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'बोलो ज़िन्दगी' ऑनलाइन मैगजीन के एडिटर हैं राकेश सिंह 'सोनू'

Tuesday, 7 November 2017

मशहूर गायिका स्व.गिरिजा देवी की स्मृति में हुआ ठुमरी व गजल गायन का कार्यक्रम

सिटी हलचल
Reporting : BOLO ZINDAGI

कार्यक्रम में बाएं से गायिका रानी सिंह, 'बोलो जिंदगी' के एडिटर
राकेश सिंह 'सोनू', शास्त्रीय गायक रजनीश कुमार एवं गायिका दिव्या रानी
 
पटना, 7 नवम्बर, भाजपा प्रदेश कार्यालय के कैलाशपति मिश्र सभागार में प्रसिद्ध गायिका स्व. गिरिजा देवी जी के स्मृति में श्रद्धांजलि सह सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया. जहाँ मैथिलि और भोजपुरी की सुप्रसिद्ध गायिका श्रीमती रंजना झा ने राग वागेश्वरी में (छोटा ख्याल) 'साजन नहीं आये, ऐ री माई...' (दादरा में) 'सांवरिया प्यारा रे मोरी गुईयां....' (ठुमरी में) 'पिया नहीं आये-कारी बदरिया बरसे'.., (भजन में) 'बाबुल मोरा नईहर छूटा जाये...' जैसे गीतों पर लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया. रानी सिंह ने 'चिट्ठी ना कोई सन्देश....' और 'रोज जब आफताब...' साथ ही साथ दिव्या रानी ने 'याद पिया की आये...' और 'आज जाने की जिद ना करो..' जैसे गीतों से गिरिजा जी को श्रद्धांजलि अर्पित किया.

मंच पर गायिकी प्रस्तुत करती हुई गायिका
 (ऊपर से) रंजना झा, रानी सिंह एवं दिव्या रानी 
वाध यंत्रों में वायलन पर विजय सिन्हा, हारमोनियम पर प्रेम चंद लाल, तानपुरा पर रजनीश झा एवं तबला पर राज शेखर जी ने इनका भरपूर साथ दिया. मंच का सफल संचालन किया जाने-माने गायक सत्येंद्र कुमार संगीत ने. वहीँ इन कलाकारों की हौसला अफजाई के लिए दर्शक दीर्घा में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई लोकप्रिय शास्त्रीय गायक रजनीश कुमार एवं संगीतज्ञ डॉ. शांति जैन ने.
     इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और उद्घाटनकर्ता केंद्रीय मंत्री श्री राम कृपाल यादव ने स्व.गिरिजा देवी की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद उन्हें श्रद्धा सुमन याद करते हुए कहा कि 'आज हमसब एक ऐसे शख्सियत की श्रदांजलि सभा में उपस्थित हुए हैं जिन्होंने अपनी धरती की मिट्टी की खुशबू सिर्फ देश में नहीं बल्कि दुनिया भर में फैलाने का काम किया. स्व.गिरिजा देवी ने खासतौर पर अपने गजल और ठुमरी के गायन से सबको मंत्रमुग्ध कर रखा था. उनके आज नहीं रहने से देश ने बहुत कुछ खोया है. गिरिजा देवी जैसे चोटी के कलाकार ने देश की गरिमा को बढ़ाने का काम किया है. भारत की जनता उन्हें कभी नहीं भूल पायेगी.'


श्रद्धांजलि सह सांस्कृतिक संध्या का उद्घाटन करते केंद्रीय मंत्री श्री रामकृपाल यादव 
इस कार्यक्रम का सफल आयोजन करनेवाले कला संस्कृति प्रकोष्ठ के संयोजक वरुण कुमार सिंह ने कहा कि 'गिरिजा जी की पहचान ठुमरी गायन में अंतराष्ट्रीय स्तर पर थी. उन्हें कई तरह के सम्मान से नवाजा गया था. जिसमे पद्मश्री एवं पद्मभूषण जैसे राष्ट्रिय पुरस्कार शामिल थें. उनके जाने से संगीत जगत को बहुत बड़ी क्षति हुई है.' वहीँ कला संस्कृति प्रकोष्ठ के सह-संयोजक आनंद पाठक ने कहा कि 'गिरिजा जी जैसी गायिका बिरले पैदा होती हैं. शास्त्रीय संगीत विधा में विशेषकर ठुमरी और दादरा गायिकी की इन दो विधाओं में उनका कोई सानी नहीं है.'
                 इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से कला संस्कृति प्रकोष्ठ के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष श्री आनंद मिश्रा, बांकीपुर विधायक श्री नितिन नविन, प्रदेश सह संयोजक विनीता मिश्रा, प्रदेश कोषाध्यक्ष सह प्रवक्ता नीरज झा, नीरज दुबे, शैलेश महाजन, मनीष झा, 'बोलो ज़िन्दगी' के एडिटर राकेश सिंह 'सोनू', सिनेमा इंटरटेनमेंट के रंजीत श्रीवास्तव, अमरजीत, मनीष चंद्रेश, अक्षत प्रियेश, चंदू आर्यन एवं कार्यकर्ता बंधू उपस्थित हुए. 

Sunday, 5 November 2017

गोवा की राज्यपाल डॉ.मृदुला सिन्हा ने किया ममता मेहरोत्रा और सुषमा सिन्हा की पुस्तकों का लोकार्पण

सिटी हलचल
Reporting : BOLO ZINDAGI


वरिष्ठ लेखिका ममता मेहरोत्रा की पुस्तक का
लोकार्पण करतीं गोवा की गवर्नर डॉ. मृदुला सिन्हा 
पटना, 5 नवम्बर, भारतीय नृत्यकला मंदिर बहुद्देशीय परिसर में 29 वें लघुकथा सम्मलेन के समापन समारोह के अवसर पर मुख्य अतिथि गोवा की राज्यपाल डॉ. मृदुला सिन्हा ने वरिष्ठ लेखिका ममता मेहरोत्रा और सुषमा सिन्हा की पुस्तकों का लोकार्पण किया. लेखिका ममता मेहरोत्रा की तीन किताबों का लोकार्पण हुआ जिनमे दो लघुकथा संग्रह 'विश्वासघात तथा अन्य कहानियां' और 'मेरी प्रिय कहानियां' हैं . उनकी तीसरी पुस्तक है महिलाओं के मुद्दों पर 'क्राइम अगेंस्ट वूमेन इन इंडिया'. ममता जी की दोनों ही किताबें प्रभात प्रकाशन से आयीं हैं. वहीँ लेखिका सुषमा सिन्हा के लघुकथा संग्रह 'एहसास' का भी लोकार्पण हुआ. पुस्तक लोकार्पण के बाद 'अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच' के तहत पटना और देश के अन्य राज्यों से आये लघुकथाकारों और कुछ समाज सेवकों को डॉ. मृदुला सिन्हा के हाथों सम्मानित किया गया.  भोपाल से आयीं वरिष्ठ लेखिका कल्पना भट्ट, वाराणसी से आयीं वरिष्ठ लेखिका सुषमा सिन्हा, पटना के लेखक एवं पर्यावरणविद मेहता नागेंद्र सिंह, छपरा से आयीं प्रोफ़ेसर डॉ.अनीता राकेश, पटना की लेखिका डॉ.विभा रानी श्रीवास्तव, पत्रकार एवं लेखक ए.आर.हाशमी , मधुदीप और मालती महावर भार्गव को 'लघुकथा मंच सम्मान' से सम्मानित किया गया. वहीं 'लघुकथा मंच अंकुर सम्मान' के लिए किलकारी पटना से जुड़ी बच्चियों सरिता रानी और रानी कुमारी को लघुकथा लेखन के लिए सम्मानित किया गया.
लघुकथा मंच सम्मान 2017 से सम्मानित जन 
इसके बाद विशिष्ट सम्मान से अपने गांव में युद्धस्तर पर किये गए विकास कार्य के लिए सीतामढ़ी जिले की सिंहवाहिनी पंचायत की मुखिया सुश्री ऋतू जायसवाल, नाट्य निर्देशक एवं मीठापुर दयानन्द गर्ल्स हाई स्कूल की शिक्षिका अर्चना चौधरी, रंगकर्मी रवि भूषण मुकुल और पटना छठ पर्व के दौरान अच्छी व्यवस्था के लिए जिलाधिकारी पटना, संजय अग्रवाल को को महामहिम द्वारा सम्मानित किया गया.
इसके बाद लघुकथा मंच द्वारा लघुकथा के वर्तमान एवं भविष्य पर परिचर्चा आयोजित की गयी. इस संदर्भ में गोवा की गवर्नर डॉ. मृदुला सिन्हा ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि 'आज जिन लोगों को सम्मानित किया गया मैं उन्हें बधाइयाँ देती हूँ . जो लोग सम्मानित नहीं हुए हैं और जो लघुकथा लिखते हैं उन्हें भी उम्मीद बंधी होगी कि अगली बार हमें भी सम्मानित किया जायेगा. और जो नहीं लिखते हैं वो लिखने के लिए प्रयास करेंगे. क्यूंकि इस प्रकार के कार्यक्रम को देख मैं जब अपना बचपन स्मरण करती हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि मेरे स्कूल में या और भी संस्थाओं में मैं नीचे बैठकर देखती थी. मंच पर जिसको सम्मानित किया जाता था उसे देख मेरे मन में एक इच्छा उत्पन्न होती थी कि मुझे कब सम्मानित किया जायेगा. और मैं स्कूल-कॉलेज में जाती हूँ तो सबसे कहती हूँ कि ये इच्छा बलवती होनी चाहिए सबके मन में कि हम वहां कब बैठेंगे, हमे कब उस मंच से सम्मानित किया जायेगा. ये सकारात्मक इच्छा है, ये होनी चाहिए सबके मन में, इसमें कोई बुराई नहीं है. यहाँ तो सचमुच 'संग चले जब तीन पीढ़ियां, साधे विकास की सभी सीढियाँ.' मतलब यहाँ तीनों पीढ़ियां बैठी हैं. और समाज की तीन पीढ़ियां जब एकत्रित हो जाती हैं तो परिवार बहुत आगे बढ़ता है, समाज आगे बढ़ता है. पीढ़ियां जब अलग-अलग हो जाती हैं तो परिवार भी कमजोर पड़ जाता है. ये भी तो लघुकथा परिवार है. यहाँ एक चीज और मैं बताना चाहूंगी कि मैंने देखा कि कोई विचार आता था तो मन में ऐसा लगता था कि अभी समय नहीं है कि इसको कहानी बना सकूँ, समय नहीं है कि उपन्यास बना सकूँ. फिर मैंने सोचा अच्छा होगा मैं इसको लघुकथा लिख लूँ  और जब समय मिलेगा तो उसी कथावस्तु को विस्तार देकर कहानी लिख लूंगी, उपन्यास लिख लूंगी. और ये सिर्फ मैं यहाँ अपनी बात नहीं कर रही बल्कि कोई भी लेखक ऐसा कर सकता है.'  इस मौके पर कार्यक्रम के अध्यक्ष पटना विश्वविधालय के कुलपति डॉ. रासबिहारी सिंह ने भी सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि 'लघुकथा न्यूक्लियर व मिसाइल है जो सीधे पाठकों के दिलों को बेध जाती है.'  इस पूरे कार्यक्रम का सफल मंच संचालन लघुकथा मंच के महासचिव प्रोफेसर ध्रुव कुमार ने किया.
             
लघुकथा प्रदर्शनी का अवलोकन करते दर्शक 


सम्मलेन में धन्यवाद ज्ञापन मंच के अध्यक्ष सतीश राज पुष्करणा ने किया. कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री रामकृपाल सिन्हा, डॉ.तारण राय, वीरेंद्र कुमार सहित अन्य कई लोग मौजूद थें.
आयोजन स्थल 'भारतीय नृत्य कला मंदिर बहुद्देशीय परिसर' के बाहर लघुकथाकरों के लघुकथाओं की एक प्रदर्शनी भी लगायी गयी थी जिसमे थीम पर बनी पेंटिंग से कहानियां जिवंत हो गयी थीं. कार्यक्रम के अंत में लौटते वक़्त महामहिम ने कुछ देर खड़े होकर इस प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया. 

Saturday, 4 November 2017

पति और माँ-बाप के सहयोग से हर स्ट्रगल आसान हो गया : निभा श्रीवास्तव, एंकर (दूरदर्शन बिहार) एवं भोजपुरी कम्पियर (आकाशवाणी पटना)

वो संघर्षमय दिन
By : Rakesh Singh 'Sonu'

दूरदर्शन बिहार के 'कृषिदर्शन' में एंकरिंग करते हुए और
आकाशवाणी पटना में भोजपुरी एनाउंसर के रूप में निभा श्रीवास्तव 
मेरा ससुराल है आरा, बड़का डुमरा और मायका है आरा, रामगढ़िया में. मेरे पति श्री कृष्ण भूषण प्रसाद स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया में अधिकारी हैं. बचपन से ही मेरा कला के प्रति रुझान रहा. मेरे पिता जी शिक्षक थें लेकिन शिक्षा के साथ साथ उनका संगीत एवं नाटकों से बहुत लगाव था. वे मानते थें कि मेरी बेटी बेटा से कम नहीं है. उन्हें बहुत शौक था कि हमलोग संगीत सीखें और इस क्षेत्र में आगे बढ़ें. 1982 में मैंने मैट्रिक किया और उस ज़माने में छोटे से शहर आरा में आप सोच सकते हैं कितना ताना सुनने को मिलता होगा. हमलोग संगीत सीखने जाते थें, नाटक-स्टेज शो करते थें. उस वक़्त लोग बहुत ताना मारते थें पिता जी को सम्बोधित करते हुए कि 'ये खुद टीचर हैं और नाच-गाना का घर में टीम तैयार कर रहे हैं.' सुनकर बुरा तो लगता था कि हम आखिर क्या गलत कर रहे हैं जो लोग ऐसा बोल रहे हैं. लेकिन फिर भी हमलोग उसपर ध्यान नहीं देते थें और आगे बढ़ते रहें. कॉलेज के समय से ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेते रहें. मगध यूनिवर्सिटी में क्लासिकल संगीत का कम्पटीशन हुआ तो उसमे मैंने फर्स्ट प्राइज जीता. आरा में 'नागरिक प्रचारिणी' एक हॉल था जहाँ नाटक और गायन होता था. वहां हमलोग भी लोकगीत गाते थें. चूँकि भोजपुर की रहनेवाली हूँ तो भोजपुरी से बहुत लगाव है. घर में दादी-नानी जो गीत गति थीं तो इच्छा होती थी कि इसको हम मरने नहीं दें. ये हमारी संस्कृति है, और अपनी संस्कृति को हम खत्म नहीं होने दें. इनसे यदि हम सीखते हैं तो अपनी अगली पीढ़ी को बता सकते हैं. और इसको हम जिवंत रख सकते हैं. इसलिए लोकगीत की तरफ भी हमारा रुझान गया.

कॉलेज के दिनों में स्टेज शो करते हुए निभा श्रीवास्तव 
जब कॉलेज में म्यूजिक सीख रहे थें तभी नवोदय विधालय में वेकैंसी निकला तो उसमे अप्लाई कर दिए और मेरा वहां म्यूजिक टीचर के रूप में ज्वाइनिंग हो गया. वहां हम 6 महीना नौकरी किये. उसी समय मेरी शादी तय हो गयी. तब हसबेंड की पोस्टिंग पटना में थी और शादी के बाद मैं हसबेंड के साथ पटना रहने आ गयी. पटना में मेरा कोई जान-पहचान वाला नहीं था, अकेलापन महसूस होता था. पति के ऑफिस चले जाने के बाद टाइम काटने के लिए रेडिओ सुनती थी क्यूंकि रेडियो से मेरा नाता शादी के पहले से ही रहा है. कॉलेज के दिनों में ही मेरे पिता जी मुझे पटना रेडियो स्टेशन ले आते थें लोकगीत गाने के लिए. हम दो बहनें सीमा श्रीवास्तव-निभा श्रीवास्तव ऑडिशन देने पटना आये और 1983 में पास करके हम दोनों ग्रुप में साथ गाने लगें. लेकिन जब दीदी की शादी हुई, वो ससुराल चली गयी. बाद में हम भी पटना आ गए तो ऐसे में कभी कार्यक्रम मिलता तो हमदोनों के अलग-अलग होने से रिहर्सल-रियाज नहीं हो पाता था जिस वजह से हमारी जोड़ी टूट गयी. फिर 1992 में मैंने आकाशवाणी में एकल गायन के लिए ऑडिशन दिया और सेलेक्ट होने के बाद आजतक मैं लोकगीत गा रही हूँ. फिर मैं 'कला संगम' नाट्य संस्था से जुड़ी. सतीश आनंद, हृषिकेश सुलभ जैसे दिग्गजों के साथ काम करने का मुझे मौका मिला. उसके बाद मैं पटना की नाट्य संस्था 'प्रांगण' और 'कला जागरण' से जुड़ी. आज करीब 20 -25 साल हो गए मुझे नाटक प्ले करते और म्यूजिक टीचर के रूप में काम करते हुए. जब 1991 में आकाशवाणी में वेकैंसी निकला कि भोजपुरी कम्पियर की आवश्यकता है तो चूँकि भोजपुरी मेरी मतृभाषा भी है तो मैंने एक्जाम दिया और पास करके भोजपुरी कम्पियर के रूप में जुड़ गयी. उसके बाद पटना दूरदर्शन में 2002 के बाद एक्जाम देकर बतौर एंकर 'कृषि दर्शन' प्रोग्राम से जुड़ी और अभी तक कार्यरत हूँ.

भोजपुरी फिल्म में अभिनेता पवन सिंह के साथ
 उनकी माँ के किरदार में निभा श्रीवास्तव
 
उसी दरम्यान स्टेज शो करने के दरम्यान हमारे एक साथी ने कहा- 'भोजपुरी फिल्म करोगी?' मैंने कहा- 'बिलकुल करुँगी.' उसके बाद एक भोजपुरी फिल्म में सीनियर एनाउंसर सुमन कुमार ने अभिनेता पवन सिंह के पिता और मैंने माँ का रोल निभाया. मेरी पहली फिल्म थी 'प्यार बिना चैन कहाँ रे' जिसमे पवन सिंह की माँ बनी थी. इसके निर्देशक थें मनोज श्रीपति. फिल्म की शूटिंग मोतिहारी में हुई थी. उसके बाद फिर पवन सिंह की माँ के ही रोल में 'लागल नथुनिया के धक्का' किया जिसके निर्देशक सुनील सिन्हा थें. उसके बाद मैंने लगभग10 शॉर्ट फ़िल्में कीं जिसमे इसी साल 2017 में कालिदास रंगालय में हुए शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल में 'ए बार्गेन टू टिल डेथ' दिखाई गयी थी. उसमे मेरा करेक्टर गरीब मजदूर की पत्नी का था जो कैंसर से पीड़ित है. वह घर में बीमारी की अवस्था में मूर्तियां बना-बनाकर रखती थी और उसकी बेटी ले जाकर मूर्तियां बेच आती थी. और उन्हीं पैसों से वो माँ का इलाज कराती थी. अंत में मेरे किरदार की मृत्यु हो जाती है. इस फिल्म और मेरे किरदार को बहुत सराहना मिली. जी-पुरवईया चैनल पर एक सीरियल चला था 'बस एक चाँद मेरा भी' जिसमे मैंने माँ का ही करेक्टर निभाया. इन सब के दरम्यान स्ट्रगल बहुत रहा क्यूंकि तब बच्चे छोटे थें. पहले तो मुझे लगा कहीं बाहर शूटिंग में मुझे जाने की इजाजत मेरे पति शायद ना दें लेकिन उन्होंने मुझे फुल सपोर्ट किया. मगर समस्या थी कि पटना से बाहर शूटिंग में बच्चों को छोड़कर कैसे जाऊँ? लेकिन वो मुश्किल भी दूर हो गयी मेरी माँ के सपोर्ट से. जब जब मुझे फिल्म-सीरियल के लिए शूटिंग में जाना होता मेरी माँ आरा से हमारे पास पटना चली आती और बच्चों को संभालती-देखती. शुरू-शुरू में बाहर काम के दौरान मुझे घर की ही चिंता लगी रहती कि बच्चे कैसे होंगे, मेरी कमी महसूस कर रहे होंगे. लेकिन फिर धीरे धीरे माँ की वजह से मेरी वो टेंशन दूर होने लगी और मैं मन लगाकर अपने काम पर ध्यान देने लगी. मैं मानती हूँ कि आज मैं पति और माँ के सहयोग से इतना आगे बढ़ पायी हूँ. उन दिनों और आज भी जब फिल्म करने के बाद घर या ससुराल जाना होता है तो इधर-उधर से जान-पहचानवाले थोड़ी चुटकी लेते कि जब भाभी जी के ओरिजनल पति मौजूद हैं तो फिल्मों में किसी और के साथ कपल वाला सीन करती हैं. पतिदेव को बुरा नहीं लगता होगा...?' हालाँकि यह टोन मजाक में ही मारे जाते हैं लेकिन कभी-कभी यह मजाक मेरा मन सीरियसली ले लेता था. मेरे कार्य को कुछ लोग शायद आज भी बुरा मानते हों लेकिन मेरे पति का फुल सपोर्ट मेरे साथ रहता है इसलिए मुझे बाकि दुनिया की परवाह नहीं रहती. अब तो मेरे बच्चों का भी मुझे सपोर्ट मिलने लगा है. मेरे तीन बच्चे हैं, दो बेटियां ग्रेजुएशन करके कम्पटीशन की तैयारी में लगी हैं और छोटा बेटा 10 वीं में है. बेटियां भी संगीत सीखी हैं और बेटा गिटार बहुत अच्छा बजाता है, वह कहानी-कविता भी अच्छा लिख लेता है.
        स्ट्रगल फेज को याद करते हुए मैंने एक बात गौर की है कि जब कॉलेज में थी और नाटक-गायन करती थी और आज शादी बाद भी वह करती हूँ तब मैं पाती हूँ कि आज भी लड़कियों-महिलाओं के प्रति समाज की सोच नहीं बदली है. मतलब 30 साल पहले जो सोच थी वही आज भी है. हांलाकि उस वक़्त हमें बहुत ज्यादा सुनने को मिलता था. तब हम ध्यान नहीं देते थें. बोलनेवाले बोल रहे हैं फिर भी हमारा जो काम है उसे करना है, आगे बढ़ना है यही हमारी सोच थी. मेरे माता-पिता हमारे साथ थें. जहाँ भी जाना होता कभी पिता जी तो कभी माँ हमें लेकर जाती थी. और ऐसे में बोलनेवाले तो चलते समय राह में पीछे से भी अनाप-शनाप बोलते थें. लेकिन हम नजरअंदाज कर देते थें. अभी भी पर्मानेंट की जगह एक कैजुअल कम्पियर के रूप में हम काम कर रहे हैं तो यहाँ भी स्ट्रगल है. स्ट्रगल तो पूरी लाइफ चलती रहेगी लेकिन इसमें ही हम सबको निखरकर आगे बढ़ना है.

Monday, 30 October 2017

8 साल जॉब करने के बाद मैंने अपना खुद का बिजनेस खड़ा किया : गुरुदयाल सिंह, पूर्व अध्यक्ष, 'पंजाबी बिरादरी',पटना

जब हम जवां थें 
By : Rakesh Singh 'Sonu'

मेरा जन्म पंजाब के गुरुदासपुर में हुआ. वहां से पापा जी बिहार चले आये फिर मैं बिहार में ही पढ़ा-लिखा और बड़ा हुआ. स्कूल से ही मुझे कविता-कहानी लिखने का शौक था. पहले मैंने कवितायेँ लिखनी शुरू की जो पत्र-पत्रिकाओं में छपी भीं. गोलघर के पास एक प्राइमरी स्कूल से पास करने के बाद पी.एन. एंग्लो स्कूल से मैट्रिक करने के बाद साइंस में ग्रेजुएशन कॉमर्स कॉलेज से किया. जब शादी की बात चली तो मेरे मामा जी चाहते थें कि पड़ोस की भिखना पहाड़ी की गुरजीत से मेरी शादी हो. मुझे भी लड़की बहुत पसंद थी. गोरी-चिट्टी, काली-काली आँखों वाली. कहीं ना नुकुर की गुंजाईश नहीं थी. परन्तु हमारे फूफा जी जो थोड़े दबंग थे बोले - 'सियालकोटियों के साथ संबंध नहीं बनाना है.' उन्होंने दूसरी लड़की परमजीत के बारे में मेरी बीजी और पापा जी से बातचीत की. पापा जी, मामा जी नहीं मान रहे थें क्यूंकि जुबान दे चुके थें परन्तु बीजी के समझाने से मान गएँ. मुझे भी बहुत समझाया गया कि 'खानदान पढ़ा-लिखा है, लड़की तुम्हारे लायक पढ़ी-लिखी है, सुशिल है, सुन्दर है.' मैंने भी मन मसोस कर हामी भर दी. रिश्ते से पहले मैंने उसे देखा तक नहीं था. परन्तु बीजी के कहने पर कि बिल्कुल बैजन्तीमाला लगती है, फोटो देखकर मैंने भी हाँ कर दी. रिश्ता तो पक्का हो गया परन्तु शादी तीन साल बाद करना तय हुआ क्यूंकि हम दोनों तब पढ़ ही रहे थें. हम एक दूसरे से बातें भी नहीं कर सकते थें, टेलीफोन की सुविधा जो नहीं थी. पर मन तो बहुत करता था एक दूसरे को देखने का- बात करने का, लेकिन अंदर-ही-अंदर एक डर भी था कहीं उसके मन में हमारे प्रति कोई गलत भावना ना बन जाये और हम जुदा हो जाएँ. इसी डर से कोई आगे बढ़ना नहीं चाहता था. एक दूसरे को दूर से देखकर मन ही मन खुश हो जाते. मुस्कुराना भी अपराध लगता था. हमदोनो की छोटी बहनें बलविंदर, मंजीत एक ही स्कूल में पढ़ती थीं और प्रायः दोनों का एक दूसरे के घर आना-जाना होता था. मैं कभी-कभी कुछ कविता लिखकर भेज देता परन्तु उत्तर की सम्भावना नहीं थी. ऐसे ही हमदोनो का मूक प्रेम परवान चढ़ रहा था. कभी-कभी कॉलेज जाते हुए बस की लाइन में खड़ी सखियों संग उनको देखता तो फिर सारा दिन बड़े आनंद से उनकी याद में गुजरता. इसी तरह दिन बीतते गए और एक दिन हम दोनों शादी के बंधन में बंधकर एक दूजे के हो गएँ. कॉलेज से आने के बाद पापा जी के काम को संभालना मेरा काम था. रात कभी-कभी देर भी हो जाती. एक रात मैं थोड़ी देर से आया तो पत्नी ने अपने कमरे का दरवाजा नहीं खोला. मैं अपनी सफाई देता रहा. थोड़ी देर बाद दरवाजा इस शर्त पर खुला कि अब रोज घर जल्दी आना होगा. वे कहती - ' मैं किससे मन की बात करूँ, आप सारा दिन बाहर रहते हैं मेरा भी तो दिल है.' यह उनका प्यार बोल रहा था, हम दोनों में बहुत प्रेम था.
 
 इसी तरह कुछ महीने बीतने के बाद अचानक एक दिन सास-ससुर जी आएं और पत्नी को एक महीने के लिए ले जाने का प्रोग्राम बनाने लगें. मुझे तो काठ मार गया. जब एक दिन भी अलग रहना मुश्किल है और ये तो एक महीने की बात कर रहे हैं ! मैंने तो ना कर दी लेकिन बीजी-पापा जी के समझाने पर कि 'पहले सावन में लड़कियां अपने मायके ही रहती हैं और अपनी सास का मुंह नहीं देखती हैं.' मैंने पत्नी को भरे मन से भेज दिया. मगर मेरा मन उदास रहने लगा और मुझे बुखार हो गया. इसकी खबर जब पत्नी को लगी झटपट आरा मशीन पर ही मुझको मिलने आ गयीं. तब एक दूसरे को देखकर दोनों रोने लगें, आलिंगन में बंध गएँ. मेरा बुखार भी उतर गया.

पुरानी यादों के साथ पत्नी परमजीत जी एवं गुरुदयाल सिंह जी 
ग्रेजुएशन करने के बाद मैं गुलजारबाग, पटना पॉलिटेक्निक में चला गया जहाँ से डिप्लोमा कोर्स करने के बाद मुझे यू.पी. मुरादाबाद से ऑफर मिला गया. पहले नौकरी के लिए 6 महीने अप्रेंटिशिप करनी ज़रूरी होती थी. 1968 में मैंने वहां ज्वाइन किया. वहां उन्होंने पूछा- 'आपको क्या करना है?' मैंने कहा- 'मुझे लॉन्ग टर्म में बिजनेस करना है लेकिन अभी मुझे दो-चार साल सर्विस करनी है.' फिर हमारे काम से वो खुश होकर बोले कि आप हमारे यहाँ ही जॉब कर लीजिये. मुझे जॉब मिला लेकिन सैलरी बहुत कम थी, 240 रूपए महीना. वहां तीन शिफ्ट में काम होता था. सुबह 8 से 4, 4 से 12 और 12 से 8. और मुझे बना दिया गया शिफ्ट इंचार्ज. मेरी ड्यूटी रहती रात के 10 से सुबह 6 बजे तक. लगातार नाईट ड्यूटी करते हुए एकाध महीने में ही मेरा मन भर गया. दिन में ठीक से नहीं सो पाने के कारण मेरा स्वास्थ गिरने लगा. तब मैंने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया और छुट्टी लेकर पटना चला आया पत्नी और पापा जी से बात करने. मगर घर में जितने भी लोग थें सभी ने यही समझाया कि 'आपको नौकरी नहीं छोड़नी है. नौकरी छोड़ेंगे तो बड़ी दिक्कत होगी.' पत्नी ने भी समझाया 'नौकरी जल्दी मिलती नहीं है, आप भाग्यशाली हैं कि आपको अप्रेंटिशिप पूरी करते ही वहीँ नौकरी मिल गयी वरना लोग तो कितने साल पास करके बैठे रहते हैं.' अब चूँकि एक बच्ची का लालन-पालन भी करना था इसलिए नौकरी ना छोड़ने तथा स्वयं साथ-साथ रहने के लिए पत्नी ने मुझे मनाया. कुछ दिनों बाद मैं पत्नी और बिटिया को साथ लेकर पुनः अपने काम पर मुरादाबाद लौट आया. परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए मेरी पत्नी ने वहां एक गर्ल्स हाई स्कूल में इंग्लिश टीचर की नौकरी ज्वाइन कर ली. बिटिया साथ के क्वाटरों की बच्चियों के साथ खेलती रहती थी इसलिए उन्हें नौकरी करने में कोई परेशानी नहीं हुई. परिवार की आमदनी अब दोगुनी हो गयी. परन्तु स्कूल मैनेजमेंट द्वारा इनका बी.एड. नहीं होने से ग्रेड से वंचित रखा गया इसलिए तनख्वाह भी कम मिलती थी. तब पत्नी ने बी.एड. करने की इच्छा जाहिर की, मैंने इजाजत दे दी. उस समय मेरा बेटा पत्नी के पेट में पल रहा था. फिर भी हिम्मत करके उसने पटना में अपना नाम लिखवाया और बी.एड. कम्प्लीट करके एक-डेढ़ साल बाद यू.पी. हमारे पास दोनों बच्चों के साथ लौट आयीं. धीरे-धीरे मुझे भी यहाँ तीन साल हो गएँ. मैंने ऑफिस के लोगों से पूछा 'तुम कबसे काम कर रहे हो?' एक ने कहा 20 साल से काम कर रहा हूँ तो एक बोला 40 साल से कर रहा हूँ. मैं सोचता, ये 20 -40 साल से काम कर रहे हैं फिर भी पैसों का आभाव है, इनकी लाइफ में कोई भी चेंजेस नहीं है. सुबह फैक्ट्री जाना है और शाम को थक-हार के घर आना है बस यही दिनचर्या थी. जब मैं बाहर लोगों से मिलने निकलता तो देखता कि हमारे जो पंजाबी समुदाय के लोग हैं वह छोटी-छोटी लकड़ी, किताबों और साईकल आदि की गुमटीनुमा दुकाने चला रहे हैं. उनके यहाँ जब कोई फंक्शन होता वे लोग मुझे अपने घर बुलाते थें. सभी कहते कि पटना से जो ऑफिसर आया है उसको बुलाओ. तो जब मैं उनके यहाँ जाता था तो देखता कि उनके तीन-चार तल्ले के बड़े-बड़े मकान हैं और घर में सबकुछ है. मतलब छोटे से बिजनेस से ही वो खुशहाल थें. तब मेरे मन ने कहा कि जो 40 साल से जॉब कर रहा है वो वैसे का वैसा ही है और जो छोटा-मोटा खुद का बिजनेस कर रहा है वह कितना आगे बढ़ गया. फिर मैंने पत्नी को समझाया कि बिजनेस करना है इसलिए मुझे जॉब छोड़नी पड़ेगी. पत्नी समझाती कि 'सर्विस मत छोड़िये. फिर हाँ-ना करते-करते करीब 8 साल निकल गए. तब एक दिन मैंने फाइनली डिसीजन लिया और वापस अकेला ही छुट्टी लेकर पटना आ गया. मैंने अपने काम के लिए बैंक से लोन लेकर बहादुरपुर गुमटी के पास लेथ मशीन, बेल्डिंग आदि लगाकर काम शुरू कर दिया. मैं अपनी छुट्टी कोई बहाना बनाकर बढ़ाता रहा क्यूंकि रिस्क नहीं लेना चाहता था. उधर पत्नी को विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं काम में सफलता पा लूंगा. लेकिन पत्नी के त्याग और वाहेगुरु के आशीर्वाद से काम चल निकला. मैंने अपना रिजिगनेशन भेज दिया और एक साल बाद पत्नी भी स्कूल से रिजाइन करके वापस लौट आयीं. उस समय गंगा ब्रिज बनना शुरू हुआ था, उसका बहुत सा काम लेबर रेट पर ही आने लगा. फिर मैं सुबह से लेकर रात के 18-18 घंटे काम करता. जब तीन-तीन बेटियों की जिमेवारी की चिंता बढ़ने लगी तो पत्नी ने किसी स्कूल में टीचर की सर्विस करने के लिए कहा तो मैंने मना कर दिया कि अब बच्चों को भी संभालना है, उन्हें पढ़ाना- लिखाना है इसलिए सोच-विचारकर घर में ही 'महिला सिलाई कटाई केंद्र' खुल गया. कुछ दिनों बाद मुझे फैक्ट्री के लिए अपनी जगह होना ज़रूरी लगने लगा. खोज-बिन के बाद एक मित्र के सहयोग से गंगा ब्रिज के पास पौने चार कट्ठा ज़मीन खरीद लिया. फिर वहां पत्नी के नाम 1982 में पटना कैलिवेटर्स खोल दी. मेरी पत्नी परमजीत जी अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन मुझे लगता है मेरी पत्नी लक्ष्मी थी, उसके भाग्य से मेरा काम चल निकला और टैंकर बनाने का ऑर्डर नेपाल से भी आने लगा. मगर दो सालों बाद ही 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या होने पर हमारा बहुत नुकसान हुआ. बहुत सा सामान लोग लूट ले गए. पर वाहेगुरु की कृपा से हमारा काम फिर से और पहले से भी अधिक चलने लगा. मैं न्यू जेनरेशन को यही सन्देश देना चाहूंगा की 'आप कोई भी काम करें लेकिन पहल तो आपको ही करनी पड़ेगी. यहाँ असम्भव कुछ भी नहीं है. आप अपनी लगन एवं मेहनत से अपनी बुलंदी की ईमारत खड़ी कर सकते हैं.' 

Wednesday, 25 October 2017

छठ की छटा पेंटिंग प्रदर्शनी के जरिये प्रस्तुत की गई बीेेेएनबी आर्ट गैलरी में

सिटी हलचल
Reporting : Bolo Zindagi 


बीेेेएनबी आर्ट गैलरी में चित्रकार बीरेंद्र बरियार (दाएं)
 के साथ 'बोलो ज़िन्दगी' के एडिटर राकेश सिंह 'सोनू'









पटना, 24 अक्टूबर, चित्रकार एवं वरिष्ठ पत्रकार बीरेंद्र नाथ बरियार द्वारा छठ पर्व पर बनाई गयी 7  तैल चित्र की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया.  


बीेेेएनबी आर्ट गैलरी में छठ थीम पर पेंटिंग प्रदर्शनी
बीेेेएनबी आर्ट गैलरी (आशियाना टावर) में शुरू हुई प्रदर्शनी 26 अक्टूबर तक चलेगी. सभी पेंटिंग्स में छठ पर्व की छटा दिखाई गयी है. बीरेंद्र जी छठ पर्व पर 21 पेंटिंग बना रहे हैं. फ़िलहाल 7 पेंटिंग प्रदर्शनी में लगायी गयी है. अगले साल छठ के मौके पर 21 पेंटिंग प्रदर्शनी में लगायी जाएगी. सभी पेंटिंग कैनवास पर ऑयल पेंट के जरिये बनाई गयी है. छठ बिहार का सबसे बड़ा और पवित्र पर्व है. छठ के बहाने बरियार ने महिला सशक्तिकरण का सन्देश देने की कोशिश की है.
       

बीेेेएनबी आर्ट गैलरी में छठ थीम पर पेंटिंग प्रदर्शनी

प्रदर्शनी में बरियार जी ने 'बोलो ज़िन्दगी' को बताया कि 'इस पेंटिंग प्रदर्शनी के जरिये मैं समाज को यही सन्देश देना चाहता हूँ कि छठ पर्व के दौरान 4 दिनों तक महिलाओं को खासा सम्मान दिया जाता है और सभी लोग उनके प्रति पवित्र भाव दर्शाते हैं. महिलाओं के प्रति यही भाव पूरे साल रखने की ज़रूरत है. छठ करनेवाली हर महिला अपने लिए व्रत नहीं करती बल्कि वह अपने पति, बेटे-बेटी, भाई, माता-पिता यानि अपने पूरे परिवार की खुशहाली एवं सुरक्षा के लिए 4 दिनों का कठोर व्रत रखती है. इसलिए पूरे परिवार को हर दिन उनका आदर करना चाहिए.'


Sunday, 22 October 2017

हेल्थ लाइन एवं आस्था फाउंडेशन के सौजन्य से 'पुरोधालय' में हुआ डायबटीज के प्रति जागरूकता कार्यक्रम

सिटी हलचल
Reporting : Bolo Zindagi


ऊपर बाएं से पूजा पांडेय(डायटीशियन,पारस हॉस्पिटल),राकेश सिंह 'सोनू'

('बोलो ज़िंदगी' के एडिटर), डॉ. दिवाकर तेजस्वी एवं अन्य अतिथिगण 
पटना, 22 अक्टूबर, नागेश्वर कॉलोनी स्थित बुजुर्गों की संस्था 'पुरोधालय' में हेल्थ लाइन और आस्था फाउंडेशन के सौजन्य से डायबटीज के प्रति एक जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया जहाँ उपस्थित मुख्य अतिथियों डॉ. दिवाकर तेजस्वी, पूजा पांडेय (डायटीशियन, पारस हॉस्पिटल), पूर्व आई.ए.एस. श्री श्याम जी सहाय ने बुजर्गों को डायबटीज से बचाव के उपयोगी टिप्स दिए. हेल्थ परिचर्चा के बाद 'पुरोधालय' के संजय जी ने वहां मौजूद बुजुर्गों का शुगर एवं ब्लड प्रेशर टेस्ट किया. आस्था फाउंडेशन ने कार्यक्रम में मौजूद अतिथियों एवं बुजुर्ग सदस्यों से 'पुरोधालय' कैम्पस में चार कदम चलवाकर 'वॉक फॉर लाइफ' का सन्देश दिया.
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. दिवाकर तेजस्वी ने बुजुर्गों को सम्बोधित करते हुए कहा कि 'देश के करीब 3.5 करोड़ लोग डायबटीज के चपेट में हैं. अनुमानतः यह आंकड़ा 2025 तक सात करोड़ पार कर जायेगा. आधुनिक युग में तनाव, गलत खान-पान, अव्यवस्थित रहन-सहन व शारीरिक परिश्रम ना करने की वजह से डायबटीज तेजी से पांव पसारता जा रहा है. यह बीमारी किसी को भी और किसी भी उम्र में हो सकती है. खसकर बुजुर्गों में यह बीमारी जल्दी असर करती है. इसलिए बुजुर्ग समय-समय पर डायबटीज की जाँच कराते रहें. डायक्टोलॉजिस्ट के संपर्क में रहें. बुजुर्गों से मेरी अपील ये है कि वे खुद इस रोग से बचाव करने के साथ-साथ अपने घर के युवाओं को भी जागरूक करें. क्यूंकि आज मॉर्डन लाइफ स्टाइल और जागरूकता के अभाव की वजह से उनको भी डायबटीज अपनी चपेट में लेता जा रहा है.'

'पुरोधालय' में डायबटीज से बचाव टिप्स देते मुख्य अतिथि 

वहीँ पारस हॉस्पिटल की डायटीशियन पूजा पांडेय ने कहा कि 'खान-पान ऐसा होना चाहिए कि जितना आप फिजिकल वर्क करते हैं वो सब बर्न हो जाये. मीठा के अलावा फैट में घी और तेल से परहेज करना चाहिए. हरी सब्जियों एवं फलों का ज्यादा सेवन करना चाहिए. ट्रेडिशनल खाने में चावल और रोटी आता है लेकिन बड़ी उम्र में चावल कम से कम खाना चाहिए. अगर खाएं भी तो अरवा की बजाये उसना चावल खाएं.'
       कार्यक्रम में उपस्थित हुए वरिष्ठ बुजुर्ग एवं पूर्व आई.ए.एस. श्री शयाम जी सहाय ने युवाओं से अपील की कि 'आप भी डायबटीज के प्रति जागरूक रहें क्यूंकि ये रोग किसी भी उम्र में हो सकता है. इसलिए मोबाईल और कंप्यूटर युग से कुछ देर के लिए बाहर निकलकर थोड़ा समय अपने स्वास्थ पर दें, शारीरिक श्रम ज्यादा करें और तनाव ग्रस्त ना रहें.'

'पुरोधालय' में शुगर व ब्लडप्रेशर जाँच कराते एवं 'वॉक फॉर लाइफ' 
के तहत वॉक करते हुए बुजुर्ग एवं अतिथिगण  

इस मौके पर हेल्थलाइन के सचिव एवं 'पुरोधालय' के संस्थापक अवधेश कुमार ने 'बोलो जिंदगी' को बताया कि - 'हमारे जो बुजुर्ग अभिभावक डायबटीज से घिरे हुए हैं उनको इस रोग से बचाने के उद्देश्य से आज यह कार्यक्रम किया गया है. इसके लिए शहर के मशहूर डॉक्टर्स को इस संबंध में हेल्थ टिप्स देने के लिए आमंत्रित किया गया है.' आस्था फाउंडेशन के सचिव पुरुषोत्तम सिंह ने कहा कि ' बुजुर्गों को डायबटीज से होनेवाली परेशानियों के बारे में बताना ज़रूरी है क्यूंकि बहुत सारे बुजुर्ग डायबटीज से पीड़ित हैं.' अंत में वहीँ संस्था की निदेशक निक्की सिंह ने कहा कि 'आस्था फाउंडेशन लगातार 'वॉक फॉर लाइफ' के माध्यम से लोगों को डायबटीज के प्रति जागरूक कर रहा है, इसी कड़ी में आज बुजुर्गों के बीच यह कार्यक्रम आयोजित किया गया.'  इस हेल्थ कार्यक्रम को सफल बनाने में वरिष्ठ रंगकर्मी एवं पूर्व उद्घोषक( सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग) डॉ. अशोक प्रियदर्शी, लाफ्टर गुरु विश्वनाथ वर्मा, 'पुरोधालय' कार्यकारिणी समिति के अध्यक्ष श्री रामदेव यादव, रिटायर्ड प्रो.एन.के.मिश्रा एवं प्रणय कुमार सिन्हा का सराहनीय योगदान रहा. 

Friday, 20 October 2017

मेघालय के राज्यपाल श्री गंगा प्रसाद ने किया डॉ.अनिल सुलभ के गीत-संग्रह 'मैं मरुथल-सा चिर प्यासा' का लोकार्पण

सिटी हलचल
Reporting : Bolo Zindagi


पटना, 20 अक्टूबर, मेघालय के राज्यपाल श्री गंगा प्रसाद ने बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के 99 वे स्थापना-दिवस समारोह में सम्मेलन अध्यक्ष डा. अनिल सुलभ के गीत-संग्रह 'मैं मरुथल-सा चिर प्यासा' और सम्मेलन के अर्थमंत्री योगेन्द्र प्रसाद मिश्र की पुस्तक 'शब्द, संस्कृति और सृजन' का लोकार्पण किया. इसके पूर्व बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा. अनिल सुलभ ने श्री प्रसाद को सम्मेलन की सर्वोच्च मानद उपाधि 'विद्या-वाचस्पति' से विभूषित किया. समारोह के मुख्य अतिथि और पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री पद्मश्री डा. सी. पी. ठाकुर को 'विद्या वाचस्पति', प्रख्यात विद्वान और साहित्यकार प्रो. शशिशेखर तिवारी को 'साहित्य-वाचस्पति' तथा पटना विश्व विद्यालय के पूर्व कुलपति डा. एस. एन. पी. सिन्हा और प्रख्यात लेखिका ममता मेहरोत्रा को 'विद्या-वारिधि' की मानद उपाधि प्रदान की गई. महामहिम ने साहित्य-सम्मेलन में विशेष योगदान के लिए सम्मेलन के वरीय अध्यक्ष ई. चंद्रदीप प्रसाद को 'साहित्य सम्मेलन विशिष्ट-सेवा सम्मान' से अलंकृत किया. इस अवसर पर सम्मेलन की सेवाओं के लिए अमरेन्द्र कुमार, कुमारी मेनका, महेश प्रसाद, उमेश कुमार, वीरेंद्र कुमार यादव, सुनीता देवी तथा शंभु राम को 'सम्मेलन-कर्मी सम्मान' से सम्मानित किया गया.

उद्घाटन समारोह में सभा को सम्बोधित करते हुए मेघालय के राज्यपाल 
 'साहित्य समाज को केवल आईना हीं नही दिखाता मार्ग भी दिखाता है. साहित्यकार यदि सन्मार्ग दिखाए तो हम एक लोक-कल्याणकारी और मूल्यवान मानव-समाज बनाने में सफल हो सकते हैं. बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है. भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डा. राजेंद्र प्रसाद, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, आचार्य शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, महान इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल, राजा राधिकारमण सिंह, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर', महाकवि केदारनाथ मिश्र 'प्रभात', पं. छविनाथ पाण्डेय, महाकवि मोहनलाल महतो 'वियोगी', पं रामदयाल पाण्डेय जैसी महान विभूतियाँ इसके अध्यक्ष पद को सुशोभित कर चुकी हैं. हिंदी भाषा और साहित्य की उन्नति में हीं नही, देश के स्वतंत्रता-संग्राम में भी यह स्थान आंदोलनकारी बलिदानियों का एक प्रमुख केंद्र था. सम्मेलन से जुड़े साहित्यकारों और प्रबुद्धजनों ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और जेल की यातनाएँ भी सही. संपूर्ण भारतवर्ष बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अवदानों और वलिदानों का ऋणी है.' यह बातें आज यहाँ बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के 99 वाँ स्थापना-दिवस समारोह का उद्घाटन करते हुए मेघालय के राज्यपाल गंगा प्रसाद ने कही.

साहित्य सम्मेलन के 99 वे स्थापना दिवस समारोह में बाएं से सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ, 
पूर्व केंद्रीय सवास्थ्य मंत्री पद्मश्री डॉ. सी.पी.ठाकुर एवं 'बोलो ज़िन्दगी' के एडिटर राकेश सिंह 'सोनू'
समारोह के मुख्य अतिथि डा. सी. पी. ठाकुर ने इस अवसर पर अपनी शुभकामनाएँ व्यक्त करते हुए सम्मेलन परिसर के मुख्य द्वार के पुनर्निर्माण एवं सीमा-दीवार के उन्नयन के लिए अपने सांसद-कोष  से 10 लाख की राशि प्रदान करने की घोषणा की.

अपने अध्यक्षीय उद्गार में सम्मेलन अध्यक्ष डा. अनिल सुलभ ने सम्मेलन की स्थापना से लेकर अब तक के उसके गौरवशाली इतिहास पर एक संक्षिप्त विवरणी प्रस्तुत की. उन्होंने कहा कि, 'सम्मेलन के शताब्दी-वर्ष में पूरे वर्ष होनेवाले विभिन्न आयोजनों की तैयारियाँ अभी से आरंभ की जा रही है. उन्होंने कहा कि सम्मेलन अपने शताब्दी वर्ष में देश के 100 वृद्धजनों का भी सम्मान करेगा, जिनका जन्म 1919 में हुआ हो. इनमें साहित्य-सेवियों को उच्च प्राथमिकता दी जाएगी. बिहार के सभी जिलों में अधिवेशन होंगे और स्थानीय साहित्यकारों को भी सम्मानित किया जाएगा. सम्मेलन के सौ वर्ष की उपलब्धियाँ दर्शाने वाला एक वृतचित्र तथा हिंदी साहित्य की प्रगति में सम्मेलन के योगदान से संबंधित एक हज़ार पृष्ठों के एक ग्रंथ का भी प्रकाशन किया जाएगा. शताब्दी-वर्ष के उद्घाटन तथा समापन-समारोहों में भारत के राष्ट्रपति जी तथा प्रधानमंत्री जी को आमंत्रित किया जाएगा.' उन्होंने स्मरण दिलाया कि सम्मेलन के स्वर्ण-जयंती-समारोह का उद्घाटन भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद जी ने किया था. इस अवसर पर प्रो. शशिशेखर तिवारी, डा. एस. एन. पी. सिन्हा, सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्रनाथ गुप्त तथा पं. शिवदत्त मिश्र ने भी संबोधित किया. अतिथियों का स्वागत सम्मेलन के प्रधानमंत्री आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव ने तथा धन्यवाद ज्ञापन साहित्यमंत्री डा.शिववंश पाण्डेय ने किया. मंच का संचालन सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा. शंकर प्रसाद ने किया.
      सम्मेलन के उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ कवि मृत्युंजय मिश्र 'करुणेश' की अध्यक्षता में विराट कवि-सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें 50 से अधिक कवियों ने अपने विविध भावों की कविताओं का पाठ कर इस उत्सव को चिरस्मरणीय बना दिया. काव्य-पाठ करने वालों में शायर आर.पी. घायल, कवि रमेश कँवल, वरिष्ठ कवि हरिश्चंद्र प्रसाद 'सौम्य', डा. कल्याणी कुसुम सिंह, राज कुमार प्रेमी, सुनील कुमार दूबे, कवयित्री आराधना प्रसाद, रवि घोष, शालिनी पांडेय, डा लक्ष्मी सिंह, डा अनुपमा नाथ, पूनम आनंद, सागरिका राय, लता प्रासर, बच्चा ठाकुर के नाम शामिल हैं. इस अवसर पर डा. वासुकीनाथ झा, श्रीकांत सत्यदर्शी, डा. कुमार वीरेंद्र, डा. विनोद शर्मा, विश्वमोहन चौधरी संत, शशिभूषण सिंह, बिंदेश्वर प्रसाद गुप्ता, कृष्णरंजन सिंह, आनंद मोहन झा समेत बड़ी संख्या में साहित्य-सेवी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित थे.

Wednesday, 18 October 2017

कला दिवस के मौके पर 'हौसला घर' के गरीब बच्चों के बीच बांटी गयी दिवाली की खुशियां

सिटी हलचल
Reporting: Bolo Zindagi

'हौसला घर' की बच्चियों के साथ 'बोलो ज़िन्दगी' के एडिटर राकेश सिंह 'सोनू'
पटना, 18 अक्टूबर, भारतीय जनता पार्टी कला संस्कृति प्रकोष्ठ के तत्वधान में बांकीपुर गर्ल्स हाई स्कूल के प्रांगण में स्थित 'हौसला घर' के गरीब बच्चों के बीच फल,मिठाई,पटाखे आदि का वितरण करते हुए उनके साथ दिवाली की खुशियां साझा की गयीं. इस अवसर पर गीत-संगीत का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया जिसमे कलाकार अवध किशोर, रानी सिंह एवं अमित द्वारा उम्दा गायिकी से बच्चों का मनोरंजन किया गया. 'हौसला घर' की कुछ बच्चियों ने भी अपना टैलेंट दिखाते हुए फ़िल्मी गानों पर मनमोहक डांस प्रस्तुत किये.

'हौसला घर' की बच्चियों के बीच गायकी प्रस्तुत करती कलाकार रानी सिंह 
कला दिवस के मौके पर आज बिहार के करीब 32 सांगठनिक जिलों में विभिन्न तरह के कार्यक्रम कला संस्कृति प्रकोष्ठ भाजपा की तरफ से मनाया जा रहा है. उसी के तहत मुख्यालय पटना में भी दीपावली की पूर्व संध्या पर यह कार्यक्रम आयोजित किया गया. मौके पर प्रदेश संयोजक वरुण सिंह ने कहा कि 'रक्षाबंधन के दिन जब इन बच्चियों ने मुझे राखी बांधी थी तभी मैंने निश्चय कर लिया था कि इनके लिए भाई बनकर मैं कुछ करूँगा. इसलिए आज हमने अपनी पूरी टीम के साथ इनके बीच दिवाली की खुशियां मनाने और बाँटने का कार्य किया. यहाँ की बच्चियों का टैलेंट देखते हुए मैं आगे कोशिश करूँगा कि उनको एक बड़ा मंच दिलाऊं.' वहीँ कला प्रकोष्ठ के सह- संयोजक आनंद पाठक ने कहा कि 'दिवाली तो हम अपनों के साथ हर साल मनाते हैं लेकिन इन गरीब बच्चों के साथ दिवाली की खुशियां सेलिब्रेट करने का एक अलग ही आनंद है. अपनी दिवाली हम इससे बेहतर ढंग से नहीं मना सकते. इसलिए ऐसे कार्यक्रम लगातार होने चाहिए.'

कला संस्कृति प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक वरुण सिंह बच्चियों के बीच पटाखे बांटते हुए 
गरीब बच्चियों का यह 'हौसला घर' एन.जी.ओ. महिला जागरण के तहत चलाया जाता है जिसकी अध्यक्ष नीलू जी हैं. 5 साल पहले 2012 में इसकी शुरुआत हुई थी एक प्राइवेट बिल्डिंग में फिर 2014  से यहाँ शिफ्ट हो गया. 'हौसला घर' की कॉडिनेटर रागिनी ने 'बोलो जिंदगी' को बताया कि यहाँ 60  बच्चियां हैं जो पहले कूड़ा-कचड़ा चुनती थीं और भीख मांगती थी. उन्हें संस्था द्वारा सर्वे के तहत पटना के कमला नेहरू नगर, बहादुरपुर, दीघा, बकरी मार्केट और स्टेशन से लाया गया है. यहाँ कक्षा 1 से 10 तक की पढ़ाई के साथ बच्चियों का रहना-खाना होता है. गवर्नमेंट की तरफ से तीन कमरा और मिड डे मिल का सपोर्ट मिला हुआ है. इस 'हौसला घर' में कुल 11 स्टाफ हैं. यहाँ बाहर से भी आकर टीचर पढ़ाती हैं. यहाँ की बच्चियां कराटे भी सीखती हैं और स्टेट लेवल पर कई सिल्वर व गोल्ड मैडल भी जीत चुकी हैं.

कला संस्कृति प्रकोष्ठ की टीम 'हौसला घर' की बच्चियों संग फुलझड़ियां जलाती हुई
कुछ बच्चियों के माँ-बाप नहीं हैं, कुछ रिश्तेदारों के यहाँ रहती थीं लेकिन वे उनका लालन-पालन ठीक से नहीं कर पाते थें. इस वजह से मजबूरन वे भीख मांगने और कचड़ा चुनने का काम करती हैं. शुरू-शुरू में यहाँ लाये जाने पर ये बच्चियां भाग जाती थीं लेकिन फिर उनको प्यार से समझाने और उनकी काउंसलिंग कराने के बाद वे अपने बेहतर भविष्य की सोच यहाँ रहने का फैसला करती हैं.'
इस मौके पर सह संयोजक विनीता मिश्रा, प्रदेश प्रवक्ता सह कोषाध्यक्ष नीरज झा, शैलेश महाजन, सिनेमा इंटरटेनमेंट के रंजीत श्रीवास्तव, करण सिंह, अमरजीत, मनीष चंद्रेश, अक्षत प्रियेश और कला प्रकोष्ठ के सभी पदाधिकारी मौजूद थें जिन्होंने 'हौसला घर' की बच्चियों के साथ मिलकर फुलझड़ियां भी जलायीं.

Monday, 16 October 2017

बेटियों- लड़कियों के हक़ की लड़ाई लड़ना चाहती हूँ : वारुणी पूर्वा, समाजसेविका एवं छात्रा

सशक्त नारी
By : Rakesh Singh 'Sonu'

दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्मन लैंग्वेज में ग्रेजुएशन कर चुकी वारुणी पूर्वा की माँ गृहणी हैं और पिता जी पटना हाईकोर्ट में एडवोकेट हैं. दिल्ली से वापस पटना आने के बाद वारुणी पटना यूनिवर्सिटी से हिस्ट्री ऑनर्स में फिर से ग्रेजुएशन कर रही हैं. क्यूंकि उन्होंने जो जर्मन में ग्रेजुएशन किया है उसका स्कोप पटना में नहीं है. उसका स्कोप दिल्ली में है. लौटने के बाद वे सिर्फ एक दिन के लिए अपने घर पर रुकीं. पिता वारुणी को इंजीनियर बनते देखना चाहते थें लेकिन जब वारुणी ने बताया कि वे एक सामाजिक संगठन से जुड़ गयी हैं इसलिए अब अपने करियर लाइफ के आलावा कुछ समय वे इसमें भी देंगी, तब उनकी ये बात घरवालों को हजम नहीं हुई. पिता जी अपने खिलाफ जाने से बहुत क्रोधित हुए. और वैसे भी इंडिपेंडेंटली काम करने में आपको अलग रूम लेकर रहना ही ठीक होता है ये विचार करके वारुणी ने अगले दिन घर छोड़ दिया. अभी वे बांसघाट इलाके में सिंगल रूम किराये पर लेकर अकेली रहती हैं. अपने खर्च के लिए ए.जी. कॉलोनी में जाकर होम ट्यूशन पढ़ाती हैं. ट्रैवलिंग में भाड़े का खर्चा बचाने के लिए वे साइकल से आती-जाती हैं. साढ़े नौ से साढ़े ग्यारह बजे तक उनका कॉलेज में ऑनर्स क्लास होता है. कॉलेज से रूम पर वापस आकर खा-पीकर वे गोसाईं टोला मोड़ के पास इंदिरा घाट मंदिर पहुँच जाती हैं. वहां 'नौजवान भारत सभा' संगठन के अंतर्गत 'शिक्षा सहायता मंडल' के नाम से चलाये जा रहे कार्यक्रम में गरीब बच्चों को पढ़ाती हैं. ये अभियान वहां 2013  से चल रहा है और वारुणी इसका हिस्सा पिछले साल बनीं. कक्षा 8 से 12 वीं तक के स्टूडेंट को साइंस और मैथ हफ्ते में 5 दिन पढ़ाया जाता है. अगर कोई आर्ट्स का स्टूडेंट आ गया तो उसे भी रख लिया जाता है. सन्डे को मार्शल आर्ट की भी शिक्षा दी जाती है. फ़िलहाल वहां 30 बच्चे आते हैं जिनसे महीने में सिर्फ 100 रुपया लिया जाता है. वारुणी कहती हैं कि 'यहाँ बच्चों को पढ़ाकर हम परोपकार जैसी चीज नहीं कर रहें, हमलोगों का मानना है कि ये उनका हक़ है. कुछ लोगों का एम होता है कि वो कुछ करें लेकिन उनकी फैमली उनको फाइनेंशली सपोर्ट नहीं कर पाती. इसलिए वैसे बच्चों को आगे बढ़ने में हमलोग मदद करते हैं. भगत सिंह जैसे लोग सिर्फ आजादी की बात नहीं करते थें बल्कि वो ये भी कल्पना करते थें की आजादी के बाद का भारत कैसा होगा लेकिन उन्होंने जो सपना देखा वो भारत आज है नहीं. इसलिए हमलोग उनके सपनों का भारत बनाने के लिए कार्यरत हैं.' इस संगठन के तहत गोसाईं टोला इलाके में ही एक लाइब्रेरी भी खुली है जहाँ वारुणी और उनके सहयोगी बारी-बारी से वहां अपना समय देते हैं. लाइब्रेरी में भगत सिंह, प्रेमचंद, निराला, टैगोर आदि के बहुत सारे प्रोग्रेसिव लिट्रेचर्स हैं. आज के ज्यादातर युवाओं का समय स्मार्ट फोन एवं सेल्फी खींचने में जा रहा है. इंटरनेट पर हर चीज मिल जाती है लेकिन किताब पढ़ने का एक अलग ही मजा होता है. लाइब्रेरी में ये लोग किसी टॉपिक पर बच्चों के बीच डिस्कशन भी कराते हैं. वारुणी अपने साथियों के साथ बच्चों के बीच जाकर ये प्रचार करती हैं कि वे अपना समय मोबाइल और इंटरनेट पर बर्बाद ना करें बल्कि लाइब्रेरी आकर भी अपने समय का सदुपयोग करें. इसके अलावा वारुणी संगठन की तरफ से लो मिडिल क्लास इलाके में मेडिकल कैम्प और साइंस कैम्प भी लगाती हैं. जिसमे बच्चों एवं बड़ों के बीच जाकर साइंस एक्सपेरिमेंट के जरिये अन्धविश्वास को टारगेट किया जाता है. उनकी टीम में 10-12 लोग हैं जिनमे 2-3 लड़कियां हैं. अपने संगठन के साथियों के साथ वारुणी पटना यूनिवर्सिटी के लिए भी काम करती हैं. वहां बहुत बड़ा मुद्दा है कि गर्ल्स हॉस्टल का जो रोड है बहुत सुनसान जगह पर है. वहां मौजूद दो बॉयज होस्टल्स के बीच हमेशा लड़ाई होती है और गर्ल्स हॉस्टल की लड़कियां अक्सर उनका शिकार बनती हैं. वारुणी बताती हैं कि 'पुलिस में कोई जल्दी रिपोर्ट नहीं करता क्यूंकि फिर घरवाले परेशान करेंगे और वापस बुला लेंगे. लड़कियों के साथ ये समस्या है कि वे विद्रोह या आवाज नहीं उठा सकतीं क्यूंकि सबसे पहले उनको घरवाले ही दबाते हैं. घरवाले ही बोलते हैं कि कोई सड़क पर कुछ बोले तो पलटकर जवाब ना दो, चुपचाप आगे निकल जाओ. लेकिन ये सब करने से तो चीजें रुकेंगी नहीं और ज्यादा होंगी. तो अक्सर होनेवाली इन घटनाओं को लेकर हमलोग साइंस कॉलेज और पटना कॉलेज में कैम्पेन चलाते हैं. 8 मार्च महिला दिवस के अवसर पर 'पिंजड़ा तोड़' मूवमेंट के नाम से यहाँ एक रैली भी निकाले थें.' वारुणी ने बताया कि अभी हाल में उनके साथ ही कॉलेज परिसर में एक लड़के द्वारा छेड़खानी की वारदात हुई. उन्होंने एफ.आई.आर. करवाया, उसके बाद वी सी के पास जाकर ज्ञापन सौंपें थें कि यूनिवर्सिटी में जेंडर सेंसेटाइजेशन सेल होना चाहिए. कॉलेज का कोई स्टूडेंट अगर ऐसा करता है तो यूनिवर्सिटी उसपर तुरंत एक्शन ले. अक्सर ऐसे मामलों में यूनिवर्सिटी कुछ नहीं करती. ये हर जगह की कॉमन प्रोब्लॉम है जिसका नतीजा था हाल ही में बी.एच.यू. में हुआ छात्राओं का आंदोलन.

संत माइकल्स स्कूल, पटना से 12 वीं करने के बाद वारुणी जब उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली जाना चाहती थीं तब निर्भया कांड के डर से उनके अभिभावकों ने उन्हें दिल्ली जाने की इजाजत नहीं दी. लेकिन फिर भी घरवालों की नाराजगी झेलते हुए वारुणी दिल्ली गयीं और घरवालों के सपोर्ट ना करने के बावजूद खुद से ट्यूशन पढ़ाकर वहां अपनी पढ़ाई जारी रखी. वे जर्मन में ही एम.ए भी करना चाहती थीं लेकिन फिर पैसों के अभाव में वे पटना वापस आ गयीं. 12 वीं में जो टीचर उन्हें कोचिंग पढ़ाते थें उनके माध्यम से वे दिल्ली में रहते हुए 'नौजवान भारत सभा' संगठन से जुड़ीं और शहीद भगत सिंह के विचारों से प्रभावित हुईं. इस संगठन को 1926  में भगत सिंह एवं उनके साथियों ने ही बनाया था जिसे रिवाइव करते हुए 2005 से यह संगठन शुरू हुआ है. अभी दिल्ली, मुंबई,पटना, इलाहबाद, लखनऊ, बैंगलोर इन सभी जगहों पर इसकी शाखाएं हैं. दिल्ली में इस संगठन से जुड़कर वारुणी मजदूर इलाकों में बच्चों को पढ़ाती थीं. उन इलाकों में संगठन द्वारा लगाए गए मेडिकल कैम्प में हिस्सा लेती थीं. तब सहयोग के लिए पढ़नेवालों से 5 रुपया लिया जाता था क्यूंकि संगठन का मानना है कि लोगों के अंदर भीख मांगने की जो प्रवृति हो जाती है तो आप जितना भी मदद दे सकते हैं दीजिये लेकिन भीख वाली बात मन में ना जाये. इसलिए केवल टोकन सहयोग के रूप में 5 या 2 रूपए कुछ-न-कुछ लोग सहयोग करते थें.

ऊपर बाएं से वारुणी संगठन के साथियों के साथ बी.एच.यू. की छात्राओं के सपोर्ट में धरना देती हुई, पिछड़े इलाकों में मेडिकल
कैम्प लगवाती हुईं, बाढ़ राहत के लिए रूपए इकट्ठे करती हुईं और साइंस कैम्प के द्वारा अन्धविश्वास पर चोट करती हुईं
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   वारुणी फ़िलहाल एक साल से अपने घर नहीं गयी हैं. माँ और छोटी बहन से सिर्फ फोन पर ही कभी-कभी बातें हो जाती हैं. वारुणी बताती हैं कि '12 वीं करने के बाद जितनी चीजें मैंने घर में देखी और माँ से सुनी कि मेरे चाचा के दो बेटे हैं तो दादा-दादी उनको बहुत प्यार करते हैं और हम तीन बहनों के साथ बहुत गंदे तरीके से व्यवहार करते थें. मेरी माँ ने पहली बार लड़की को जन्म दिया, दूसरी बार भी लड़की पैदा हुई. तीसरी बार जब माँ प्रेग्नेंट थीं उनको ठीक से भरपेट खाना तक नहीं दिया जाता था. और यह सिर्फ एक ही घर की कहानी नहीं है बल्कि आज भी बहुत से घरों में बेटों की तुलना में बेटियों को दोयम दर्जे का और उन्हें मनहूस समझा जाता है. तो इन सब चीजों को बदलने के लिए कि जो चीज एक लड़की सहती है वह कैसे बदला जाये मैं सोचती रहती थी. सुधार सिर्फ फैमली से नहीं होगा बल्कि समाज में बनी हुई मूल्य-मान्यताएं बसी हुई हैं कि लड़कियां सिर्फ खाना बनाने, शादी करने और बच्चे पैदा करने के लिए ही हैं तो ये सोच बदलने के लिए आपको पूरे सोसायटी लेवल पर काम करना होगा.' इसी सोच की वजह से वारुणी नौजवान भारत सभा से जुड़ी जो ना कोई पोलिटिकल पार्टी से जुड़ा है और न ही कोई एन.जी.ओ. है. वारुणी का मुख्य लक्ष्य है समाज को बदलने के लिए अपनी जिंदगी लगा देना. और पेशे के तौर पर वे खुद को क्रांतिकारी ही मानती हैं.
     

Wednesday, 11 October 2017

आचार्य रामचंद्र शुक्ल जयंती पर कवि श्री हरिश्चंद्र प्रसाद 'सौम्य' की काव्य-पुस्तक 'अंतर्प्रवाह' का हुआ लोकार्पण

सिटी हलचल
Reporting : Bolo Zindagi 

'अंतर्प्रवाह' के लोकार्पण समारोह में दाएं से सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश श्री चन्दमौली प्रसाद,
'अंतर्प्रवाह' के कवि श्री हरिशंकर प्रसाद 'सौम्य' एवं 'बोलो ज़िन्दगी' के एडिटर राकेश सिंह 'सोनू'
 
पटना, 11 अक्टूबर, 'बिहार हिंदी साहित्य समेल्लन' के तत्वधान में आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती के अवसर पर वरिष्ठ कवि श्री हरिश्चंद्र प्रसाद 'सौम्य' की काव्य-पुस्तक 'अंतर्प्रवाह' का लोकार्पण हुआ. पुस्तक लोकार्पण समारोह के मुख्य अतिथि थें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एवं प्रेस काउन्सिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन श्री चंद्रमौली कुमार प्रसाद. वहीँ विशिष्ट अतिथि थें पटना हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश श्री राजेंद्र प्रसाद. लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता की बिहार हिंदी साहित्य सम्मलेन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने. 'अंतर्प्रवाह' का लोकार्पण करते हुए न्यायमूर्ति श्री चंद्रमौली प्रसाद ने कहा कि 'पिछले 40 सालों से वे न्यायिक सेवा में हैं और इस वजह से उन्हें कभी किसी कार्यक्रम में हिंदी में बोलने का सुनहरा मौका नहीं मिल पाया. लेकिन आज इस मौके पर साहित्य सम्मलेन के सभागार में मुझे हिंदी में बोलने का अवसर मिला है तो मुझे खुशी महसूस हो रही है. मेरा जन्म पटना में हुआ और कदमकुआं के बिहार हिंदी साहित्य समेल्लन भवन के पास से कई बार गुजरना हुआ लेकिन मैं कभी हिंदी साहित्य समेल्लन के कैम्प्स में नहीं आया और ना ही कभी मुझे हिंदी साहित्य से वास्ता हुआ. जब मेरे परिचित कवि हरिश्चंद्र प्रसाद जी ने इस कार्यक्रम में मुझे बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया तो मैं यहाँ आने से अपने आप को रोक नहीं पाया. मेरा सौभाग्य है कि यहाँ आकर मुझे कई वरिष्ठ साहित्यकारों से रु-ब-रु होने का अवसर प्राप्त हुआ.'

काव्य-संग्रह 'अंतर्प्रवाह' का लोकार्पण करते हुए अतिथिगण 
वहीँ 'अंतर्प्रवाह' पुस्तक के कवि श्री हरिश्चंद्र प्रसाद 'सौम्य' जी ने 'बोलो ज़िन्दगी' को बताया कि 'अंतर्प्रवाह मन के चिंतन व ह्रदय के भावों की गहराइयों का वह प्रवाह है, जो शब्दों के माध्यम से प्रस्फुटित होता है. इस यात्रा की शुरुआत 'द्रुम पथिक वार्ता' काव्य रचना से हुई जिसे मैंने स्कूल की कक्षा 8 वीं में लिखा था. 'बापू वियोग' कविता महात्मा गाँधी की हत्या के दिन रचित हुई थी. इस पुस्तक में मेरे किशोरावस्था से लेकर अब तक लिखी काव्य रचनाओं का संकलन है जो सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं की ओर ध्यान इंगित करने का प्रयास करता है. पत्र-पत्रिकाओं और कवि गोष्ठियों में तो मेरी कविता को सराहना मिली लेकिन उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर 'अंतर्प्रवाह' के रूप में मेरा पहला काव्य-संग्रह प्रकाशित हुआ है. अभी मेरी उम्र 85 साल की है और इस उम्र में मेरा यह सपना कभी संभव नहीं हो पता अगर मेरे परिवार खासकर मेरे पुत्रों का विशेष सहयोग मुझे नहीं मिला होता.'
   लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता कर रहे डॉ. अनिल सुलभ ने बताया कि 'वरिष्ठ कवि श्री हरिशंकर प्रसाद 'सौम्य' जी आरम्भ में साहित्यिक संस्था 'साहित्यांचल' पटना से जुड़ गए थें. फिर बिहार हिंदी साहित्य सम्मलेन,पटना तथा अन्य मंचों से अपनी काव्य-रचनाओं का लगातार पाठ करते आ रहे हैं. उनका यह काव्य-संग्रह 'अंतर्प्रवाह' भारत की सभ्यता-संस्कृति एवं इसकी मजबूत आध्यात्मिक जड़ों को रेखांकित करने का सार्थक प्रयास है.' कार्यक्रम में बिहार हिंदी साहित्य सम्मलेन के प्रधानमंत्री आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव एवं साहित्य मंत्री डॉ. शिववंश पांडेय जी ने भी अपने-अपने वक्तव्य रखें. मंच का संचालन योगेंद्र प्रसाद मिश्र जी ने किया. 

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