं मुंबई जाकर ट्राई कर सकती हूँ. उसके बाद मैं मुंबई आ गयी. वहां फिर से स्ट्रगल स्टार्ट हुआ. बहुत सारे ऑडिशंस के बाद, बहुत सारी हताशा के बाद पहला बड़ा ब्रेक मिला प्रज्ञा चैनल पर आनेवाले टीवी शो 'सूर्य पुराण' में राजा दक्ष की बड़ी बेटी के किरदार के रूप में. उसी को मैं अपना पहला ब्रेक मानती हूँ क्यूंकि उसी ने मुझे पहचान दिलाई.

सिगरेट पीने के सीन में मुझे खांसी होने लगती थी : आर्यन वैध, फिल्म अभिनेता

By: Rakesh Singh 'Sonu'



मेरी पहली फिल्म थी सिस्टम जिसे प्रोड्यूस किया था स्व. झामु सुगंध ने और डायरेक्टर अरविंद रंजन दास थें. लेकिन वह फिल्म किसी वजह से अटक गयी. उस ज़माने में अंडरवर्ल्ड का मुद्दा बहुत गंभीर था. तो कहीं ना कहीं माना जा रहा था कि झामु जी की फाइनैंसिंग अंडरवर्ल्ड से आ रही है, उसको लेकर बहुत विवाद हुआ इसलिए वो फिल्म रिलीज होने से पहले ही फंस गयी और बंद हो गयी. उसके बाद मनीषा कोइराला के साथ मेरी फिल्म रिलीज हुई मार्केट. सिस्टम 2001 में शुरू हुई थी. इस फिल्म में मेरे साथ अभिनेत्री थीं सोनाली बेंद्रे. फिल्म की कहानी बहुत अच्छी थी, एक पुलिस इन्स्पेक्टर जो भ्रष्ट नहीं है लेकिन उसको भ्रष्ट बनना पड़ता है भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए. यह जबर्दस्त कहानी खुद डायरेक्टर अरविंद रंजन दास ने लिखी थी. शूटिंग का पहला दिन मुझे आज भी याद है जब डायरेक्टर ने कहा था कि मुझे सिर्फ एक कमरे में चलना है और एक्ट्रेस कश्मीरा शाह को स्टोरी के हिसाब से पकड़ना है. वो सीन करते-करते हमें पूरा दिन लग गया, क्यूंकि अरविंद जी डायरेक्टर बहुत परफेक्शनिस्ट हैं. तो पहला दिन मैं बहुत नर्वस था सेट पर यह सोचकर कि भाई क्या होगा क्या नहीं....
शूटिंग के दरम्यान एक सीन में मुझे साथ में दो सिगरेट जलाने थें जबकि मैं सिगरेट पिता नहीं था. तो डायरेक्टर ने कहा कि 'तुम कोने में जाओ और सिगरेट पीना सीखो फिर ये सीन करो.' तब मैं कोने में जाकर सीख रहा था मगर मुझे उल्टी आ रही थी, बहुत खांसी आ रही थी. मैंने कहा- 'ये मुझसे नहीं होगा सर.' उन्होंने गंभीर होते हुए कहा- 'नहीं, करना ही पड़ेगा. पूरी दुनिया सिगरेट पी लेती है और तुम से ही नहीं हो पा रहा है.' फिर भी मैंने कह दिया, 'मगर मुझसे नहीं होगा.' लेकिन डायरेक्टर साहब बहुत स्ट्रीक्ट थें, मुझे इतनी आसानी से छोड़नेवाले नहीं थें. फिर किसी तरह से मैंने अपनी खांसी पर कंट्रोल किया और वो सीन कर दिया. लोग एक्साइटेड होते हैं अपनी पहली फिल्म को लेकर लेकिन मैं काफी नर्वस था. एक तो मुझे उन डायरेक्टर महाशय से बहुत डर लगता था, ऊपर से अवार्ड विनर और इतने मंझे हुए सीनियर्स एक्टर्स के साथ काम कर रहा था. हर रोज जब सेट पर जाऊं तो मैं सोचता - 'अरे यार, आज फिर मेरे सामने किस महारथी को खड़ा कर दिया.' मेरी कोशिश रहती थी कि मेरी वजह से कहीं रीटेक ना हो. मैं अपनी बहुत तैयारी करके जाता था. मैंने मकरंद देशपांडे जैसे दिगज्जों के साथ थियेटर किया था इसलिए कभी डायलॉग डिलीवरी में दिक्कत नहीं हुई. हाँ, प्रॉब्लम ये आती थी कि डायरेक्टर को जिस मूड का डायलॉग चाहिए था वो देना मुश्किल था. अगर उनका मूड कर रहा है कि ये टोन है तो उस टोन को पकड़ना बहुत मुश्किल था. फिर भी डायरेक्टर ने बहुत सपोर्ट किया. ऐसे ही करते-करते फिल्म कम्प्लीट तो हो गयी लेकिन लास्ट के कुछ दो-चार दिनों का काम रह गया था. इतनी मेहनत के बाद बैडलक रहा कि फिल्म रिलीज नहीं हो पायी.
इसके आलावा मैं 'बोलो जिंदगी' को अपनी पहली भोजपुरी फिल्म का अनुभव भी शेयर करना चाहूंगा. फिल्म का नाम है 'तिरंगा पाकिस्तान का' जिसकी शूटिंग 2015 में कम्प्लीट हुई और अब फिल्म रिलीज की तैयारी है. इस फिल्म के डायरेक्टर भी वही फिल्म 'सिस्टम' फेम अरविंद रंजन दास ही हैं जो पटना, बिहार के हैं. मैं उस वक़्त अमेरिका शिफ्ट हो चुका था तो मैंने तक़रीबन 11 महीना अमेरिका में गुजारने के बाद जब इंडिया लैंड किया तो अचानक से मेरे पास ऑफर आया कि 7-8 दिन बाद चलिए बिहार और वो भी राजधानी पटना नहीं बल्कि छोटे से कस्बे जन्दाहां में भोजपुरी फिल्म करने. चूँकि इससे पहले मैं तेलगु फिल्म भी कर चुका था तो सोचा कि चलो भोजपुरी का जायका भी ले लिया जाये. उन दिनों बहुत ही कमाल का एक्सपीरियंस रहा. सबसे यादगार ये रहता था कि वहां गांव में हमारे डायरेक्टर साहब सुबह 7 बजे का शिफ्ट लगा देते थें. मैं और मेरा मित्र मिंटू किसी तरह भागकर गंगा सेतु पर पागलों की तरह गाड़ी चलाकर सेट पर पहुँचते थें. फिर दोपहर में 12 -1 बजे एक्सरसाइज के लिए मैं कुछ समय निकाल लेता था. हमारे जो लीड एक्टर थें शांडिल्य ईशान उनका वेट का सामान वहीँ एक स्कूल के कमरे में रखा था. जहाँ हम एक्सरसाइज करते वहां पर लाइट आ-जा रही थी और ना ही जेनरेटर की व्यवस्था थी. तब उस दोपहर की कड़क गर्मी में ऐसा लगता जैसे कोई टॉर्चर चेंबर में हूँ. करीब एक महीना जन्दाहां में शूटिंग चली. पूरी यंग यूनिट थी इसलिए माहौल में मस्ती थी, सभी शूटिंग खत्म होने के बाद मस्ती भी करते सिवाए डायरेकटर के क्यूंकि वो सिर्फ काम में ही डूबे रहते थें. 

कई बार जिंदगी को बिना प्लान किये छोड़ देना चाहिए : अजीत अंजुम, वरिष्ठ पत्रकार (पूर्व मैनेजिंग एडिटर, इंडिया टीवी)

By : Rakesh Singh 'Sonu'


मेरा जन्म बिहार के बेगूसराय जिले में हुआ, मेरे पिताजी एक एडवोकेट थें और जब वे ज्यूडिशियल सर्विस में आये तो उनके साथ ही अलग-अलग शहरों में रहते हुए मेरी पढ़ाई-लिखाई हुई. मेरी स्कूलिंग बेगूसराय से शुरू हुई फिर चतरा, बाढ़ आदि जगहों से पढ़ते हुए हमने हाजीपुर से 12 वीं किया. इंटरमीडियट दरभंगा के सी.एस. साइंस कॉलेज से किया. फिर हिस्ट्री ऑनर्स से ग्रेजुएशन मुजफ्फरपुर के एल. एस. कॉलेज से किया. मुजफरपुर में पढ़ते समय ही पता नहीं कैसे शौक जगा अख़बार में लिखने-पढ़ने का. उस समय पटना से तीन-चार बड़े अख़बार छपा करते थें जिनमे 'दैनिक हिंदुस्तान' कुछ ही साल पहले शुरू हुआ था. 'नवभारत टाइम्स' पटना से शुरू हो चुका था. इनके आलावा 'आज' और 'जनशक्ति' भी था. ये सारे अख़बार मुजफ्फरपुर से आते थें, दिल्ली से 'जनसत्ता' छपकर आता था. तो उस दौरान अख़बार पढ़ते-पढ़ते मुझे लगा कि कुछ लिखना चाहिए तो हमने 'पाटलिपुत्र टाइम्स' में लेटर-टू-एडिटर लिखना शुरू किया. फिर मेरा परिचय मुजफ्फरपुर के कुछ लोकल पत्रकारों से हो गया. मैं साइकल उठाता और कॉलेज जाने के पहले और कॉलेज से फ्री होने के बाद कल्याणी चौक जाने लगा जहाँ मुजफ्फरपुर के सारे लोकल पत्रकार जमा होते थें. और सुबह अख़बार के बण्डल में अपनी खबरें खोजते थें फिर शाम में चाय की दुकान पर उनके साथ बैठकें हुआ करती थीं. ये सन 1987 की बात है और मैं उन पत्रकारों की महफ़िल का सबसे जूनियर सदस्य था. तब मेरी उम्र 19-20 साल थी.
उनके बीच उठने-बैठने के दरम्यान थोड़ी दिलचस्पी जगी कि कैसे पत्रकारिता किया जाये. फिर कुछ छिट-पुट वहां के शहर व उसकी समस्याओं के बारे में लिखकर इधर-उधर और दिल्ली के अख़बारों में भेजने लगा. कुछ कहीं-कहीं धीरे-धीरे छपने लगा. उसके बाद शौक और परवान चढ़ा. फिर वहां चार-पांच हमलोगों का एक ग्रुप बन गया जिसमे एक रमेश पोद्दार थें जो हमलोगों में सबसे सीनियर थें जो मुंबई से निकलनेवाली मैगजीन 'करंट' के रिपोर्टर थें. उस ग्रुप में एक विकास मिश्रा थें जो अभी 'लोकमत', नागपुर के संपादक हैं. वो भी स्ट्रगल कर रहे थें. एक रवि प्रकाश थें जो अभी मुंबई में हैं. तो चार-छः लोगों का हमारा एक ग्रुप बन गया. मैं उन सबके साथ ही किसी चाय की दुकान पर बैठ जाता था. फिर उन्हीं सब के बीच रहते हुए पत्रकारिता के प्रति जिज्ञासा भी हुई और दिलचस्पी भी पैदा हुई. फिर उसके बाद किसी सम्पर्क के द्वरा किसी ढंग से मैं पटना पहुंचा. उस वक़्त 'पाटलिपुत्रा टाइम्स' आखिरी दौर में था. मणिकांत ठाकुर तब उसके एडिटर थें. उनसे मैं मिला और मुजफ्फरपुर के मीनापुर ब्लॉक के संवाददाता के तौर पर पहली बार एक चिट्ठी हमें वहां से मिली. मुजफ्फरपुर में पहले से संवाददाता थें और हर ब्लॉक का वो रिपोर्टर बना देते थें. तो मीनापुर संवाददाता के रूप में मैं कुछ खबरें भेजता था. कुछ मेरे नाम से छपती तो कुछ मीनापुर संवाददाता के नाम से. सुबह होते ही वही जिज्ञासा और उत्साह रहता था कि मैंने कुछ भेजा और वह छपा. और तब कम्पटीशन की भी फिलिंग होती थी. वहीँ से मुझे लगा कि अब मुझे यही करना है.
 तब मेरे पिताजी को समझ में नहीं आ रहा था कि उनका लड़का किस चक्कर में पड़ा हुआ है, क्या कर रहा है लेकिन फिर कुछ ही दिनों में उन्होंने यह समझा कि नहीं, इसको अगर यही करने का मन है तो इसको सपोर्ट करना चाहिए. और उसके बाद फिर पिताजी का सपोर्ट भी मुझे मिलने लगा. कॉलेज में मेरी पढ़ाई-लिखाई में दिलचस्पी कम होती गयी और पत्रकारिता की तरफ ज्यादा रुझान बढ़ता गया. कोर्स की किताबें कम तो अख़बार ज्यादा पढ़ता था. उस समय 5-6 अख़बार मैं रोजाना पढ़ता था. शाम में हम सभी बैठकर आपस में बातें करतें कि आज इस बार तुम्हारा वहां छपा, इस हफ्ते उसका वहां छपा. उस समय लोग आज की तरह पत्रकारिता का कोर्स नहीं करते थें. उसके बाद हमारे कुछ साथी पटना शिफ्ट हुए तो मैं भी पटना आ गया. पटना, भिखना पहाड़ी में मेरे मामा का एक मकान था, उसमे एक फ्लैट ले लिया जिसमे चार रूम थे. फिर पांच दोस्तों को हमने वहीँ बुला लिया. रवि प्रकाश, अभिमनोज, रत्नेश कुमार, विकास मिश्रा और सुधीर सुधाकर. फिर सभी किराये पर अपने-अपने कमरे बांटकर रहने लगें. पांच पत्रकार थें, पांच साइकल थी और पांचों भटक के फ्रीलांसिंग करते थें. इधर-उधर अख़बारों में नौकरी तलाशते थें. हमारे 5 के ग्रुप में तीन को नौकरी मिल गयी. रवि प्रकाश और विकास 'जनशक्ति'में तो अभिमनोज बाहर के अख़बारों के लिए लिख रहे थें. मैं कुछ घटनाएं जो बिहार में हो रही थीं, उनपर रिपोर्ट बनाकर अख़बारों के लिए भेजता था. दैनिक आज में उस समय एक अभिनाश चंद्र मिश्रा हुआ करते थें जो अभी पटना से समकालीन तापमान निकालते हैं. वे समाचार संपादक थें और उस दौर में उन्होंने मेरी काफी मदद की. कुछ कुली की समस्या, कुछ गरीबों, झुगी- बस्तियों की समस्या, जेल में होनेवाली गुंडागर्दी की समस्या इस तरह के टॉपिक का आइडिया लेकर मैं जाता था. वे कहते थें "ठीक है लिखकर लाइए". फिर दो दिन मेहनत करता था. उसपर लिखकर ले जाता था और छपता था. उस वक़्त 50 रूपये एक लेख के मुझे मिलते थें. लेकिन मुजफ्फरपुर में ही रहते हुए एक और चीज हुई थी कि उस समय दीनानाथ मिश्रा पटना, नवभारत टाइम्स के संपादक थें और उन्होंने एक सिलसिला शुरू किया था परिसर संवाददाता, विश्वविधालय संवाददाता की नियुक्तियों का. मुजफ्फरपुर से तीन दावेदार थें उसमे एक मैं, एक हरि वर्मा और एक रवि प्रकाश. तब दीनानाथ मिश्रा, उदय कुमार (जो अभी अमरउजाला में हैं) एवं अन्य लोग आये थें हमारा टेस्ट लेने. हम तीन लोग परिसर संवाददाता में सलेक्ट हुए. कैम्पस में जो कुछ भी गतिविधियां होती थीं हमलोग नवभारत टाइम्स के लिए खबरें भेजते थें . रवि प्रकाश उसमे नं. 1 था, मैं कम भेज पाता था चूँकि आपस में कम्पटीशन था. तो एक लत वहां से लग गयी. फिर ये लगने लगा कि अब इसके आलावा और हमें कुछ नहीं करना है. हाँ लेकिन उस समय कुछ मंजिल पता नहीं थी. ये भी नहीं पता था कि ये करते हुए आदमी दिल्ली जा सकता है.
तब पटना में 'जनशक्ति' में इन्द्रकांत मिश्रा हुआ करते थें जो फीचर संपादक थें, उन्होंने मुझे काफी छापा. पटना की लोकल समस्याओं पर फुल-फुल पेज की स्टोरी मैं 'जनशक्ति' के लिए लिखा करता था. तब 'जनशक्ति' में एक फुल पेज भी छपता था तो 50 रूपए ही मिलता था. लेकिन तसल्ली होती थी कि फुल पेज मेरे नाम से छपा. आज भी मेरे पास वो 'जनशक्ति' के पन्ने कहीं रखे होंगे. तो यूँ ही कई अख़बारों में 50-50 मिलकर दो-चार सौ महीने में हो जाता था. आने-जाने के लिए साइकल थी. चूँकि सब साथ में रहते थें तो मिलजुलकर चला लेते थें. नीचे एक चाय की दुकान थी, उधारी में वहां से चाय आती थी. खाने के लिए हमलोग वहीँ भिखना पहाड़ी के रिमझिम होटल जाते थें. जब घर जाता तो माँ बिना मांगे ही पिताजी से 100 - 500 रूपए लेकर जबरदस्ती मेरी जेब में डाल देती थी.
तब हम सभी दोस्तों को कभी खाने की किल्लत नहीं हुई लेकिन ये होता था कि कम खर्चे में कैसे करें. तो मुझे छोटी-सी बात याद आती है. वहां रिमझिम होटल में 4 या 6 रूपए में खाना मिलता था. और उसमे 2 रूपए में एक पीस मटन मिलता था. ये बात है 1988 की तब कुछ थाली सिस्टम चलता था पर प्लेट और पर पेट सिस्टम. पेट सिस्टम में एक फिक्स रुपया देकर जितना खाना है भरपेट खाइये. और प्लेट सिस्टम उससे कम में था. तो मैं प्लेट सिस्टम ही लेता था क्यूंकि मैं कम खाता था. हम पैसे के हिसाब से ही पांच-छः पीस मटन लेकर एक-एक खाते थें. लेकिन उसमे भी बड़ा आनंद था. जो थोड़ा बहुत अर्जित करते थें उसी में संघर्ष करते हुए दोस्ती-संगती को इंजॉय करते हुए जीते थें. अक्सर शाम को एक पिंटू होटल में सारे पत्रकार जुटते थें. एक हुंकार प्रेस था पटना में स्टेशन के पास, वहां भी हम सभी 5 लोग जुटते थें जहाँ और लोगों का भी हमारा ग्रुप बना जिनमे मैं सबसे जूनियर था. इसी तरह से एक शुरुआत हुई कि इस क्षेत्र में जगह बनानी है.
 1988 में गोहाटी से एक अख़बार शुरू हो रहा था 'उत्तरकाल' जिसके संपादक थें चंद्रेश्वर जो पहले 'रांची एक्सप्रेस' और 'आज' में थें. उन्होंने उस नए अख़बार के लिए पटना में कुछ लोगों का टेस्ट लिया. मैंने भी टेस्ट दिया. टेस्ट में मैं क्वालीफाई हुआ तो कुछ लोगों का पटना से चयन हुआ. 5 लोग चुने गए थें. मैं, रत्नेश कुमार, अशोक अश्क, सुनील सिन्हा और हिमांशु शेखर. ये हम पांच लोग चयनित होकर गोहाटी गए. 800 रूपए मेरी सैलरी थी. वहां के अख़बार मालिक ने हमें एक फ़्लैट दिया. वहीं से हमलोग चौकी, खाट, टेबल वगैरह खरीदकर लाये. दिनभर अख़बार के दफ्तर में रहते थें. अखबार की प्लानिंग होती थी कि कैसा होगा, क्या कंटेंट होगा. रोज मीटिंग होती थी. कुछ असमिया लोग भी रखे गए थें. लेकिन एक ही दो महीने में जो मालिक का व्यवहार करने का तरीका था उसपर मुझे थोड़ा एतराज होता था. तो मैंने एक दिन तय किया कि मैं नहीं करूँगा. मैंने जाकर मालिक को कह दिया कि मैं नहीं करूँगा, मेरा इस्तीफा ले लीजिये और दो लाइन का इस्तीफा देकर आ गया. फिर मेरे साथियों पर भी दबाव बना कि छोड़ देना चाहिए, क्यूंकि मालिक का दूसरों से बोलने का तरीका सही नहीं है. उस समय सभी युवा थें, 22 साल मेरी उम्र थी, सभी में जोश था तो उन सभी ने भी उसी दिन कह दिया कि हम भी काम नहीं करेंगे. संपादक चंद्रेश्वर उस समय गोहाटी से बाहर थें. समझ लें पूरी टीम ने मेरे नेतृत्व में इस्तीफा दे दिया. घर आये तो मालिक ने किसी आदमी को मनाने भेज दिया. फिर हम पांच में से दो लोग मान गएँ. तीन लोग एक तरफ रह गए और दो लोग एक तरफ हो गए. अगले ही दिन से तीन बटा पांच घर में ही हो गया. तो हमने तय किया कि जिस मालिक की नौकरी छोड़ चुके हैं उसके घर में नहीं रहेंगे. तो एक स्वाभिमान का सवाल हो गया. और इसलिए भी कि हम पांच लोगों में भी फुट हो गया था.
वे दफ्तर जाने लगें और हमलोग अगले दिन अपना चौकी-टेबल पड़ोस के मकान मालिक को आने-पौने दाम में बेचकर अगले ही दिन वापस लौटने की प्लानिंग करने लगें. तो पता चला कि बोडोलैंड का आंदोलन शुरू हो गया है. और गोहाटी से पटना की सारी ट्रेनें 7-8 दिन के लिए बंद हैं तो हमलोग एक स्टेशन के पास छोटे से लॉज में किराये पर रहने आ गए. 10 रुपया पर हेड के हिसाब से हम तीन लोग 30 रुपया रोज देते थें. उसी में 7-8 दिन हमलोग रहें. सामने जाकर एक छोटे से होटल में डोसा-इडली कुछ खा लेते थें. एक ही टाइम दोपहर में खाते थें ताकि दोनों टाइम चल जाये. और इसलिए भी कि अब पैसा भी नहीं बचा था और पैसा मंगाया भी नहीं जा सकता था. घर से पिताजी ने भेजा था नौकरी करने लेकिन यहाँ हमने जॉब छोड़ दिया और उनसे संवाद भी नहीं किया था. मेरे पर एक दबाव था अंदर ही अंदर जैसे मुझे लग रहा था कि मेरी वजह से सबकी नौकरी गयी. लेकिन दोनों साथियों ने सपोर्ट किया कि आपका मुद्दा एकदम सही है कि इस तरह से बेहुदगियाँ बर्दाश्त नहीं करनी चाहिए. उसी समय वहां दूसरा एक अख़बार लॉन्च होने जा रहा था. उस अख़बार से एक-दो लोग हमसे बात करने आये थें फिर पुराने मालिक की तरफ से भी लोग समझाने आये कि "आप भी मान जाइये". हमने कहा- "नहीं अब तो सवाल स्वाभिमान का है कि अब हम नहीं काम करेंगे". दूसरे अख़बार 'पूर्वांचल प्रहरी' के लिए एक ऑफर आया कि फलां जी से आपलोग बात कर लीजिये. तो मैंने कहा कि नहीं जब एक अख़बार की नौकरी हमने किसी सैद्धांतिक आधार पर छोड़ी है और उसके बाद तुरंत दूसरे अख़बार में चले जाएँ तो उनको लगेगा कि हमने धोखा दिया है. आये थे उनके कहने पर और चले गए दूसरे अख़बार में. इसमें संदेह ये होता कि ये लोग प्री प्लान, एक साजिश के तहत अव्यवस्था और बदतमीजियों का बहाना बनाकर छोड़े हैं, दरअसल इनको दूसरे अख़बार में जाना था. इसलिए हमने दूसरे जगह नहीं ज्वाइन किया. सोच लिया कि यहाँ से पटना लौटेंगे फिर तय करेंगे. और अगर दूसरे अख़बार में आना होगा तो 2 महीने बाद आएंगे अभी नहीं. ताकि हमपर कोई गलत इल्जाम न लगे.
 7 दिन जैसे-तैसे काटकर हम पटना आएं. कुछ दिनों बाद हमारे एक मित्र रवि प्रकाश दिल्ली आ गए थें 'पांचजन्य' में, करोलबाग में रहते थें. फिर उनसे हमने सम्पर्क किया तो उन्होंने कहा- "दिल्ली आ जाओ." तो एक ब्रीफकेस लेकर दो कपड़ों के साथ मैं दिल्ली आ गया. दिल्ली में हम इधर-उधर भटके, बसों में यहाँ-वहां जाते थें अख़बार के दफ्तरों के चक्कर लगाते थें. फिर 'जनसत्ता' में कुछ फीचर आर्टिकल लिखना शुरू किया फ्रीलांसिंग रूप में. वहां से मुझे चंद्रशेखर जी ने एक-दो लोगों के नाम चिट्ठी लिखकर दी थी जिसमे प्रवाल मैत थें. उनसे मिला, उन्होंने मुझे अमर उजाला अख़बार में फ्रीलांसिंग के लिए भेजा. फिर वहां फ्रीलांसिंग करना शुरू किया. उसी बीच चौथी दुनिया में एक-दो लोगों की जगह थी तो प्रवाल मैत ने ही मेरे लिए सुधेन्दु पटेल को फोन किया जो उस समय 'चौथी दुनिया' देख रहे थें. क्यूंकि वहां जो संपादक थें वो चुनाव लड़ने चले गए थें. फिर 1989 में 1800 रूपए में मुझे चौथी दुनिया में पहली नौकरी मिल गयी. कुछ महीने वहां रहा फिर उसके बाद चुनाव शुरू हो गए. चुनाव में चौथी दुनिया के लिए मैंने काफी रिपोर्टिंग की.
उसके बाद 1990 में प्रवाल मैत 'अमर उजाला' में ब्यूरो चीफ हो गए. उन्हें कुछ लोगों की जरुरत थी तो उन्होंने मुझे फोन करके बुलाया और ब्यूरो में रिपोर्टर के तौर पर नौकरी दी. 'अमर उजाला' 4 साल रहा फिर किसी वजह से वो मुझे छोड़ना पड़ा. दिल्ली से 'सांध्य प्रहरी' निकल रहा था वहां संपर्क करके ज्वाइन कर लिया लेकिन 6 महीने बाद वहां भी मैनेजर-मालिक का वही तरीका देखकर कुछ मतभेद हुए फिर छोड़ दिया. उसके बाद सितम्बर 1994 में किसी ने बताया कि बीएजी फिल्म्स में सम्पर्क करो अनुराधा प्रसाद कुछ प्रोग्राम दूरदर्शन पर लानेवाली हैं. मैंने उन्हें डायरेक्ट लैंड लाइन पर फोन किया. उन्होंने ऑफिस बुलाकर बात की उसके बाद पहली नौकरी जो मुझे मिली वो 10000 रूपए महीने की नौकरी थी. लेकिन उसके पहले बीएजी में ही मैंने दो-तीन महीने फ्रीलांसिंग किया. अलग-अलग सब्जेक्ट पर दूरदर्शन के लिए इन्वेस्टिगेटिव डाक्यूमेंट्री बनानी होती थी. मैंने बहुत मेहनत के साथ दो-तीन डाक्यूमेंट्री बनायीं जो उनको पसंद आया. उसके बाद 'रु-ब-रु' लॉन्च हो रहा था 'जी न्यूज' पर जो उस समय एल.टीवी था. राजीव शुक्ला उसके एंकर थें. तो अनुराधा जी ने कहा कि "आप फुल टाइम ज्वाइन कर लीजिये." फिर मैंने 1995 के जनवरी में फुल टाइम ज्वाइन किया. उसके बाद मैं फिर 2002 में एक साल के लिए आजतक चला गया था. 2003 में फिर वापस आया बीएजी क्यूंकि वहां बहुत सारे प्रोग्राम स्टार न्यूज के लिए प्लान हो रहे थें. उसके बाद हमने 'पोल खोल' 2004 में किया. 'रेड अलर्ट' पहले शुरू हो चुका था. सनसनी 2004 में शुरू हुआ. 2007 में न्यूज 24 लॉन्च होना था. फरवरी से हमने प्लान शुरू किया, टीम बनी. मैं मैनेजिंग एडिटर था. वहां लगभग 10 साल रहने के बाद मैं 2014 के अगस्त में इंडिया टीवी में मैनेजिंग एडिटर बनकर गया. फिर अगस्त 2017 में इंडिया टीवी छोड़ दिया.
अभी फिर से फ्रीलांसिंग कर रहा हूँ. अभी हम कुछ नहीं सोचे हैं, कोई प्लान नहीं किये हैं, कई बार जिंदगी को बिना प्लान के छोड़ना चाहिए. अभी कई वेबसाइट के लिए लिख रहा हूँ. दिल्ली आकर मुझे बहुत ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा. दोस्तों ने काफी सपोर्ट किया. मैं सोचता हूँ कि दिल्ली आने पर अगर रवि प्रकाश ने सपोर्ट नहीं किया होता, उसने कहा ही नहीं होता कि यहाँ आ जाओ तो शायद मैं दिल्ली आ ही नहीं पाता. देवनगर करोलबाग में एक रूम के फ़्लैट में हम 5 लोग रहते थें. भयंकर गर्मी में बेडरोल बिछाते थें और 50 रूपए किराये का पंखा था. क्यूंकि 250 रूपए में खरीदने की किसी के पास क्षमता नहीं थी. किराये पर ही सीलिंग फैन लाये, कूलर लेकर रखने की क्षमता नहीं थी. दिनभर घूमते थें, लिखते थें, फ्रीलांसिंग करते थें. बाकि तीन जो रूम पार्टनर थें वो नौकरी में थें. कई बार होता कि दिन में चावल बनता था और एक किलो दही लाते थें फिर दही को मिलाकर, उसमे नमक-जीरा पाउडर डालकर पांचों आनंद से खाकर काम करने निकल जाते थें. सिमित संसाधन में अपने ढंग से रहने की आदत डालना हम सीख चुके थें. हमलोग उस स्ट्रगल को भी इंज्वाय कर रहे थें.

स्कूल बंक करने पर पापा बेल्ट से पिटाई करते थें : लक्ष्मी रतन शुक्ला, युवा एवं खेल मंत्री, प. बंगाल

By : Rakesh Singh 'Sonu'


मेरा जन्म हावड़ा (प.बंगाल) में हुआ. पिताजी यू.पी. से बिलॉन्ग करते हैं. मेरी खेल-कूद में इतनी व्यस्तता रही कि 10 वीं के बाद नहीं पढ़ पाया. हम साधारण परिवार से थें. हर आदमी की जिंदगी में माता-पिता का सपोर्ट अहम रहता है. मुझे भी माँ-बाप का बहुत सपोर्ट मिला. आज 7 साल हो गएँ माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमलोगों के लिए उनका त्याग और सेवा भावना याद आता है मुझे. हम दो भाई है. दाल-भात-चोखा खाकर बड़े हुए हैं. बचपन से ही दूसरे सम्पन्न बच्चों को देखकर हमें कभी लगा नहीं कि वैसा हमें भी मिलना चाहिए, मन में कोई जलन भाव नहीं था. जो घर में मिलता वही खा लेते थें. पहले भी हम घर में खुद ही खाना हाथ से निकालकर खाते थें और आज भी खुद ही निकालकर खाते हैं. हर बच्चे के पिता बिजनेसमैन नहीं हो सकते, हर बच्चे के घर में गाड़ी हो नहीं सकती इसलिए हमे लगता है कि ऊपर वाला जैसे दे उसी हिसाब से चलना चाहिए. हमारे पिताजी का खेल के प्रति बड़ा रुझान था इसलिए हम दोनों भाई क्रिकेट, कैरम, फुटबॉल सब खेलें लेकिन फिर क्रिकेट में हम निकल गएँ. पिता जी के साथ खेल के मैदान में जाते थें जब क्लब के माध्यम से खेलते थें, स्कूल से भी खेलते थें. मैं विकेट कीपिंग करता था और जिस कैम्प से खेलता था पेस फाउंडेशन उसमे डेनिस लिली (मशहूर अंतर्राष्ट्रीय गेंदबाज) आते थें और ऑल ओवर इंडिया से बच्चों को सेलेक्ट कर ले जाते थें. हम विकेट कीपिंग करते थें और टेनिस बॉल क्रिकेट में बॉलिंग करते थें.
करीब 1000 -500 बच्चों का एक ट्रायल मैच था ईडन गार्डन में. हर क्लब का चिट्ठी लेकर जाना पड़ता था. हम जिस क्लब से प्रैक्टिस करते थें उस क्लब से हमे चिट्ठी नहीं मिला था क्यूंकि हम विकेट कीपर थें. तो यूँ ही पापा बोले कि - "जाओ एक बार बॉलिंग ट्रायल देकर आओ. मैं गया, पहले तो एंट्री नहीं मिली फिर बहुत देर इंतजार करने के बाद किसी तरह सबसे लास्ट में बॉलिंग करने का मौका मिला. बंगाल से दो लड़के सेलेक्ट हुए. एक मैं और एक फैजल. चूँकि इसके पहले हम विकेट कीपर थें और अगल-बगल होनेवाले छोटे-मोटे टेनिस बॉल क्रिकेट ट्रूनामेंट में ही बॉलिंग करते थें. ऐसे में यह सेलेक्शन मेरी लाइफ का टर्निग पॉइंट साबित हुआ. वहां से कारवां बढ़ता रहा. फिर अंडर 16 बंगाल के लिए खेलें, 2 साल ईयर बेस्ट हुए. अंडर 19 बंगाल खेलें, 2 साल ईयर बेस्ट हुए. फिर अंडर 19 वर्ल्डकप में मौका मिला तो साऊथ अफ्रीका गए. फिर वहां से आकर एक साल रणजी ट्रॉफी के लिए खेलें. उसी दौरान इंडियन टीम में सेलेक्शन हो गया. अच्छा परफॉर्मेंस रहा. 2 साल टीम के साथ खेलें उसके बाद फिर पैर (लेफ्ट लेग) फ्रैक्चर हो गया. अब बॉलिंग करने में दिक्कत होने लगी इसलिए हम बैटिंग करने लगें. उसके बाद आई.पी.एल. आया और हम जैसे युवाओं को बहुत स्कोप मिला. आई.पी.एल. आने के बाद तो सभी लोग मैच देखना चालू कर दिए. आई.पी.एल. में मेरा ऑल राउंडिंग परफॉर्मेंस हुआ. नाइट राइडर्स के लिए 6 साल खेलें. फिर एक साल दिल्ली, एक साल हैदराबाद के लिए और उसके बाद राजनीति के पिच पर खेलने आ गएँ.
मैंने 10 साल बंगाल जोन के लिए कप्तानी भी की. इसलिए आज भी जितने मित्र हैं मुझे कैपटन ही बोलते हैं. आज से 10-12 साल पहले रोहन गावस्कर, देवांग गाँधी, दीपदास गुप्ता मुझे नेता जी कहकर बुलाते थें. बाद में दीदी (ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, प. बंगाल) का आशीर्वाद मिला और हम सच में नेता बन गए. दीदी ने मुझपर भरोसा करके पॉलिटिक्स में आने को कहा और फिर मेरे जो सपोटर्स-फ्रेंड थें सबका साथ मुझे मिला. लोगों को सेवा करने का पहली बार मौका मिला. जब यह ऑफर मिला तो हम जरा भी विचलित नहीं हुये. हालांकि हम एग्रेसिव हैं लेकिन सामनेवाले को पता नहीं चलने देतें. मुझे पिता जी की एक बात ध्यान में आती है कि "सौ बनाओ तो रसगुल्ला खाओ, जीरो बनाओ तो रसगुल्ला मत खाओ ऐसा नहीं होना चाहिए. हमारी लाइफ में ऐसा ही रहा. उतार हो चढ़ाव हो, हम एक टाइप के ही रहते हैं. चुनाव टिकट मिलने से हम बहुत ज्यादा खुश भी नहीं हुए थें और ना ही कभी मैच हारने से बहुत ज्यादा दुखी होते थें. लाइफ को बैलेंस करके चलना बहुत जरुरी है. लास्ट ईयर क्रिकेट खेले थें लेकिन अब नहीं खेलते. बस थोड़ा बहुत प्रैक्टिस कर लेते हैं. अभी व्यस्तता बढ़ गयी है. अभी हमने हावड़ा में क्रिकेट कोचिंग कैम्प एल.आर.एस. बांग्ला स्पोर्ट्स एकेडमी खोला है जो हिंदुस्तान का पहला कैम्प है जहाँ एक भी पैसा नहीं लिया जाता है. लगभग 8-9 सौ बच्चे प्रशिक्षण ले रहे हैं. हमारे साथ खेलनेवाले संगी साथी ही वहां कोच हैं.
हमारी लव मैरिज हुई है. मेरे दो बच्चे हैं. पत्नी अभी हेल्थ डिपार्टमेंट में डिप्टी सक्रेटरी हैं. हम लोग एक जगह रहते थें. आमतौर पर हर व्यक्ति की लाइफ में जो प्रेम कहानी होती है मेरी भी वैसी ही स्टोरी है. दोस्ती-यारी, प्यार-मोहब्बत उसके बाद शादी. तब हम दोनों का ज्यादा घूमने का मौका नहीं मिला क्यूंकि तब वो पढ़ाई में व्यस्त रहती थीं और हम खेल में. लेकिन आज हम दोनों ही अपने- अपने काम में व्यस्त रहते हुए भी एक-दूसरे के लिए, परिवार के लिए वक़्त निकाल लेते हैं.
हम बचपन में ज्यादा स्कूल जाते नहीं थें. पढ़ाई में यूँ तो अच्छे थें लेकिन स्कूल जाते, एटेंडेंस करते और हाफ टाइम में निकल जाते खेलने के लिए. जब घर में शिकायत पहुँचती तो हम बहुत मार खातें. बेल्ट और चप्पल-जूते से पापा खूब पिटाई करते थें. जब टीचर घर में ट्यूशन पढ़ाने आते तो हम हमेशा भागने की टेंडेंसी रखते. जब टीचर को आते देख लेते तो कभी हम पलंग के नीचे छुप जाते थें, कभी पूजा करने बैठ जाते थें. लेकिन स्कूल और घर के टीचर लोग बड़े सपोर्टिव थें और हमारी शरारतों से वे लोग हार गए थें. तंग आकर उन्होंने हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया. भगवान की दया से हम इतना पढ़ लेते थें कि पास हो जाते थें. आज हम प्राउड फील करते हैं कि हनुमान जूट मिल हिंदी हाई स्कूल से पढ़कर हम यहाँ तक पहुंचे हैं.

जिस टाइम में मैं आयी उस टाइम में भोजपुरी में सिर्फ वल्गैरिटी बिकती थी : देवी, लोक-गायिका

By : Rakesh Singh 'Sonu'


मेरी स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई छपरा होम टाउन में हुई. सिवान के विधा भवन महिला कॉलेज से ग्रेजुएशन कम्प्लीट कर मैंने दिल्ली के गंधर्व संगीत महाविधालय से संगीत की तालीम हासिल की. इसके बाद श्री राम कला केंद्र से कत्थक की शिक्षा ली. गायन का शौक होने की वजह से बहुत छोटी उम्र में ही गायन शुरू कर दिया था. घर में मेरी परवरिश अच्छे से हुई. पापा सुलझे विचारों के थें लिहाजा, उन्होंने हमेशा से ही हमलोगों के अंदर जो इच्छाएं थीं, जो क्रिएटिविटी थी हमेशा ही बढ़ावा दिया. तो हमलोग शुरू से ही खेलकूद और म्यूजिक में अटैच रहें क्यूंकि मेरे पापा को लगता था कि ये जो म्यूजिक और खेलकूद है वो बच्चों के लिए बहुत ज़रूरी है. उनके स्वास्थ के लिए अच्छा है, उनके जीवन के लिए अच्छा है. मुझे भी पापा ने काफी प्रोत्साहित किया.
स्कूल-कॉलेज स्तर पर जब भी छपरा में कोई सिंगिंग कम्पटीशन होता पापा मुझे वहां ले जाते और मैं वहां उन्हें अपने प्रदर्शन से नाराज नहीं करती थी. फिर पता ही नहीं चला धीरे-धीरे कब ये शौक जुनून का रूप ले मेरा करियर बन गया. चूँकि हर सिंगर का एक सपना होता है कि वो टीवी चैनल्स पर आये, उसके गाने रिकॉर्ड हों तो जब मैं कमर्शियल लाइन में आयी तब बहुत सारे ऐसे पल आएं जब निराशा हाथ लगी. मेरा बहुत शौक था कि मेरा म्यूजिक एल्बम रिलीज हो. लेकिन जब कंपनियों में जाती थी तो कंपनियों का रवैया बहुत ही ज्यादा कमर्शियल होता, उनको बस बिकने से मतलब होता. तो जिस टाइम में मैं आयी उस टाइम में भोजपुरी में सिर्फ वल्गैरिटी बिकती थी और जब मैं कहती कि भिखारी ठाकुर के गाने गाना चाहती हूँ, महेंद्र मिशिर जी के गाने गाना चाहती हूँ तो कम्पनी इस बात के लिए रेडी नहीं थी. उन्हें लगता था कि ऐसे गाने बिक नहीं सकते हैं तो उस टाइम मुझे बहुत ही ज्यादा स्ट्रगल करना पड़ा. बहुत ही ज्यादा वे लोग प्रेशर देते थें कि नहीं आप वल्गर गाने गाइये तभी आप मार्केट में बिक सकती हैं, लेकिन मैं अपनी बात पर कायम रही. मैंने कहा- मैं जब गाउंगी तो वही गाने गाउंगी जो समाज में अच्छा मैसेज देते हों, और जो मेरी आत्मा को अच्छा लगता हो. फिर मैंने कई सालों तक कोई रिकॉर्डिंग नहीं की बस मैं अपनी जगह पर अडिग थी कि मुझे अच्छे ही गाने गाने हैं और ऐसा हुआ कि अंततः फिर म्यूजिक कम्पनी को ही मेरे सामने झुकना पड़ा.
उन्ही दिनों जब एक दिन अचानक मुझे म्यूजिक एल्बम निकालने का आइडिया आया तो फिर उसके लिए मैंने दिल्ली जाकर काफी स्ट्रगल किया. तब टी-सीरीज ने मुझे रिजेक्ट कर दिया. इस बीच मेरे गाये लोकगीतों का एक एल्बम 'पूर्वा बयार' एक छोटी सी कम्पनी द्वारा निकाला गया. यह एल्बम माउथ पब्लिसिटी से काफी हिट हो गया. इसके बाद हम दोनों की चल निकली. वो म्यूजिक कम्पनी भी स्टैब्लिश हो गयी. इसके बाद बहुत जल्द ही टी-सीरीज ने मुझे बुलाकर एक एल्बम तैयार करवाया. फिर टी-सीरीज से मेरा पहला सुपरहिट एल्बम आया 'अईले मोरे राजा'. ये इतना ज्यादा हिट हुआ की टी-सीरीज के अलावा और कई कंपनियों की लाइन लग गयी. उसके बाद मुझे बहुत ज्यादा स्ट्रगल नहीं करना पड़ा. फिर तो एक के बाद एक एल्बम और स्टेज शो मिलने लगे. 'राजधानी पकड़ के आ जइयो', 'यारा','बावरिया', 'शेरावाली', 'फिर तेरी याद आई' और छठ एवं दुर्गापूजा के ऊपर बहुत से भक्ति एल्बम खास रहें. 2012-13 में मैंने एक हिंदी फिल्म प्रोड्यूस किया 'जलसा-घर की देवी', जिसमे मुख्य किरदार भी निभाया था. फिल्म में रविंद्र जैन जी का संगीत था. भले ही यह मूवी उतनी कमर्शियल सक्सेस नहीं कर पायी लेकिन तारीफें-सराहना हर तरफ से मिली. एक भोजपुरी फिल्म 'गंगा किनारे प्यार पुकारे' जिसमे मैंने सेकेण्ड लीड रोल निभाया, एक डॉक्टर के किरदार में थी. लेकिन मेरा हमेशा ध्यान गायिकी पर ज्यादा रहा .
मैं चाहती हूँ कि जो भी गाऊं मुझे अच्छा लगे और साथ ही साथ एक अच्छे भाव उत्त्पन करे. आजकल के खासकर  भोजपुरी के गाने स्तरहीन हो गए हैं. वैसे गानों से अच्छा है मैं गाऊं ही नहीं क्यूंकि ऐसे गाने समाज को बिगाड़ने वाले होते हैं, महिलाओं की सीधे-सीधे बेइजत्ती करते हैं. मैं मानती हूँ कि इसे बढ़ावा देने के लिए कलाकारों का भी दोष है. सिर्फ फिल्मों में नहीं बल्कि पूरे वर्ल्ड में वल्गैरिटी है. लेकिन कमाल की बात देखिये कि जो वल्गैरिटी को गाते-बढ़ाते हैं वही आगे बढ़ गए हैं. अश्लील गीत आज महिलाएं भी गा रही हैं तो जितना वैसे गीत गानेवाले पुरुष कलाकार दोषी हैं उतना ही महिलाएं भी दोषी हुईं. निर्माता-निर्देशक बहुत बड़ा जिमीदार होता है अच्छे और गलत के लिए. मैं कम कपड़ों में एक्सपोज को बुरा नहीं मानती. लेकिन यहाँ औरतों को शो पीस बनाकर रख दिया गया है. लेकिन फिर भी जो वास्तव में कला है, रियलिटी है उसको भले ही टाइम लगे लेकिन वो एक मुकाम पर पहुंचेगी ही. और सच्ची कला को किसी शॉर्टकट की ज़रूरत नहीं होती.
मुझे हर तरह के गाने का शौक है लेकिन गजल और रोमांटिक सॉन्ग ज्यादा फेवरेट हैं. चूँकि मुंबई म्यूजिक और आर्टिस्टों की जगह है इसलिए 2006 में मैंने मुंबई शिफ्ट किया. बॉलीवुड की एक हिट फिल्म 'थैंक यू' में म्यूजिक डायरेक्टर प्रीतम के साथ काम किया. एक रिमिक्स सांग 'रजिया गुंडों में फंस गयी' गाय जो काफी पसंद किया गया. एक आर्ट मूवी 'वूमेन फ्रॉम द ईस्ट' में गाने गए हैं जिसे टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में भेजा गया.
ऐसा नहीं है कि मेरी लाइफ में अब कोई स्ट्रगल नहीं है...पहले खुद को स्टैब्लिश करने का स्ट्रगल था तो अब उस साफ़-सुथरी छवि को बनाये रखने का स्ट्रगल है. तो मुझे लगता है कि जब आप अपने सिद्धांतों पर कायम रहते हैं तो आपको परिस्थितियां भी सपोर्ट करती हैं. मैं कभी विपरीत परिस्थिति में झुकी नहीं और आज जो मेरे अपने ऑडियंस हैं उन्हें और उन घर-परिवारों को धन्यवाद देना चाहूंगी जिन्होंने मेरे अच्छे गीतों को बहुत अच्छे से एक्सेप्ट किया. और मैं हमेशा ये मानती हूँ कि जो क्वालिटी चीजें हैं, अच्छी चीजें हैं वही कायम रहती हैं, उसका असर बहुत दिनों तक लोगों के हृदय में रहता है. 

जिस शहर में आम स्टूडेंट बनकर साइकल से घूमता था उसी शहर में पुलिस जिप्सी में घूमने लगा : आलोक राज, ए.डी.जी., लॉ एन्ड ऑर्डर, बिहार पुलिस

By: Rakesh Singh 'Sonu'



मेरा गृह जिला मुजफ्फरपुर है लेकिन जन्म पटना में हुआ. मैं अपने चार भाई बहनों में सबसे बड़ा हूँ. मेरे पिता जी श्री परमेशवर प्रसाद बिहार सरकार में नौकरी करते थे. मेरे जन्म के समय मेरी माता जी प्रोफ़ेसर कृष्णा बाला स्टूडेंट थीं, बाद में उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और वो पटना यूनिवर्सिटी के मगध महिला कॉलेज में समाजशास्त्र की लेक्चरर हुई फिर प्रोफ़ेसर बनीं. मेरी प्रारम्भिक शिक्षा पटना में हुई. क्लास 2 तक संत जोसफ कॉन्वेंट हाई स्कूल में, फिर क्लास 8 तक संत माइकल्स हाई स्कूल में और फिर मैट्रिक तक की पढ़ाई सर गणेश दत्त पाटलिपुत्रा हाई स्कूल में हुई. 1980 में मैंने मैट्रिक की परीक्षा फर्स्ट डिवीजन से पास की तो पिता जी ने खुश होकर एच.एम.टी. जनता घड़ी दिया. साइंस कॉलेज में मेरा एडमिशन हो गया तो फिर एक साइकल भी मुझे मिली. कंकड़बाग से साइंस कॉलेज साइकल से जाना और आना, ये मैंने लगातार छह साल तक किया. कभी कभी कॉलेज बस से भी चला जाता था लेकिन ज्यादातर साइकल से ही जाता था और एक तरह से वो मेरे स्वास्थ के लिए भी अच्छा रहा. मैंने साइंस कॉलेज से जूलॉजी में एम.एस.सी. तक की पढ़ाई की. तब एम.एस.सी. में गोल्ड मेडलिस्ट भी रहा. मैं कॉलेज में बहुत अच्छा डिवेटर था, मेरा जेनरल नॉलेज बहुत अच्छा था इसलिए क्विज में भी मैं हिस्सा लिया करता था. कॉलेज के दौरान कई बार डिवेट के लिए पुरस्कृत भी हुआ. 1987 में मैं सिविल सर्विस के लिए यू.पी.एस.सी. इम्तेहान में बैठा. पहली बार में ही चयन हो गया रेलवे में और उसके बाद 1988 में दुबारा परीक्षा दी तो आई.पी.एस. में आ गया. मेरी जिंदगी में एक मोड़ 1976 में आया जब उन दिनों हम महेन्द्रू मोहल्ले में किराये के मकान में रहा करते थें. हमारे पिता तब बिहार सरकार में सांख्यिकी विभाग में काम करते थें और माँ तब मगध महिला में लेक्चरर हो गयी थीं. अचानक मेरे पिता जी के बड़े भाई यानि मेरे चाचा जी का देहांत हो गया. फिर मेरे चचेरे भाई-बहन चाची के साथ हमारे बीच पटना उसी घर में रहने आ गए. बचपन से एक चीज मैंने सीखी थी परिवार के बीच किस प्रकार से आप अपने संसाधनों को शेयर करते हैं. मुझे याद है कि दो कमरे का घर था और उस ज़माने में जब एक साथ मेरे चार भाई-बहन बढ़ गए तो पलंग हटाकर हमलोग ज़मीन पर ही सोते थें. वो मकान जर्जर हो चुका था और बरसात के दिनों में जब बारिश होती तो हमलोग जगह-जगह बाल्टी और तसला आदि बर्तन लगाते थें क्यूंकि पानी चूता था. उसके बाद पिताजी ने कंकड़बाग में अपना घर बनाया और हमलोग उस नए घर में 26 जनवरी, 1980 में रहने चले आये. उस समय पिताजी के पास थोड़ा पैसों का आभाव था तो मुझे याद है तब हमलोगों के घर में फ्लोर नहीं बना था, खाली ढलैया करके छोड़ दिया गया था. बहुत बाद में मोजैक वगैरह कराया गया. उन दिनों हमलोगों के यहाँ एक नौकर हुआ करता था जो खाना भी बनाता था. लेकिन वो लड़ाई करता कि इतने आदमी का खाना बनाना पड़ता है, फिर बर्तन भी धोना पड़ता है. तब पिता जी ने कहा कि अब से बर्तन हर आदमी अपना अपना धोएगा. फिर हमलोग खाना खाने के बाद अपना बर्तन स्वयं धोते थें. उसके बाद कभी अपना काम करने में लाज नहीं लगा और ये एक आदत सी बन गयी. बाजार से सब्जी लाना, घर का काम करना दिनचर्या में शामिल हो गया. उस दरम्यान सबकी ड्यूटी बन गयी घर की सफाई करने की. हफ्ते में एक आदमी की दो दिन ड्यूटी होती थी. हमारा कमरा बंटा हुआ था. भाइयों का कमरा अलग और बहनों का कमरा अलग था. तो सबको अपना अपना कमरा साफ़ करना था. दो दिन मैं तो दो दिन मेरा हमउम्र चचेरा भाई अपने कमरे की सफाई करते थें. दो भाई छोटे थें इसलिए उनको सफाई से मुक्ति मिली हुई थी. हमलोगों ने तब इन कामों के लिए विरोध नहीं किया क्यूंकि नौकर पहले ही बोल चुका था कि मैं नहीं करूँगा और माँ को डर था कि वो कहीं भाग ना जाये. तब नौकर मुश्किल से मिलता था और ज्यादा दिन टिकता नहीं था. तो जॉइंट फैमली में कैसे रहा जाता है, कैसे सुख-दुःख शेयर किया जाता है वो मैंने सीखा और आजतक वो संस्कार मैंने अपने बच्चों को भी दिया है. उस समय अचानक जो चार-पांच लोगों की फैमली बढ़ गयी तो पिताजी की आर्थिक स्थिति थोड़ी गड़बड़ा गयी. उनकी बड़ी इच्छा थी उस समय स्कूटर खरीदने की लेकिन पैसा नहीं था तो महेन्द्रू से मेरे पिता जी साइकल से सचिवालय आते-जाते थें. पिता जी ने बाद में विजय डीलक्स स्कूटर लिया और फिर उसे बेचकर बाद में बजाज का स्कूटर लिया जो आज भी निशानी के तौर पर मेरे घर में मौजूद है. उस समय दोस्तों को देखकर लगता था कि भाई वो हमसे ज्यादा अच्छे कपड़े पहनते हैं, वो चार चक्केवाली गाड़ियों में घूमते हैं और हमलोग बहुत ही साधारण ढंग से रहते हैं. मुझे याद है तब दुर्गापूजा के टाइम में हमलोगों के लिए कपड़े का थान आता था. यानि हम पांच भाइयों के कपड़े एक ही थान से सिलाते थें. पांचों का पैंट एक ही कलर का, शर्ट एक ही तरह का बरात के बैंड पार्टी की तरह का होता था. और लड़कियों का भी उसी तरह से एक जैसा सलवार कुर्ता सिलाता था. लेकिन 1980 के बाद जब गवर्मेंट की पॉलिसी चेंज हुई तो माँ-पिता जी का पेय स्ट्रक्चर बढ़ गया. हमलोगों के बचपन में जो आर्थिक आभाव था वो जवानी में कदम रखते हुए काफी हद तक खत्म हो गया. मेरी माता जी चूँकि शिक्षाविद थीं तो उन्होंने घर में पढ़ाई का बहुत ही अच्छा माहौल बनाया. माँ पिता जी ने जो भी कमाया वो हम सबकी पढ़ाई पर ज्यादा खर्च किया, बेस्ट एजुकेशन जो हो सकता था उन्होंने सबको दिलाया. माँ-बाप ने एजुकेशन के प्रति जो समर्पण दिखाया आज हमलोग उसी की रोटी खा रहे हैं. हम सभी भाई-बहन आज वेल सेटल्ड हैं और सभी जिंदगी में अच्छा कर रहे हैं.
अब सर्विस की बात करूँ तो पुलिस की नौकरी अपने आप में एक स्ट्रगल है. मैंने जब कम्प्लीट किया तो मेरा रैंक बहुत अच्छा था इसलिए मुझे बिहार कैडर मिल गया और फिर मेरी ट्रेनिंग भी पटना में शुरू हो गयी. तो जिस शहर में एक आम स्टूडेंट बनकर मैं साइकल से घूमता था उसी शहर में पुलिस जिप्सी में बैठकर ट्रेनिंग में घूमने लगा. ट्रेनिंग खत्म करके 1990 में पटना आया तो मेरी पहली पोस्टिंग हुई ए.एस.पी. पटना सिटी. यहाँ से जॉब का स्ट्रगल शुरू हुआ जिसे मैं स्ट्रगल नहीं बल्कि चैलेंज मानता हूँ. पटना सिटी में बहुत क्राइम था. मुझे याद है जब मैंने ज्वाइन किया तो उस समय रामशिला पूजन हो रहा था और उसको लेकर वहां हमेशा साम्प्रदायिक तनाव होता था. 1992 में बाबरी मस्जिद प्रकरण हो जाने की वजह से पटना सिटी का माहौल बहुत बिगड़ गया. हमलोगों ने बहुत मेहनत किया और हमारे प्रयास के कारण वहां कोई दंगा नहीं भड़का. मुझे याद है उस दरम्यान 15 दिनों तक लगातार कर्फ्यू था और हमलोग रात-रात भर पेट्रोलिंग करते थें, सर्चेस करते थें. लोगों के बीच जाकर उनमे कॉन्फिडेंस भरते थें. मुझे वहां पहली बार मौका मिला क्रिमनलों के साथ मुठभेड़ करने का. आमने-सामने मुठभेड़ हुआ, अपराधियों ने गोली चलायी. मैंने भी गोली चलायी और उसी दौरान मेरे बॉडीगार्ड को घुटने में गोली लग गयी. उस मुठभेड़ में चार कुख्यात अपराधी मारे गए. जिसके लिए महामहिम राष्ट्रपति द्वारा मुझे 1994 में पुलिस वीरता पदक से अलंकृत किया गया. उसी दरम्यान मेरी जिंदगी में एक दर्दनाक हादसा हुआ. तब मेरे पास सरकारी गाड़ी थी लेकिन घर में पर्सनल कोई चार पहिये की गाड़ी नहीं थी. उन्ही दिनों मेरे पिता जी माँ को स्कूटर पर बैठाकर पी.एम.सी.एच. किसी को देखने गए थें. और रास्ते में लौटते वक़्त चिड़इयाँ टांड पुल पर उनका एक्सीडेंट हो गया जिसमे माँ की मृत्यु हो गयी. बहुत कम उम्र में माँ का इस तरह से चले जाना मेरे और पूरे परिवार के लिए बहुत दर्दनाक क्षण रहा. हमलोग अंदर से बहुत टूट गए. खैर हमें ईश्वर ने शक्ति दी और फिर से जिंदगी ढर्रे पर आयी. तब मेरी छोटी बहन की शादी तय हो गयी थी चूँकि लड़की थी इसलिए हमने उस गमगीन माहौल में उसकी शादी कर दी. कन्यादान पिता जी ने किया मगर शादी के जितने रस्मो-रिवाज होते हैं अभिभावक के रूप में वो मैंने और मेरी पत्नी ने किया. उसके बाद दोनों छोटे भाइयों की पढ़ाई-लिखाई फिर शादी सब हमलोगों ने किया.
फिर मेरी पोस्टिंग हो गयी सिटी एस.पी. रांची के पद पर और रांची उस समय बिहार के अपराध की राजधानी मानी जाती थी. तब बिहार का बंटवारा नहीं हुआ था. जब मैं रांची जा रहा था तब मुझे डी.जी.पी. ने आगाह करते हुए कहा कि 'वहां जा रहे हो तो देखना बहुत चैलेन्ज है.' मैं रांची करीब एक साल रहा. उस समय वहां क्रिमनल्स का बहुत बोलबाला था. शाम में 7 बजे के बाद लोग घर से नहीं निकलते थें. मुझे ख़ुशी है कि वहां भी मैंने बहुत काम किया और समाज में व्याप्त भय का माहौल दूर किया. करियर चलता रहा, फिर रेल एस.पी. पटना बना. उसके बाद गुमला फिर पश्चिम सिंहभूम में एस.पी. रहा. पश्चिम सिंहभूम पूरी तरह से जंगली इलाका था और वहां के कल्चर में एक नई चीज जो मैंने देखी तो आश्चर्य हुआ कि स्त्रियों को डायन बताकर प्रताड़ित किया जा रहा है. इतनी प्रताड़ना कि उसे उसी समाज के लोग, उसी के परिवार के लोग डायन बनाकर उसकी पिटाई करते हुए, उसके साथ अमानवीय हरकत करते हुए मार डालते थें. उस समय मैंने इस प्रथा के खिलाफ एक मुहीम चलाई और वहां की स्वयं सेवी संस्थाओं के साथ हमने पैदल मार्च किया, जागरूकता के लिए. उस समय न मोबाईल फोन था न ही सोशल मीडिया, तो जागरूकता के लिए हमें मार्च, भाषण और पोस्टर की जरुरत पड़ती थी. ये बात 1996 से 1998 की है. वहां के गांव , जंगली इलाकों में अन्धविश्वास फैला था, लोग ओझा की बात सुनते थें. वहां एक लड़ाई चली इस अन्धविश्वास और ओझाओं के अगेंस्ट. एक संस्था के साथ मिलकर हमने पीड़ित महिलाओं को सामने लाकर उनका इंटरव्यू कराया और एक सामाजिक चेतना फैलाई. उसके बाद मेरी पोस्टिंग बोकारो हो गयी, फिर वहां से देवघर आ गया. उसके बाद हजारीबाग आया. तब तक हजारीबाग नक्सल प्रभावित इलाका बन चुका था और नक्सलियों से लड़ाई बहुत बड़ी चुनौती थी. उस समय नक्सल दस्ते पुलिस फ़ोर्स पर अटैक करके हथियार लूट लेते थें, निर्दोष ग्रामीणों की हत्या कर देते थें. उनका सामना करना लाइफ का बड़ा चैलेंजिंग फेज था. वहां से सीतामढ़ी एस.पी. बना फिर मैं 3 साल तक पटना में कमांडेंट रहा. फिर 2003 में मेरी पोस्टिंग एस.पी. बेगूसराय के पद पर हो गयी और तब तक बिहार का बंटवारा हो गया था. उसके बाद मैं सी.आर.पी.एफ. में चला गया. उन सात सालों के दरम्यान मुझे बिहार में एंटी नक्सल ऑपरेशन को नेतृत्व करने का मौका मिला फिर बाद में झाड़खंड और फिर पश्चिम बंगाल में.
 मेरे करियर का बहुत ही दिलचस्प फेज आया जब मैं सी.आर.पी.एफ में बंगाल में था. उस समय बंगाल के नंदीग्राम में आम जनता पर काफी अत्याचार हो रहा था हत्या, बलात्कार और लूटपाट के रूप में. और यह अत्याचार एक राजनीतिक दल के समर्थकों और उसके नाम पर असामाजिक गुंडों द्वारा किया जा रहा था. अपने ही गांव में लोगों को रिफ्यूजी होना पड़ा. डर से लोग घर छोड़कर रिफ्यूजी कैम्प में रहने लगें. उस समय पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल के अनुरोध पर 2007 में सी.आर.पी.एफ. को नंदीग्राम भेजा गया और उस फ़ोर्स को लीड करने का मौका मुझे मिला. मैं वहां डी.आई.जी. सी.आर.पी.एफ था. मैंने पहुंचकर देखा कि रिफ्यूजी कैम्प में लगभग 3500 लोग थें. मुझे संतोष है कि मैंने वहां शांति व सुरक्षा का माहौल बनाया. वहां के काम ने मुझे लोकप्रियता भी दिलाई और एक प्रमुख मैगजीन ने यह लिखा कि मुस्लिम औरतें मेरी सलामती के लिए वहां नमाज पढ़ती हैं और लोग मेरी तस्वीर अपने घरों में लगाते हैं. सीआरपीएफ में प्रतिनियुक्ति के दौरान मुझे गोल्डन डिस्क से सम्मानित किया गया. फिर 2008 में मुझे राष्ट्रपति द्वारा सराहनीय सेवा के लिए पुरस्कृत किया गया. वहां से वापस बिहार लौटा 2011 में आई.जी. होमगार्ड के पद पर.
पटना में होमगार्ड डिपार्टमेंट में काम कम था इसलिए समय का सदुपयोग करने के लिए मैंने अपने स्कूल कॉलेज के दिनों के शौक को मौका दिया और गुरु अशोक कुमार प्रसाद के सानिध्य में हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक की ट्रेनिंग शुरू कर दी. फिर 5 साल अपने जॉब के साथ साथ मेरी गायिकी भी चलती रही. फिर जब रांची सी.आर.पी.एफ में गया तो वहां उनका अपना ऑर्केस्ट्रा था और वहां गाना गाने का कल्चर भी था. उसी ऑर्केस्ट्रा में मैंने गाना शुरू किया जिससे थोड़ा शौक को बल मिला. करियर में भी प्रगति होती रही, मैं आई.जी. होमगार्ड बना और फिर 2014 में बिहार में ए.डी.जी., लॉ एन्ड ऑर्डर बना.
2016 में विशिष्ट सेवा के लिए पुनः राष्ट्रपति पदक से तीसरी बार मैं सम्मानित हुआ. वर्क लोड काफी है और मैं 'बोलो जिंदगी' के माध्यम से युवाओं को यह सन्देश देना चाहूंगा कि वे टाइम मैनेजमेंट सीखें, अपनी ऊर्जा को सकारात्मक कार्य में लगाएं और अपनी मंजिल को प्राप्त करने के लिए मेहनत करें. तो मैंने भी टाइम मैनेज किया और इसी दरम्यान क्लासिकल म्यूजिक सीखते-सीखते अपना पहला म्यूजिक एल्बम साईं बाबा के भजनों पर आधारित 'साईं अर्चना' टी-सीरीज के बैनर तले पिछले साल रिलीज किया. मेरा अगला एलबम 'नीरज के गीत’ हिंदी के विख्यात कवि डॉ. गोपाल दास 'नीरज' जी की कविताओं पर आधारित है. मैं पुलिस ऑफिसर हूँ तो मेरी दिली ख्वाहिस है कि देशभक्ति गीतों का भी एक एलबम निकालूं.

हम तीन सहेलियां तीन किलोमीटर पैदल चलकर रोजाना स्कूल देर से पहुँचती थीं : पद्मश्री सुधा वर्गीज, समाजसेविका एवं संस्थापिका 'नारी गुंजन'

By : Rakesh Singh 'Sonu'



मैं केरल के कोट्ट्यम जिले की रहनेवाली हूँ. हमलोगों के पास कुछ जमीनें थीं तो पिताजी खेती-बाड़ी करते थें. मैं तीन भाई-बहन हूँ जिनमे मैं ही सबसे बड़ी हूँ. मेरी स्कूलिंग केरल के संत मैरी स्कूल से हुई. हम तीन सहेली सहेलियां एक साथ पढ़ने निकलती थीं, स्कूल जाने के लिए 3 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था. और स्कूल जाने -घर लौटने के दौरान कम से कम 6 किलोमीटर चलना पड़ता था. इतनी दूर पैदल जाने की वजह से हर रोज हमलोग स्कूल लेट पहुँचते थें. प्रिंसिपल रोज बोलतीं - "अगले दिन लेट आएगी तो मार खायेगी." लेकिन हमलोग फिर नहीं चाहते हुए भी अक्सर लेट हो जाते थें. एक-दो बार मार भी खानी पड़ी. अंत में स्कूलवाले समझ गए कि हमलोग 3 किलोमीटर चलकर थके-हारे स्कूल तक पहुँचते हैं. इसलिए उन्होंने हमे इस विषय पर बोलना छोड़ दिया.
हम स्कूल देर आते जरूर थें लेकिन पढ़ने में काफी मेहनत करते थें. हम कभी स्कूल में फेल नहीं हुए. अभी की तरह जैसे बच्चों को कुछ पैसा मिलता है कि वो बाहर तरह-तरह की चीजें खा सकें वैसा हमलोगों के समय में कुछ नहीं था. हमलोगों के हाथ में कभी पैसा नहीं रहता था. तब हमारे यहाँ कल्चर नहीं था कि हर दिन बाहर से खरीदकर खाना है इसलिए हम मांगते भी नहीं थें. हमलोग रोजाना घर से टिफिन लेकर जाते थें और एक साथ मिलकर खाते थें. स्कूल के दिन बड़े मस्ती में गुजरे. मैं खेल-कूद में उतनी अच्छी नहीं थी. लेकिन गाने-डांस में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी. उसमे मन भी लगता था और मुझे इनाम भी मिलते थें. मैं घर में सबसे बड़ी थी तो मुझे घर के काम में भी माँ की थोड़ी बहुत हेल्प करनी पड़ती थी.
 मैट्रिक इक्जाम देने के बाद ही मैं हमेशा के लिए बिहार चली आयी. मुझे बिहार आने की इच्छा इसलिए थी क्यूंकि मैं यहाँ के गरीबों की स्थितियां जानना चाहती थीं कि किस हालात तक गरीबी है इधर. एक तरह से मेरा यह रिसर्च वर्क भी था. तब अख़बार में पढ़े थें कि इधर गरीबी बहुत ज्यादा है. केरल के ही न्यूज पेपर में दिया था कि 10-12 लड़कियों-महिलाओं का एक ग्रुप बिहार जा रहा है वहां के गरीब लोगों से मिलने तो फिर मैं वो न्यूज पढ़कर उनलोगों से मिली और उनके ग्रुप में शामिल होकर 1965 में बिहार चली आयी. जब कम उम्र में मैं घर छोड़कर आ रही थी तो घर में बहुत रोक-टोक हुआ. वे नहीं चाहते थें कि मैं बिहार जाऊं. लेकिन मैंने बोला- "हमको जाना है बिहार, देखना है, कुछ काम करने की वहां जरूरत है." मुश्किल था उनको मनाना फिर वे मेरे जिद करने पर मान गए. जब मैं पहली बार बिहार आयी तो रिसर्च करते और यहाँ रहते हुए ही मुंगेर जिले के एक कॉलेज से मैंने 12 वीं की पढ़ाई पूरी की. घरवाले बुलाते तो मैं कहती अगर मुझे यहाँ अच्छा नहीं लगा तो मैं आ जाउंगी. फिर यहीं से मैं स्नातक की पढ़ाई करने मैसूर, कर्नाटक चली गयी. हिस्ट्री में मैंने ऑनर्स किया. कॉलेज में ऑनर्स के लिए सिर्फ 6 स्टूडेंट थें. कॉलेज में भी कल्चरल प्रोग्राम में मैं पार्टिशिपेट करती थी. चूँकि इंग्लिश मेरा फेवरेट सब्जेक्ट था इसलिए कभी-कभी डिबेट और स्पीच कम्पटीशन में हिस्सा लेकर प्राइज लाती थी. एक बार हमलोग आउटिंग के लिए तमिलनाडू के मरीना बीच गए. हमलोगों का 6 लोगों का छोटा सा ग्रुप था इसलिए सभी टीचर्स भी हमे जानते थें. हमलोग भी एक-दूसरे को बहुत नजदीक से जानते थें. एक साथ खाना, पढ़ना, घूमना सब संग-संग होता था.
पटना, बिहार में रहने के दौरान कुछ समय के लिए मैंने नॉट्रेडेम स्कूल में टीचिंग भी शुरू किया. मैंने देखा कि स्कूल में सिर्फ स्टैंडर्ड और अच्छी सोसायटी के बच्चे आते हैं. कोई गरीब का बच्चा वहां नहीं जा सकता था. क्यूंकि ऐसे स्कूल उनकी पहुँच में नहीं थें. और चूँकि मैं ऐसे ही संम्पन बच्चों को पढ़ाने के लिए या उनके साथ रहने के लिए नहीं आयी थी इसलिए मैंने स्कूल छोड़ दी. उसके बाद मैं पूरा समय गरीब-वंचित लोगों के साथ बिताना चाहती थी. उसके लिए हम मौका खोजते रहें, मौका मिला तो मैं उनके बीच जाकर रहने लगी. शुरुआत में काफी दिक्कत हुई. मैं उनकी लोकल भाषा नहीं जानती थी. लेकिन लोगों के साथ रहते-रहते खासकर वैसी महिलाओं के बीच रहते हुए मैंने उनकी लैंग्वेज सीख ली और फिर दानापुर के गांव में रहना शुरू किया. केरल में हम हिंदी सेकेण्ड लैंग्वेज के रूप में पढ़े थें लेकिन बोलना नहीं जानते थें. इधर रहते-रहते पहले हिंदी फिर जो वे लोग मगही बोलते थें वो भी सीख लिए ताकि उन लोगों के साथ कम्युनिकेट कर सकूँ. तब मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं वकालत की डिग्री लेती हूँ तो मेरे इस काम में और बेहतरी आएगी. तब मैंने बैंगलोर जाकर लॉ की पढ़ाई की.
1986 में मैंने 'नारी गुंजन 'संस्था की शुरुआत की तब मेरी उम्र 35 साल के आस-पास थी. मैं ज्यादा समय गरीब महिलाओं के बीच रहती थी और उनकी समस्याएं सुनती थी कि उनके साथ क्या होता है और उनकी क्या परेशानियां हैं. तब वे लोग तीन प्रतिशत भी शिक्षित नहीं थें. उन लोगों को बहुत सारी चीजों का ज्ञान नहीं था. उनकी समस्या एक तो घरेलू हिंसा थी, उसके बाद कास्ट प्रॉब्लम भी थी. तो मेरे प्रिफरेंस में दलित महिलाएं थीं. मैं दलित समाज के बीच में ज्यादा काम करना पसनद करती थी. मेरी संस्था का काम था दलित महिलाओं में अवेयरनेस लाना, उन्हें आत्मनिर्भर बनाना. खुद मेरा क्या अधिकार है उनको मालूम नहीं था. पतृसत्तात्मक समाज में घर-परिवार में उनके साथ जो भी जुल्म होता वे सहते रहती थीं. तो उनको सशक्त बनाने का मैंने काम शुरू किया. बिहार में मेरा जो फिल्ड वर्क था बहुत रिस्की था. 21 साल मैं मुसहर बस्ती में रही उन्ही लोगों के साथ. उनलोगों को कोई भी प्रॉब्लम होती मैं साथ देती. मेरे सपोर्ट करने से कुछ बड़े जात के लोगों को अच्छा नहीं लगा तो उनकी तरफ से फिर मुझे जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं, मुझे वहां से भगाने की कोशिश भी की गयी. मैं उनसे डरती तो थी लेकिन मैंने कभी डर को सामने प्रकट नहीं होने दिया और ना वहां से भागी. मैं तब जमसौत गांव में अकेली एक झोपडी में रहती थी. मैं खाना-पीना वहां खुद से ही बनाती थी. बड़े लोग इस बात पर नाराज थें कि अगर ये दलित पढ़-लिख गए तो उनका भैंस कौन चऱायेगा, उनका खेत कौन जोतेगा..? फिर मैंने दलितों को जागरूक करना शुरू किया कि आपलोग उनके जाल में नहीं फंसें, ये सब आपलोगों को एक तरह से चूसने का काम कर रहे हैं. दबाव डालकर जबरदस्ती बंधुआ मजदूर बनाये हुए हैं. दलित महिलाओं के साथ बदसलूकी भी की जाती थी. तो सब आवाज उठाकर के एक साथ उनका विरोध करते थें. मेरी झोंपड़ी के बगल में ही चापाकल था और वहां से पानी भरकर लाना, खुद खाना बनाना मेरे लिए साधारण चीज थी. तब वहां रहने के दौरान स्थानीय दलित लोग अपने मन से सब्जी-आलू जो मिलता कुछ हमारे लिए ले आते थें. थोड़ा बहुत चावल खरीदना पड़ता था. दिनभर हमारे पास महिलाओं-बच्चों का जमावड़ा लगा रहता था.
उनलोगों के साथ बहुत समस्याएं थीं. कास्ट के चलते आये दिन उनके साथ इधर-उधर मारपीट होती थी. ये पहले देशी शराब का धंधा करते थें. बड़े लोग इनके पास शराब पीने आते थें और फिर वहां अलग समस्या खड़ी हो जाती थी. शराब के नशे में बड़े जातवाले ग्राहक इनकी महिलाओं-लड़कियों के साथ रेप कर देते थें. उन सब चीजों को देखकर हम सबने मिलकर लड़ाई लड़ी. इनलोगों के केस लड़ने मैं दानापुर सिविल कोर्ट भी जाती थी. मैं वहां कोर्ट में बैठती तो कोई मुझे कुछ और भी काम दे देता तो मैं करती थी. कुछ पैसे उधर से मिल जाते थें. सिविल कोर्ट में मैंने 4-5 साल काम किया. हमने 8-9 रेप केस लड़ें. हम एक बार जो बिहार आये तो फिर काम में ही रच-बस गए, सारा समय काम में चला गया इसलिए मेरा लगाव भी कभी घर बसाने का, शादी करने का नहीं हुआ. घरवाले जानते थें कि मेरा अपना एक लक्ष्य है, प्लान है. एक वक़्त मेरा भाई हमसे बोला कि यदि कोई भी समय आपको बिहार में अच्छा ना लगे तब तुरंत वापस केरल आ जाना. जब मेरे माँ-पिताजी जीवित थें तो उन्हें देखने-मिलने मैं केरल हर साल जाती थी लेकिन अब जब वे नहीं हैं तो मैं अब वहां बहुत कम जाती हूँ.
 बिहार में दलित बस्ती में रहते हुए उन दिनों मैंने पाया कि मुसहर जाती के लड़के कोई काम नहीं करते हैं. सारा दिन कहीं निठल्ले पड़े रहते. सुबह-सबेरे ही शराब पीकर ताश खेलते, झगड़ा-झंझट करते रहते थें. तो धीरे-धीरे इन्हे एक लक्ष्य की ओर ले जाने के लिए हमलोगों ने कई दिन उनसे बातचीत किया, तो अंत में वे बोले कि हमलोग क्रिकेट खेलेंगे. पुनपुन, बिहटा और फुलवारीशरीफ ये तीन ब्लॉक में मुख्य रूप से अभी हमारा 16-17 क्रिकेट टीम है 350 लड़कों का. दो टूर्नामेंट भी हो चुके हैं अबतक. इससे उनमे बहुत परिवर्तन आया. उनकी बुरी संगत में कमी आयी और समय बर्बाद करना छूट गया. बहुत लड़के जो 7वीं-8 वीं में पढ़ाई छोड़ दिए थें वे फिर से पढ़ने लगें. काम-धंधे के रूप में छोटा-मोटा दुकान भी शुरू किये. अब उनकी लाइफ स्टाइल थोड़ी चेंज हुई है. ये लोग मुझे प्यार से सायकिल वाली दीदी बोलते हैं और मुझे अपना मानते हैं. यंग एज से ही इनके बीच रहते हुए, इनके लिए काम करते हुए मुझे कभी भी अकेलापन महसूस नहीं हुआ. अब तो यही मेरा परिवार है.

जे.पी. के अंतिम दिनों में मैं उन्हें रामायण की चौपाईयाँ सुनाती थी : डॉ.शांति जैन, वरिष्ठ साहित्यकार एवं बिहार गौरव गान की रचयिता

By : Rakesh Singh 'Sonu'


मेरा जन्म बिहार के भोजपुर जिले के आरा शहर में हुआ लेकिन मैं मूलतः मध्यप्रदेश की हूँ. हमारे जन्म के बहुत पहले ही यहाँ के आश्रम 'जैन बाला विश्राम' में बाबूजी नौकरी के लिए आ गए थें. आरा शहर से दो किलोमीटर आगे आश्रम था. उस वक़्त उन्हें 6 रुपया महीना मिलता था. तब परिवार में कुल 6 प्राणी थें और ठीकठाक घर चल जाता था. बाद में वहां से हमलोग आरा रहने आ गए थें. वहीँ एक पाठशाला में मैंने 5 वीं तक पढाई की क्यूंकि उसके आगे की पढ़ाई वहां नहीं होती थी. फिर मैं 'जैन बाला विश्राम' के हॉस्टल में चली गयी जहाँ सिर्फ जैन लड़कियां ही रहती थीं. बड़े कठोर अनुशासन के बीच मैं 6 साल हॉस्टल में रही. जाड़ा हो या गर्मी हो सुबह 4 बजे उठना होता था, प्रार्थना करनी होती थी. वहां रात में खाना नहीं होता था. तब घर के लोग थोड़े विपन्न थें इसलिए मुझे वहां भेज दिया. मेरी भोजन और पढ़ाई की फ़ीस माफ़ थी. चूँकि मेरी फ़ीस माफ़ थी इसलिए मुझे वहां बहुत काम करना पड़ता था. छोटी सी उम्र में पांच-पांच सेर गेहूं पिसा, पांच-दस किलो शब्जियां काटती थीं और 70-70 बाल्टी पानी भरना पड़ता था. ये सब स्ट्रगल करते हुए 6 साल बिता.
फिर जब मैं हॉस्टल से पढ़कर आरा आयी और चूँकि मेरे बड़े भाई पढ़े-लिखे नहीं थें इसलिए बड़े बाबूजी ने कहा कि "हम नहीं पढ़ाएंगे लड़कियों को.." तब हमारी बड़ी बहन भी नहीं पढ़ पायी थी, 7 वीं तक पढ़कर वो भी घर आ गयी थी. बाबूजी ने कहा - "हम पढ़ाएंगे नहीं, लेकिन अगर तुमको खुद से पढ़ना हो तो तुम अपनी व्यवस्था से पढ़ लो." मैंने कहा- "मैं पढ़ लूँगी." फिर मैंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. 30 दिन रोज दो घंटे पढ़ती थी, यानि 60 घंटे के मुझे 10 रुपये मिलते थें. मैं कॉलेज आने-जाने का रिक्शा भाड़ा 7 रूपए महीना देती थी और तीन रुपया जो बचता था फिर दो-तीन महीने में 8 रुपये की साड़ी आती थी. नाश्ता करने के पैसे रहते ही नहीं थें. कभी किताबें नहीं रहीं मेरे पास. या तो लायब्रेरी से पढ़ा या कॉलेज नोट से पढ़ा. इसी तरह पढ़ाई बहुत कठिनाई से हुई. तब आरा के जैन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया तो वहां एमए की व्यवस्था नहीं थी, आरा में ही कहीं नहीं थी. तब बाहर जाने के लिए पैसा नहीं था. एक साल पढ़ाई छूट गयी. इसी बीच मैं संगीतालय में संगीत सीखने लगी थी. इसके बाद जब पेपर में मेरिट के लिए स्कॉलरशिप निकला तो संगीतालय के लोगों ने चंदा करके मेरा पटना यूनिवर्सिटी में एडमिशन करा दिया. मुझे दानापुर रेलवे क्वार्टर में रहने की व्यवस्था करा दी गयी किसी रिलेटिव के यहाँ. वहां से मैं ट्रेन पकड़कर पटना आती थी फिर चार आने में यानि हम चार सहेलियां एक रूपए में टैक्सी करके पटना यूनिवर्सिटी आती थी.
15 दिन हुआ होगा, एक दिन वहां के हेड ने मुझे एकांत में बुलाकर कहा- "तुमको स्कॉलरशिप मिली है, तुम यहाँ से चली जाओ, यहाँ बहुत पॉलिटिक्स है, मैं भी यहाँ से जा रहा हूँ." फिर गया के मगध यूनिवर्सिटी में गयी तो एडमिशन के लिए पैसा नहीं था. तब फिर स्कूलवालों ने मदद की. एडमिशन के बाद जब दो-चार क्लास किये तो पता चला मेरी स्कॉलरशिप ब्रेक हो गयी है. अब मैं यहाँ से भी गयी और वहां से भी गयी. उस समय के.के.दत्ता वीसी थें. मैं उनसे मिलने गयी. उनकी खासियत थी कि वे टीचर से मिले ना मिलें स्टूडेंट से जरूर मिलते थें. मैं जब उनके घर गयी तो चपरासी मुझे रोक रहा था और वे अंदर से सुन रहे थें. वे बाहर निकलें और बोलें- "क्यों रोक रहे हो, आने दो." मैंने उनसे मिलकर कहा- "सर ये स्कॉलरशिप अगर रुकता है तो मैं पढ़ नहीं पाऊँगी." वे बोले- "तुम आओ ऑफिस में देखते हैं क्या कर सकते हैं." मैं ऑफिस गयी और उन्होंने स्पेशल केस में एडमिशन करा दिया.
तब रेडियो पर मैंने एनाउसमेंट सुना कि आकाशवाणी पटना में एक जगह खाली है एनाउंसर की और मैं चली आयी थी. तब मेरे एक क्लासफेलो वहां एनाउंसर हो चुके थें. मैं वहां गयी तो वे बोले- "यहाँ ऑलरेडी कैंडिडेट सेलेक्टेड है, आपका नहीं होगा." मैंने कहा- "अप्लाई करने में क्या जाता है, नहीं होगा तो नहीं होगा." फिर अप्लाई कर दिया मैंने और पटना ही रहने आ गयी. कुछ दिन में इंटरव्यू लेटर भी आ गया मगर मैं नहीं गयी. सोचा- होगा तो है नहीं. फिर आधे दिन के बाद मैंने सोचा चलकर देखना तो चाहिए कि क्या होता है इंटरव्यू में, तो मैं चली गयी. उनलोगों ने कहा- "मैडम पता है, यहाँ वक़्त का पाबंद होना पहली शर्त है." मैंने कहा- "मैं आना ही नहीं चाह रही थी." और तब मुझे रेडियो का एबीसीडी तक नहीं आता था. फिर मेरा वॉइस टेस्ट हुआ. 500 कैंडिडेट थें और पोस्ट एक ही था. उनमे से कुछ कैंडिडेट थें जो कैजुअल में काम कर रहे थें. उस वाइस टेस्ट में 500 लोगों में 10 लोग सेलेक्ट हुए जिनमे एक मैं भी थी. और जिसको क्लासफेलो ने बताया था कि वे सेलेक्टेड कैंडिडेट हैं उसको वॉइस टेस्ट में फर्स्ट आया था, जबकि मुझे तीसरा नंबर मिला था. जब इंटरव्यू हुआ तो 25 में से 23 नंबर मुझे आ गए, मैं 3 से चली आयी 1 पर और वो एक से चले गए तीन पर. उन्होंने पूछाे- "आजकल प्रेसिडेंट कहाँ हैं?" मुझे पता था कि वो अफगानिस्तान में हैं फिर भी कभी-कभी हो जाता है की आपको ध्यान नहीं रहता. मैंने कहा- "नहीं पता है." तो बोले- "कोई न्यूज बताइये." मैंने कहा- "राजस्थान में बाढ़ आयी हुई है." वे बोले- "ये कोई न्यूज है? आप बताइये कि मध्य प्रदेश में क्या हो रहा है?" ये भी मुझे पता था कि मध्य प्रदेश में नॉन गजटेड की हड़ताल चल रही है. मगर वो भी नहीं बता पायी. वे कहने लगें- "न्यूजपेपर नहीं पढ़ती?" मैंने कहा- "नहीं." बोले- "क्यों ?" मैंने कहा- "हॉस्टल में रहती हूँ, पेपर मिलता नहीं पढ़ने को." मेरा मासूमियत से दिया गया यह जवाब इतना अपील कर गया उनको कि वे खुश हो गएँ. मतलब तब कोई भी अपनी कमजोरी नहीं बताता, यही कहता कि आज नहीं पढ़ सके, ऐसा-वैसा हो गया. मैंने तो स्ट्रेट कहा कि- "नहीं पढ़ती." इंटरव्यू के बाद फिर मेरा सलेक्शन हो गया.
चार साल मैं आकाशवाणी में रही फिर वहां से रिजाइन कर पटना वीमेंस कॉलेज गयी संस्कृत लेक्चरर बनकर. फिर दूसरे वीसी जो आएं उनकी बेटी तैयार थी संस्कृत में तो उन्होंने कहा था कि ये पद सिर्फ मेरी बेटी के लिए है. दो साल बाद कमीशन हुआ और उनके रिलेशनवाले कमीशन में बैठें और फिर मेरी छुट्टी हो गयी. एक साल मैं पटना में जॉबलेस रही. इसके बाद मैं राजभाषा परिषद में विधापति विभाग में गयी तो मैथिल लोग बिगड़े कि नॉन मैथिल को क्यों बैठा दिया इसमें. फिर एक साल बाद मैं लोकभाषा में ट्रांसफर हुई. 8 साल वहां रहने के बाद मेरी न्युक्ति हुई आरा के एस.बी. (सहजानंद ब्रह्मऋषि ) कॉलेज में. 5 साल मैंने पटना से अप एन्ड डाउन किया. तब मेरा लिखना भी छूट गया था. उसके बाद बहुत कोशिश करके ट्रांसफर लेकर मैं पटना के अरविन्द महिला कॉलेज में आयी. वहां 14 साल रही. फिर लालू जी ने शुरू किया कि जो जहाँ से आया है वहाँ जाये वार्ना तनख्वाह बंद. फिर एक साल तक तनख्वाह बंद रही. लेकिन कितने दिन तक ऐसा चलता. इसलिए मैं फिर चली गयी आरा के जैन कॉलेज और वहीँ से 2008 में संस्कृत विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड हुई. काम के साथ-साथ तब मेरा साहित्य और गीत लेखन भी जारी रहा. लोकसाहित्य पर 14 किताबें प्रकाशित हुईं. टोटल 35 किताबें अलग-अलग विधाओं में आयीं हैं. रामायण मैंने कंटीन्यू 6 साल तक रेडिओ से गाया है और मुझे उसी से प्रसिद्धि मिली. राज्य और राष्ट्रिय स्तर पर कई पुरस्कार भी मिले . तब घरवाले मुझे एकाध बार शादी के लिए बोलें लेकिन मैंने नहीं की. चूँकि तब मैंने मध्य प्रदेश और अपने घर में देखा था शादीशुदा महिलाओं की स्थिति. उनकी अपनी कोई अच्छी नहीं है. रात-दिन काम में लगे रहो फिर भी उनकी उतनी कद्र नहीं. हम 12 भाई-बहन थें लेकिन बचपन में ही मुझे होश भी नहीं था तब हादसे व बीमारी की वजह से कइयों का देहांत हो गया. और तब हम चार भाई-बहन ही बच गएँ. एक भाई और हम तीन बहनें. बड़ी बहन की शादी हुई लेकिन मैं और छोटी बहन ने नहीं की. मैं तब परिवार में रही ही नहीं, बाहर-बाहर ही ज्यादा रहना होता था.
तब मेरा गाया रामायण रेडियो से पूरा बिहार-उत्तर प्रदेश सुनता था. 1978 की बात है तब जे.पी. (जयप्रकाश नारायण) बीमार थें और उनका डायलिसिस चल रहा था. तब जे.पी. के पास बहुत लोग आते थें और उन्हें गीत -भजन सुनाकर पैसे-वैसे ले जाते थें. जे.पी.थक जाते थें लेकिन संतुष्ट नहीं हो पाते थें. गंगा शरण सिंह तब एम.पी. हुआ करते थें, उन्होंने मुझे बुलाकर कहा "जे.पी. को थोड़ा टाइम दे दीजिये." मैंने कहा- "जे.पी. के मैं कुछ काम आऊं तो यह बड़े गर्व की बात होगी मेरे लिए." फिर मैं जाने लगी. पहले मैं शाम 6 बजे जाती थी. उस बीच में कोई मिलने आ गया, कभी कुछ हो गया तो बीच में व्यवधान होता था. अंत में तय हुआ कि मुझे रात 8 बजे बुलाया जाये तब कोई मिलने नहीं आएगा और नीचे गेट बंद हो जायेगा. मैं ऊपर जाती, नीचे गेट बंद होता और उसके बाद मैं जे.पी. की कुर्सी पर बैठ जाती थी. वहीं सामने टेबल पर हारमोनियम रहता था. सामने गंगा बाबू भी रहते थें. जे.पी. खाना खाकर उठते थें और तकिया लगाकर आधे लेटे हुए बैठ जाते थें. और फिर मेरे गायन के बाद कब वो सुनते-सुनते सो जाते थें कुछ पता नहीं चलता. तब उनकी नींद की दवा बिल्कुल बंद हो गयी थी. रामायण की चौपाईयाँ नींद की दवा का काम करती थीं. एक बार दिनकर का जब मैंने बापू सुनाया तो वे इतना रोने लगें कि मुझे समझ में नहीं आया कि अब मैं क्या करूँ. तब फिर लोगों ने कहा कि कुछ और सुनाइए इनका मूड बदलने के लिए. यह लगातार दो साल यानि उनकी मृत्यु होने तक सिलसिला चलता रहा. 7 अक्टूबर को उनकी तबियत ज्यादा खराब हो गयी तो उस दिन लोगों ने कह दिया "आज दादा की तबियत ज्याद खराब है आज छोड़ दीजिये." फिर 8 को सुबह 6 बजे ड्राइवर मेरे पास आया वहां ले जाने के लिए. जे.पी. की एक बात लोगों को नहीं पता है. 23 सितम्बर, 1979 की बात है, दिनकर जयंती थी और उसी दिन गुजरात से उनके यहाँ एक चिट्ठी आई हुई थी जिसमे लिखा था कि सौराष्ट्र यूनिवर्सिटी से 14 अक्टूबर को जे.पी. को डीलिट की उपाधि दी जा रही है. तो वे हंसने लगे थें कि "कौन लेगा इसको..!" और 8 अक्टूबर को वे दुनिया छोड़कर चले गए. बाद में मेरा एक डायरी संग्रह प्रकाशित हुआ 'एक कोमल क्रांतिवीर के अंतिम दो वर्ष' जिसमे डेट वाइस डायरी लेखन है. जे.पी. के साथ की तब जो भी बातचीत हुई सबका कलेक्शन है. 

छात्रावास में मेरे पति की चिट्ठी मुझसे पहले सहेलियां पढ़ लेती थीं : डॉ. मृदुला सिन्हा, राज्यपाल, गोवा

By : Rakesh Singh 'Sonu'


मेरा जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के छपरा धरमपुर गांव में हुआ. दो-तीन कक्षा तक अपने गांव के स्कूल में पढ़ी. जब मैं 8 साल की थी मेरे पिताजी ने बालिका विधापीठ छात्रावास,लखीसराय में दाखिला करा दिया. उसके बाद वहां से मैट्रिक पास कर एम. डी. एम. कॉलेज, मुजफ्फरपुर से बी.ए. ऑनर्स किया. और एल.एस. कॉलेज से साइकोलॉजी में एम.ए. किया.  मैंने 8 वीं में ही थोड़ा बहुत लिखना शुरू किया था.  मुझे लगता है मैं बचपन से ही संवेदनशील थी और कुछ -कुछ लिखने के मन में भाव आते थें. अपनी दोस्त लड़कियों के साथ की खट्टी-मीठी यादें, जैसे उनसे किसी बात पर मेरी लड़ाई हो गयी तब उसपर ही कुछ लिख देती थी. लेकिन उसको साहित्य का नाम नहीं दे सकते और शायद इसीलिए मैंने उसे जमा करके भी नहीं रखा. फिर मैं पढ़ाई में ही लग गयी तो लेखन और दूसरी चीजों से मतलब नहीं रहा. फिर कुछ भी नहीं लिखा. समय-समय पर थोड़ी बहुत पैरोडी बनाया करती थी. एम.ए. की परीक्षा देने के बाद मैंने अपने पति प्रो. रामकृपाल सिन्हा जी से पूछा कि "मैं क्या करूँ..?" तो उन्होंने कहा कि "आप कहानी लिखिए." तो उस समय पति पर ही गुस्सा हो गयी कि "मैं कहानी कैसे लिख सकती हूँ, ये तो बहुत बड़ी बात है." लेकिन उन्होंने कहा- "नहीं, आप लिख सकती हैं." फिर मैंने दो कहानियां लिखीं. कहानियां तो ठीक ही थीं, मगर तब मुझे मोतिहारी के महिला कॉलेज में लेक्चरशिप का जॉब मिल गया. जब लेक्चरर हो गयी तो लिखना छोड़ काम में लग गयी. फिर जब मेरे पति 1977  में मिनिस्टर हुए तब मुझे घर में बैठना पड़ा. घर में बैठते हुए फिर से लिखना शुरू कर दिया. और तभी से लगातार लिखते-लिखते अभी मेरी 71 पुस्तकें हो चुकी हैं. जिनमे 8 कहानी संग्रह, 7 उपन्यास, एक कविता संग्रह के अलावा बहुत से लेखों के संग्रह और बहुत सी विधाओं में लिखी रचनाओं की किताबें हैं. पहली किताब कहानी संग्रह थी जिसका नाम था 'साक्षात्कार'.
अपने स्कूल डेज की बातें मैं पहले अपनी पोतियों को सुनाती थी कि "एक बार छात्रावास में अमरुद तोड़ रहे थें. इधर सहेलियों को कह रखा था कि कोई आये तो तुमलोग नाम लेकर पुकारना फिर हम भागकर चले आएंगे. चूँकि सामने इतना बड़ा-बड़ा अमरुद लटका हुआ था कि देखा नहीं जाता था. तो जैसे ही मैंने हाथ लगाया तभी स्कूल की संचालिका चुपके-चुपके पीछे से चली आयीं. और हुआ ये कि एक तरफ मेरे हाथ में अमरुद है और दूसरी तरफ मेरा कान वो पकड़ी हुई हैं. फिर झट सॉरी बोलकर अमरुद दे दिए." तब यह स्टोरी सुनकर मेरी पोतियां बहुत हंसती थीं.
पिताजी के साथ के भी बहुत अच्छे संस्मरण हैं. उन्होंने ही मुझे पढ़ाया-लिखाया. मेरी सेंटीमेंट का वे बहुत ध्यान रखते थें. हम तीनो भाई-बहनों में 10-10 साल का गैप था. बहन की तो मैं बेटी जैसी थी. भाई भी दस साल बड़े थें. इसलिए मुझे मायके में भी और ससुराल में भी बहुत प्यार मिला. मैं हमेशा कहती हूँ कि मुझे संघर्ष नहीं करना पड़ा जीवन में, हाँ लेकिन मैंने मेहनत की है. और परिश्रम करने का आपको तुरंत लाभ मिल जाता है. मुझे याद है कि तब माँ की रजाई फट गयी थी, बहन की रजाई भी खराब हो गयी थी. और चूँकि मेरी भी रजाई छोटी हो गयी थी क्यूंकि मैं अब बड़ी हो गयी थी. मैंने पिताजी से कहा कि- "बाबूजी, मेरी रजाई छोटी हो गयी है. फिर क्या था, उसी दिन शाम में पिता जी जो एक टीचर थें, मेरे लिए शहर से नयी रजाई बनवाकर ले आएं. जब रजाई घर में आयी तो माँ-बहन सबको बहुत आश्चर्य लगा कि सबकी रजाई खराब है और सिर्फ इसकी ही रजाई आयी है. मेरी माँ बोली कि " 6 महीने बाद तो इसकी शादी है फिर आप क्यों इतनी छोटी रजाई लाये हैं. तो वे बोलें- "अच्छा 6  महीने बाद मैं फिर ले आऊंगा, चिंता ना करो." उस समय घर की आर्थिक स्थिति साधारण ही थी. लेकिन फिर भी मेरी बात को पूर्ण करना पिताजी का उद्देश्य था. उन्होंने केवल पढ़ाया ही नहीं बल्कि उनके लिए मेरा एन.सी.सी. में जाना भी जरुरी था और डांस सीखना भी जरुरी था (तब मैंने कत्थक सीखा था). एन.सी.सी. में पहले रांची कैम्प में गएँ फिर दार्जलिंग के कैम्प में. वो जो सुबह-सुबह उठकर बूट पहनकर दौड़ना होता फिर परेड में शामिल होना होता तो मैं इन सबसे बचने के लिए वहां के हॉस्पिटल में बहाने बनाकर दो-तीन दिन पड़ी रहती कि मेरी तबियत खराब है. 10 दिन का टूर था तो दो-तीन दिन मैं यूँ आराम करके फिर चली गयी कि लड़कियां कहीं मेरी शिकायत ना कर दें.
यंग एज में छात्रावास के दिनों की एक बात बहुत महत्वपूर्ण रूप से याद आती है जब मेरी शादी अपने फ्रेंड्स ग्रुप में सबसे पहले हो गयी थी. तब शादी के तीन महीने ही हुए थें. शादी के बाद दो-तीन दिन ही मैं साथ रही थी फिर पति प.बंगाल चले गए थें तो मैं छात्रावास आ गयी थी. मेरे पति तब बंगाल में प्रोफ़ेसर थें. वे मुझे चिट्ठियां लिखा करते थें. तो जो चिट्ठियां चपरासी के हाथों में मेरी छात्रावास की सहेलियां देखती थीं तो वे खुद उससे चिठ्ठी ले लेती थीं. लिफाफा देखकर ही वो पहचान जाती थीं. फिर चिट्ठी फाड़कर सब पढ़ती थीं. उसके बाद मेरे पास आकर कहतीं कि "मृदुला, तुमको एक चीज देनी है" और तब मेरी चिट्ठी मुझे देती थीं. मेरे पति भी ये बात जानते थें. तब वे भी जानबूझकर सहेलियों के लिए कमला, विमला, ढ़िमला, शिमला कैसी है....इस तरह के हंसी-मजाक लिख देते थें. उन्ही दिनों का एक और इंट्रेस्टिंग प्रसंग याद आता है जब फर्स्ट टाइम वे दशहरे की छुट्टी में छात्रावास आये थें. जब उनके कॉलेज की छुट्टी हो गयी थी और मेरी होनेवाली थी. तब मेरी दोस्तों को मालूम था कि वो आनेवाले हैं. तब होता यूँ था कि चपरासी किसी भी आनेवाले गेस्ट से लिखवाकर लाता था कि किस से मिलना है, फिर  सुप्रीडेंडेंट को जाकर दिखाता था. सन्डे का दिन था और वे जब आएं तो उसी तरह चपरासी मेरे पति से भी लिखवाकर ले गया और फिर मेरे पास आकर जैसे ही चपरासी ने बोला "मृदुला बउआ....". उसका इतना ही बोलना था कि अगल-बगल कमरे से सारी लड़कियां निकलकर मुझे वहीँ छोड़कर मेरे पति के पास भाग गयीं. मुझे थोड़ी शर्म भी आ रही थी और मैं सोच रही थी कि कोई ले जाये मुझे मैं कैसे जाउंगी. जब बाबूजी लोग आते थें तो हमलोग दौड़कर मिलने जाते थें, लेकिन यहाँ बात दूसरी थी. बाद में हमारी दोस्त लोग अभी भी ये कहानी सुनाती हैं कि "जब सभी लड़कियां वहां जाकर इधर-उधर सूचना बोर्ड देखने का नाटक करने लगीं और वे सबको देख रहे थें. बाकी लोग आते थें तो थोड़े शर्माते थें लेकिन ये तो उल्टा देखते हुए लड़कियों को स्टडी कर रहे थें. बाद में उन्होंने कहा कि "सुनिए, आपलोग सूचनाबोर्ड पर कुछ ना देखिये, कुछ नहीं मिलेगा. आप इसके लिए आयी भी नहीं हैं. आप मृदुला के हसबेंड को देखने आयी हैं तो लीजिये आप अच्छी तरह देख लीजिये." और वे आँख बंद करके खड़े हो गएँ यह कहने के साथ कि "लीजिये मैं आँखें बंद कर लेता हूँ, आपलोग मुझे अच्छे से देख लीजिये." फिर तो वे सभी शर्माते हुए भागी वहां से. उस घटना के बाद उनकी मेरी दोस्तों के साथ भी अच्छी दोस्ती हो गयी.
एक बार जब हमलोग कॉलेज में क्लास कर रहे थें. सर्दियों के दिन थें. टीचर ने कहा- "चलो धूप में पढ़ते हैं. और भी दो-तीन ग्रुप थोड़ी दूरी पर धूप में बैठकर पढ़ रहे थें. मेरे पति का कोई काम प्रिंसिपल से रहा होगा. तो वे सायकल से आएं और तभी वहां की जूनियर क्लास की लड़कियों ने उन्हें देख लिया. वे लोग उन्हें पहचान गयीं. बोलने लगीं "ये देखो, मृदुला दीदी के हसबेंड आये हैं." उसमे से दो-तीन लड़कियां चुपके से गयीं और उनकी सायकल पंक्चर करके सारी हवा निकाल दी. वे बेचारे बाहर निकले तो देखा सायकल पंक्चर है. तब उनको मुझसे मिलना नहीं था तो वे मुंह घुमाये और सायकिल को ठेलते हुए हम सभी को टाटा, बाय-बाय करके चले गएँ. चपरासी देखा तो उनके पीछे-पीछे दौड़ा कि "सर, हम आपका सायकल ठीक करा देते हैं." यह घटना याद आते ही मन को गुदगुदा जाती है.
 ससुराल की मेरी बहुत अच्छी स्मृतियाँ हैं जिसपर मैं बहुत बार लिखती-कहती हूँ. एक तो ससुराल में आते ही सबसे पहले चर्चा हो गयी कि बाहर गांव की महिलाओं ने कह दिया "दुल्हन देखने में सुन्दर नहीं है." उस समय मेरी सास जो बहुत सुंदर थीं, बहुत नाराज हो गयीं. फिर यह कहते हुए सबको भगा दिया कि "चलो, कन्या के सोने का अब टाइम हो गया...जाओ, आपलोग बहुत सुन्दर हो." वे कहती थीं कि "इसके चेहरे में क्या खराबी है, क्यों सब खराब कह रही हैं...?" बाद में वह मुझसे कहतीं- "नाक छोटी है चिंता मत करो वो बड़ी हो जाएगी. जब जवानी के गाल पिचक जायेंगे तो नाक निकल आएगी. चेहरे में क्या खराबी है, आँख थोड़ी छोटी है, नाक थोड़ी छोटी है, दांत थोड़े ऊँचे हैं......मतलब सबकुछ जो खराबियां थीं वो बोल देती थीं और उसके बाद कहतीं कि "खराबी क्या है." तो उस वक़्त मेरे हसबेंड के साथ-साथ नन्द-देवर काफी हँसते थें. मैं भी उनकी बातों पर खूब इंज्वाय करती थी.

शादी बाद पत्नी को तौफे में विनोबा भावे जी की पत्रिका दी थी तब वह चौंक पड़ी थीं : डॉ. जगन्नाथ मिश्रा, पूर्व मुख्यमंत्री, बिहार


मेरा जन्म बिहार के सुपौल (तब के सहरसा) जिले के 'बलुआ बाजार' गांव में हुआ था. गांव में ही हाई स्कूल तक की पढ़ाई हुई. टी.एन.जी. कॉलेज, भागलपुर से ग्रेजुएशन फिर एम.ए. किये बिहार यूनिवर्सिटी, मुजफ्फरपुर से और वहीँ से पी.एच.डी. भी कियें. 1960 में वहीँ पर लेक्चरर नियुक्त हो गए. उस ज़माने में मार्क्स के आधार पर बहाली होती थी, हम सेकेण्ड आये थें यूनिवर्सिटी में. स्कूल में मैंने विधार्थियों की एक मण्डली बना रखी थी. उनकी मदद से हम हर रविवार को सफाई का काम करते थें. रात में प्रौढ़ शिक्षा का काम करते थें. हमारा उद्देश्य था गांव को साफ-सुथरा रखना और गांव के अनपढ़ बूढ़े-बुजुर्गों को सरकार के प्रौढ़ शिक्षा अभियान के तहत 10-12 टोलों में साथियों के सहयोग से लालटेन जलाकर पढ़ाने का काम होता था. यह मैट्रिक तक चला. फिर हम भागलपुर पढ़ने चले गए. लेकिन मैट्रिक देने के तुरंत बाद हम सीधे चले गए चांडिल, सिंहभूम जिले में. वहां विनोबा जी का सम्मलेन हो रहा था सर्व सेवा संघ का. उनके माध्यम से हम जयप्रकाश जी के सम्पर्क में आ गएँ. जयप्रकाश जी ने विद्यार्थी के हैसियत से मुझसे कहा- "जो तुम कल कॉलेज जा रहे हो तो विधार्थियों के बीच सर्वोदय अभियान को चलाओ. तुम अगर संगठन कर सकोगे तो हम भी तुम्हारे पास आएंगे." वहीँ जो मुझे जयप्रकाश जी का यह मैसेज मिला तो उत्साहित होकर कॉलेज जाकर मैंने सर्वोदय विद्यार्थी परिषद बनवाया. उसके वार्षिक सम्मलेन में तीन बार हमारे निमंत्रण पर जयप्रकाश जी आये थें. उन दिनों विनोबा जी बिहार भर्मण पर थें. तब हर गर्मी छुट्टी में और पूजा छुट्टी में विनोबा जी जहाँ भी होते थें मैं चला जाता था. हम उनके भूदान यात्रा में शामिल होते थें, उन्ही का प्रवचन सुनते थें और उन्ही की किताब पढ़ते थें.
हमारे परिवार के लोग पॉलिटिक्स में थें. हमारे परिवार के 11 व्यक्ति स्वतन्त्रता सेनानी भी रहे हैं. मेरी शादी स्व. वीणा मिश्रा के साथ 1959 में हुई थी. मेरा ससुराल समस्तीपुर जिले में हुआ. हमरे ससुर जी भी बेगूसराय में संस्कृत के प्रोफेसर थें. मेरा शौक शुरू से ही लिखने-पढ़ने का रहा है. अभी तक 20 किताबें लिख चुका हूँ. अधिकांश किताबें अर्थशास्त्र से सम्बंधित हैं. मुझपर विनोबा भावे जी के भूदान आंदोलन का बहुत असर पड़ा. गाँधी थॉट के साथ हम उनके आंदोलन से जुड़ गए. उनके माध्यम से मैं जयप्रकाश नारायण जी के सम्पर्क में आया. मेरा देश के पॉलिटिक्स में आना ऐसे हुआ कि यूनिवर्सिटी की पॉलिटिक्स में हम इंट्रेस्टेड हो गएँ. सबसे पहले हम सीनेटर बनें, सिंडिकेट बनें और काफी दिनों तक यूनिवर्सिटी में रहें. इससे हमारी पहचान बढ़ गयी. 1968 में यूनिवर्सिटी का चुनाव हो रहा था. उस समय हमारे साथियों ने जो हमारे कामों के अंतर्गत सिंडिकेट की हैसियत से टीचर की समस्याओं को उठाया था तो उनलोगों का जोर था कि मैं कैंडिडेट बनूँ. लेकिन मैं मुजफ्फरपुर में कैसे लड़ूँ, मैं सहरसा का ठहरा. लेकिन तब सभी जात के लोगों ने कॉलेज में हमारा समर्थन किया तो हम खड़ा हो गए. तब मेरे बड़े भाई साहब स्व. ललित नारायण मिश्रा ने मुझे टोका कि "तुम कहाँ सहरसा के ठहरे, ब्राह्मण हो, मैथिलि भाषी हो फिर कैसे तुम करोगे..?" लेकिन हमने बैक नहीं किया और फिर 1968 में जीत भी गए . 1952 में मेरे बड़े भाई स्व. ललित मिश्रा जी भी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जब जेल में थें तब उन्हें 5 साल की सजा हुई थी. तो उन्हें छुड़ाने के लिए हमारी माता जी बहुत व्याकुल थीं. उनको किसी ने बताया कि अगर ललित जो माफीनामा मांगेंगे तब उन्हें छोड़ दिया जायेगा. लेकिन हमारे पिताजी ने कहा कि "नहीं,ये नहीं हो सकता है, हमको तो ख़ुशी होती कि और लोगों की तरह हमारा बेटा भी शहीद हो जाता." वे 5 साल तक जेल में रहकर छूटें तो फिर टी.एन. बी. कॉलेज में लेक्चरर की बहाली में उनकी नौकरी लग गयी. पिता जी ने उनसे कहा कि "तुम्हें हम जेल से इसलिए नहीं छुड़ाए कि तुम देश के काम आओ, देश के लिए काम करो ये नौकरी-चाकरी नहीं." इसलिए उन्होंने फिर नौकरी छोड़ दी. पिता जी की मंशा थी कि हमारे परिवार का कोई सदस्य ऐसा हो जो कोशी नदी को बांधे. कोशी नदी से बाढ़ की बहुत पीड़ा थी. वहां रेल लाइन तो आ गयी थी लेकिन बाढ़ की वजह से सब बर्बाद हो गया था. हमारे पिताजी कहते थें कि "कोई सपूत हो हमारे परिवार का जो रेलगाड़ी ला दे और कोशी को बांधकर बाढ़ की विभीषिका से हमें बचाये. संयोग से स्व. ललित बाबू लोकसभा में चले गए. उस समय उन्होंने संघर्ष करके कुछ योजनाएं बनवाईं. रेल को बलुआ बाजार गांव तक पहुंचवाया और कोशी पर बांध भी बनवा दिया. जिसे हमने अपने कार्यकाल में ललित नारायण तटबंध के नाम से घोषित कर दिया.
मैट्रिक में थे तब फुटबॉल खेलते थें. तब क्रिकेट या कोई और खेल में दिलचस्पी नहीं थी. तब हमें फिल्मों का शौक भी नहीं था. लेकिन एक बार एक सिनेमा हमने देखी 'सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र' ब्लैक एन्ड वाइट में. फिर जब भाई साहब दिल्ली में रहते थें तो वहां हमने देखा 'नया दौर' दिलीप कुमार और वैजन्ती माला अभिनीत. उसके बाद हमने कोई सिनेमा नहीं देखा क्यूंकि रूचि नहीं थी.
मेरी शादी 1959 में हुई. जब एम.ए. में थें और इम्तहान होनेवाला था उसी समय हमारी शादी हो गयी. हालांकि उस समय हम नहीं करना चाहते थें लेकिन हमारे बड़े भाई स्व. ललित बाबू ने हमारे ससुर जी को कमिटमेंट दे दिया था. चूँकि इम्तहान का साल था तो हम शादी क्यों करतें, बाद में करतें. लेकिन घरवालों की जिद्द की वजह से कर लिए. शादी में पत्नी को जो पति की तरफ से तौफा दिया जाता है उसमे हमने उनको भूदान आंदोलन पर विनोबा जी की एक साप्ताहिक पत्रिका दी थी. वे चौंक गयीं और मन-ही-मन सोचने लगीं कि क्या लड़का है, क्या तौफा लाया है...! शादी हो गयी तो भी हम पत्नी से दूर 6-7 महीना मुजफ्फरपुर में ही पढ़ते रहें. जब इम्तहान खत्म हुआ तब फिर ससुराल गएँ जो कि पटना में ही था. ससुरालवालों का उस ज़माने में एक नामी प्रेस था 'अजंता प्रेस' जहाँ से पत्रिकाएं निकलती थीं और वहां बड़े साहित्यकारों का जमघट लगा रहता था. हमारे ससुरालवाले साहित्यिक रुझानवाले थें. उनका एक साहित्यिक मंच भी था. लेकिन इसके बावजूद भी मुझे साहित्य की तरफ कभी आकर्षण नहीं हुआ. जब मैं कॉलेज में लेक्चरर हुआ तभी मेरी पहली किताब 'सार्वजनिक वित्त' के नाम से आयी थी. 

Latest

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में पटना में बाईक रैली Ride For Women's Safety का आयोजन किया गया

"जिस तरह से मनचले बाइक पर घूमते हुए राह चलती महिलाओं के गले से चैन छीनते हैं, उनकी बॉडी टच करते हैं तो ऐसे में यदि आज ये महिला...