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'बोलो ज़िन्दगी' ऑनलाइन मैगजीन के एडिटर हैं राकेश सिंह 'सोनू'

Saturday, 7 December 2019

दूसरी पुण्यतिथि पर याद किये गये 'अमृतवर्षा' के संस्थापक-संपादक स्व. पारसनाथ तिवारी



पटना, 7 नवंबर, पत्रकारिता जगत के लौह पुरूष कहे जाने वाले अमृतवर्षा हिन्दी दैनिक के संस्थापक संपादक स्वर्गीय पारसनाथ तिवारी बाबा की दूसरी पुण्यतिथि पर पत्रकारिता जगत ने उनको याद किया। दक्षिणी मंदिरी स्थित बिहार श्रमजीवी पत्रकार युनियन के कार्यालय परिसर में बिहार के जाने माने पत्रकारों ने उन्हें श्रद्धांजली प्रदान की तथा उन्हें याद किया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर, बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव प्रेम कुमार, संजय शुक्ला, कृष्ण कांत ओझा, संजीव कुमार, बन बिहारी तिवारी, संतोष कुमार, अभिषेक मिश्र, अमित कुमार, कनिष्क सिंह, रमेंद्र सिंह, चंद्रकांत मिश्रा, अभिषेक कुमार सिंह, मृत्युंजय ,देव प्रकाश  , धर्मेन्द्र कुमार, राज किशोर प्रसाद , ओम प्रकाश श्रीवास्तव , मिथिलेश पाठक, समेत इलेक्ट्रॉनिक तथा प्रिंट मीडिया से जुड़े कई पत्रकार उपस्थित थे।
बाबा की पुण्यतिथि पर उनको याद करते हुए बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव प्रेम कुमार ने कहा कि बाबा ने निडरता और निर्भिकता के साथ पत्रकारिता की। अपने मार्गदर्शन में काम करने वाले पत्रकारों को को भी उन्होंने निडर और निर्भिक बनाया। जाने माने पत्रकार और स्वत्व पत्रिका के संपादक कृष्णकांत ओझा ने कहा कि बाबा जीवनपर्यंत नैतिक मूल्यों के आधार पर निष्पक्ष एवं  समतामूलक पत्रकारिता करते रहे। आज के परिप्रेक्ष्य में उसी प्रकार के पत्रकारिता की जरूरत है। बाबा को याद करते हुए अमृतवर्षा हिन्दी दैनिक के संपादक बन बिहारी तिवारी ने कहा कि बाबा ने संघर्ष करना सिखाया। बाबा खुद मुश्किल राह पर चलते रहे, संघर्ष करते रहे। सच के साथ समझौता न करने की जिद की वजह से उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। बाबा की दूसरी पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजली सभा में बिहार के कई जाने माने पत्रकारों ने शिरकत की। पत्रकारों ने बाबा की पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजली दी।

Wednesday, 4 December 2019

रोटरी चाणक्या ने दिव्यांग बच्चों के साथ विश्व दिव्यांग दिवस मनाया



पटना, हॉल में तेज म्यूजिक के साथ बॉलीवुड के हिट सॉन्ग बज रहे थें. लेकिन अचरज की बात ये कि कुछ बोल-सुन ना पानेवाले दिव्यांग बच्चे बिना सॉन्ग सुने ही कमाल का डांस परफॉर्मेंस कर रहे थें. उनका डांस जिसने भी देखा वाह-वाह कह उठा. यह नजारा था 3 दिसंबर की शाम पटना के रोटरी भवन में रोटरी चाणक्या द्वारा विश्व दिव्यांग दिवस के अवसर पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम का. 
जे. एम. इंस्टीटूट के मूक एवं बघिर बच्चों ने बेजोड़ नृत्य प्रस्तुत कर सभी को चकित कर दिया. उनके साथ-साथ सहारा होम के मेंटली डिसेबल बच्चों-युवतियों ने भी अपने नृत्यनाटिका से सभी का दिल जीत लिया. रंगारंग कार्यक्रम में रंग तब जमा जब मौजूद अतिथि भी नृत्य कर रहे दिव्यांग बच्चों की टोली में शामिल हो गएँ. इसी बीच एक स्पेशल गेस्ट सोशल एक्टिविस्ट दिव्यांग राधा जब व्हील चेयर के बिना ही डांस के जरिये अपनी ख़ुशी का इजहार करने लगी, तो उसकी इस ख़ुशी में वहां मौजूद मुख्य एवं विशिष्ठ अतिथिगण भी शामिल हो गएँ. उनके साथ-साथ कार्यक्रम के आयोजक भी डांस करते हुए राधा को सपोर्ट करने लगें.


कार्यकर्म में मुख्य अतिथि थे बिहार राज्य आयुक्त दिव्यांग, समाज कल्याण विभाग के डॉ. शिवजी कुमार. डॉ कुमार ने दिव्यांगों को कड़ी मेहनत करने की सलाह दी ताकि वे पैराओलंपिक प्रतियोगिता में देश का नाम रौशन कर सकें.
वहीँ रोटरी चाणक्या के अध्यक्ष डॉ श्रवण कुमार ने बताया कि "भगवान अगर किसी के अंग मे कमी देते हैं तो उसके अन्य अंग को दिव्य शक्ति प्रदान करते हैं इसीलिए हम इन्हें दिव्यांग कहते हैं. बस जरूरत है उसके दिव्य अंग की महत्ता को समझने और उसे सही मार्गदर्शन देने की."
जे एम इंस्टीटूट के डॉ मनोज कुमार ने बताया कि "उनके इंस्टिट्यूट में सभी बच्चे बहुत अच्छे काम कर रहे हैं."

कार्यक्रम के आयोजक सुनील सराफ, अभिषेक अपुर्व, संदीप चौधरी और क्लब के सचिव निखिल नटराज ने बच्चों को पारितोषिक देकर सम्मानित किया. इस कार्यक्रम का सन्चालन सोनल जैन ने किया और इसे सफल बनाने में आशीष बांका, नीना मोटानी, प्रकाश अग्रवाल, आशीष अग्रवाल, सीमा बंसल आदि ने साथ दिया.

मौके पर मौजूद थे रोटरी की पूर्व मंडलाध्यक्ष बिंदु सिंह, संदीप सराफ, बिपिन चचाण, नीना कुमार, नम्रता जी, अभिषेक अकेला, डॉ. रमित गुंजन, सुनील भालोटिया और बोलो ज़िन्दगी से राकेश सिंह सोनू, तबस्सुम अली, प्रीतम कुमार आदि.

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : शायरा ज़ीनत शेख़ की फैमली, फुलवारीशरीफ़, पटना



 1 दिसंबर, रविवार की शाम 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटना के फुलवारीशरीफ़ इलाके में शायरा ज़ीनत शेख़ जी के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में जीएसटी असिस्टेंट कमिश्नर एवं शायर समीर परिमल भी शामिल हुयें. इस कार्यक्रम को सपोर्ट किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों ज़ीनत जी की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.

फैमली परिचय- जीनत शेख़ शायरा, कवियत्री, फेसबुक आरजे हैं. मायका गिरिडीह, झाड़खंड में है. इनके पिताजी अब्दुल ज़लील मिर्ज़ा सीनियर एडवोकेट हैं. माँ नसीमा मिर्ज़ा गवर्नमेंट स्कूल में प्रिंसिपल रह चुकी हैं. ये एक भाई एक बहन हैं. भाई मिर्ज़ा ज़फर कोलकाता में आईबीएम कम्पनी में सॉफ्टेयर इंजीनियर हैं. ज़ीनत जी का ससुराल रोहतास जिले के विक्रमगंज में है. ससुर शेख़ मोबिन अहमद आर्मी में थें. सास समीमआरा हाउसवाइफ थीं. ज़ीनत जी के हसबैंड साबिर शेख़ पुलिस ऑफिसर हैं. उन्हें पुराने गीत गाने का शौक है. तीन बच्चे हैं. बड़ी बेटी सोबिया फातिमा एनएमसीएच पटना में एमबीबीएस सेकेण्ड ईयर की स्टूडेंट है. छोटी बेटी सानिया फातिमा डीएबी बीएसईबी में 12 वीं क्लास में है. बेटा अयान शेख़ रेडियंट इंटरनेशनल में 8 वीं क्लास में है.


शेरो -शायरी की शुरुआत कैसे हुई ? - ज़ीनत जी को बचपन से ही साइंस की जगह आर्ट्स में रूचि थी. खासकर साहित्य से बहुत लगाव था. तब स्कूल में उर्दू सब्जेक्ट नहीं था इसलिए घर में ही उर्दू ट्यूशन शुरू हो गया. हिंदी-उर्दू की बहुत सारी मैगजीन्स घर में आती थी और बचपन से ही पढ़ने का शौक लग गया. धीरे-धीरे इनका इंट्रेस्ट लिखने-पढ़ने में बहुत बढ़ता चला गया. शुरू में 2 लाइन की शायरी लिखा करती थीं. स्कूल की मैगजीन्स के साथ-साथ राष्ट्रीय पत्रिकाओं में भी रचनाएँ छपने लगीं.  गिरिडीह के वीमेंस कॉलेज से इंग्लिश लिटरेचर में ग्रेजुएशन किया उसके बाद शादी हो गयी. शादी बाद जब बच्चे हुए तो जिम्मेदारियों की वजह से लेखन का सिलसिला बंद हो गया. बच्चे जब बड़े व समझदार हुए, उनका वक़्त स्कूल में गुजरने लगा तो ज़ीनत जी ने फिरसे लिखना शुरू किया. एक दफा चार लाइनें इनकी बड़ी बेटी ने सुना तो कहा - मम्मी मोबाइल में एक ऐप है योरकुट ऐप तो आप क्यों नहीं उसमे लिखती हैं. बेटी ने योरकुट पर इनका एकाउंट बना दिया और उसपर ज़ीनत जी ने रोज लिखना शुरू कर दिया. उसपर बहुत सारे फॉलोवर्स हो गएँ. बहुत से लोग जानने लगें.

एचीवमेंट - जब योरकुट वालों ने पहला ओपेन माइक पटना में किया तो ज़ीनत जी को भी इन्वाइट किया. वहां पर उन्होंने एक कविता नारी पर सुनाई और सभी को बहुत पसंद आयी. फिर जब दूसरी बार ये आयोजन हुआ तो फिर मौका मिला. उसके बाद पेन ऑफ़ पटना के कार्यक्रम के कई एपिसोड इन्होने होस्ट किया. फिर इन्होने फेसबुक पर एमफोबिक पेज बनाया और उसपर ज़ीनत शेख़ के नाम से अपना प्रोग्राम शुरू किया. तो इसतरह से ये इण्डिया की पहली फेसबुक आरजे बन गयीं. उसके बाद विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं के साथ रेडियो -दूरदर्शन के प्रोग्राम के लिए निमंत्रण आने लगें. पहले शायरी ज्यादातर प्रेम के विषय पर लिखती थीं लेकिन अब ये चाहती हैं कि हर टॉपिक पर लिखें और खासकर समाज में बढ़ रही नफरतों के मौहौल में अपनी रफचनाओं के माध्यम से प्रेम का सन्देश देना चाहती हैं.  अबतक 25 -30 मुशायरा-कवि सम्मेलनों में हिस्सा ले चुकी हूँ. पीएजीएसी फाउंडेशन ने जब पटना की 10 सशक्त माँओं को सम्मान के लिए चुना तो उनमे से एक नाम ज़ीनत का भी था. हाल ही में काव्य योद्धा कार्यक्रम में प्रसिद्ध साहित्यकार भगवती प्रसाद दिवेदी जी के साथ जज की भूमिका के लिए भी इन्हे चुना गया. इसी साल पटना एम्स में पोयट्री कम्पटीशन हुआ था मेडिकल स्टूडेंट्स का तो उसमे भी इन्हें दो डॉक्टर्स के साथ बतौर निर्णायक जज सेलेक्ट किया गया था. अख़बारों में आज भी रचनाएँ छपती रहती हैं. समय-समय पर आकाशवाणी-दूरदर्शन के कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेती हैं.

फैमली मेंबर्स का टैलेंट - सोबिया फातिमा- पढ़ाई में तो अव्वल हैं ही उसके साथ-साथ सिंगिंग, डांसिंग, राइटिंग, पेंटिंग, कुकिंग, एम्ब्रायडरी का भी शौक रखती हैं. पटना एम्स में हुए फेस्ट में सारे मेडिकल स्टूडेंट्स के बीच हुए डिबेट में फर्स्ट आयी थीं. अपने स्कूल में बेस्ट ऑलराउंडर स्टूडेंट की ट्रॉफी मिली थी. दो साल लगातार स्कूल की हेड गर्ल भी बनाया गया.
सानिया फातिमा- लेखन एवं अभिनय के अलावा वो अच्छी स्पोर्ट्स गर्ल भी हैं. हमेशा स्कूल में रनिंग में फर्स्ट आती रही हैं.
अयान शेख़ - स्कूल के बेस्ट ओरेटर की ट्रॉफी जीत चुके हैं. स्कूल में हुए डिबेट कम्पटीशन में हमेशा फर्स्ट आते हैं. गाते भी अच्छा हैं. एसकेमेमोरियल में हुए कई कार्यक्रमों में सिंगिंग की है और सम्मानित भी हुए हैं.

फिर बोलो ज़िन्दगी टीम की मौजूदगी में इस फैमली ने अपना फैमिली पैक प्रेजेंटेशन दिया. जहाँ ज़ीनत शेख़ जी ने दो उम्दा गज़लें सुनायीं, उनके हसबैंड शेख़ साबिर जी ने अपनी दिलकश आवाज में दो सदाबहार गीत सुनाएँ. वहीँ इनके बेटे अयान ने कैलाश खेर का एक सूफी गीत सुनाया. बड़ी बेटी सोबिया फातिमा ने अपनी एक कविता एवं एक फ़िल्मी गीत सुनाया. और छोटी बेटी सानिया फातिमा ने एक शार्ट कॉमेडी एक्ट दिखाकर सभी को खूब हंसाया.
स्पेशल गेस्ट की टिप्पणी - इस कार्यक्रम में बतौर स्पेशल गेस्ट के रूप में उपस्थित शायर समीर परिमल जी ने अपनी टिप्पणी में जीनत शेख़ और उनके फैमिली मेंबर्स के टैलेंट की खूब सराहना की और कहा कि हम तो सभी का हुनर देख दंग रह गएँ. फिर आखिर में मजाकिया लहजे में ज़ीनत शेख़ के कुकिंग टैलेंट की तरफ इशारा करते हुए कहा कि - "यहाँ हर कला का डेमो दिखाया जा रहा है जिसके आधार पर हम अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं. लेकिन ज़ीनत जी जो इतना अच्छा खाना बनाती हैं अगर वो बनाकर खिलाएं तब तो हम कुछ खाने पर टिप्पणी करें." फिर एक जोर के ठहाके के साथ यही आम राय बनी कि किसी और दिन ज़ीनत जी के यहाँ फिरसे तशरीफ़ लाते हैं और उनके हाथों के बने लज़ीज व्यंजन चखते हैं. 

(इस पूरे कार्यक्रम को bolozindagi.com पर भी देखा जा सकता है.)
























Monday, 2 December 2019

पटना की लड़कियों को मासिक सुरक्षा के प्रति किया गया जागरूक



दिनांक 2.12.19 को पटना  मारवाड़ी महिला समिति द्वारा ज्ञान निकेतन गर्ल्स हाई स्कूल ,दीघा रोड में लड़कियों के स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए एक वेंडिंग मशीन की जानकारी और मासिक सुरक्षा के प्रति जागरूकता कार्यक्रम किया गया।

समिति की अध्यक्ष नीना मोटानी ने बताया कि "अक्सर जागरूकता के अभाव में लड़कियां और महिलाएं गंदे पुराने कपड़े ,प्लास्टिक और राख का उपयोग करती हैं। सफाई के अभाव में वे असमय बच्चेदानी के कैंसर का शिकार भी हो जाती हैं।" अतः समिति की ओर से स्कूल में एक सैनिटरी वेंडिंग मशीन का डेमो दिया गया कि जहां कहीं भी ये मशीन हो वे 5 रूपए का सिक्का डालकर पैड निकाल सकती हैं।

श्रीमती केसरी अग्रवाल ने बच्चियों को मासिक के समय सफाई रखने का संदेश दिया और सैनिटरी पैड के उपयोग के लिए प्रेरित किया।

कार्यक्रम में मुख्य रूप से उपस्थित थीं -  केसरी अग्रवाल ,शकुन्तला लोहिया, उर्मिला संथालिया, लीलावती अग्रवाल, रेणु वाष्र्णेय,  नाज़ों कौशिक इत्यादि।

Sunday, 1 December 2019

रोटरी चाणक्या द्वारा आयोजित हुआ मेगा हेल्थ चेकअप



पटना, दिनांक 1.12.19 आध्यात्मिक सत्संग समिति, लवकुश टॉवर में रोटरी चाणक्या द्वारा आयोजित हुआ मेगा हेल्थ चेकअप, जिसमे करीब 100 लोगों ने शहर के प्रख्यात  चिकित्सको  से सलाह ली जो अपने विषय के विशेषज्ञ हैं । उनमे डॉ एस के डिडवानिया, डॉ उषा डिडवानिया, डॉ श्रवण कुमार, डॉ मनोज कुमार , डॉ विनीता त्रिवेदी, डॉ अरविंद कुमार, डॉ रमित गुंजन, डॉ संजीव कुमार, डॉ सुभाष कुमार, डॉ पीयूष खेतान, डॉ सुधाकर मिश्र, डॉ राहुल मुनका आदि प्रमुख थे।


कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे श्री गणेश खेतेरिवालर, वहीँ विशिष्ठ अतिथि में रोटरी के मंडलाध्यक्ष श्री गोपाल खेमका, पूर्व मंडलाध्यक्ष श्रीमती बिंदु सिंह एवं अनेक गण्यमान व्यक्तियों का समावेश था।
क्लब के अध्यक्ष डॉ श्रवण कुमार ने बताया कि "इस कार्यक्रम में सभी को बहुत लाभ  प्राप्त हुआ।
कुछ लोगों को उनकी बीमारियों की जांच द्वारा पता चला जिसे वो जानते तक नहीं थे।"
मेगा हेल्थ चेकअप के आयोजक आलोक स्वरूप एवं अभिषेक अपुर्व  ने बताया कि "यहां ब्लड शुगर, लिपिड प्रोफाइल, सी बी सी के लिए ब्लड टेस्ट और B M D द्वारा बोन की मजबूती का पता किया गया।"


कार्यक्रम को सफल बनाने में  निखिल नटराज, आशीश बांका, संदीप चौधरी, आशीष अग्रवाल, चिंतन जैन, नीना मोटानी, सुनील सराफ, जया स्वरूप, प्रकाश अग्रवाल  नितिन कृष्णा, कृष्णा रुंगटा आदि प्रमुख थे। कार्यक्रम को लोगो ने बहुत सराहा और आगे भी इस तरह का हेल्थ कैम्प होता रहे इसकी आशा की।



Wednesday, 27 November 2019

शहरी कल्चर में पले-बढ़े बच्चे कार्यक्रम 'आओ गांव चलें' से हुए ग्रामीण संस्कृति से रूबरू



पटना, 24 नवम्बर, रविवार, “शिक्षा दे शक्ति,बाल-मजदूरी से मुक्ति…”, “चलो अब शुरुआत करें, बाल-विवाह का नाश करें…”, “ऐसा कोई काम नहीं जो बेटियाँ ना कर पायी हैं, बेटियाँ तो आसमान से तारे तोड़ लायी हैं…”, “दहेज हटाओ, बहु नहीं बेटी बुलाओ…”, “पर्यावरण का रखें ध्यान, तभी देश बनेगा महान…”  अपने-अपने हाथों में जागरूकता हेतु ये स्लोगन की तख्तियां लेकर जब लगभग 40 की संख्या में शहर से आये बच्चे स्कूली बस से उतरें तो यह देखकर ‘बीर’ गांव के निवासी भी दंग रह गयें. यह नजारा था कार्यक्रम “आओ गाँव चलें” का जिसका आयोजन बोलो ज़िन्दगी फाउंडेशन ने किया था. जिसके तहत स्कॉलर्स एबोड स्कूल के वैसे बच्चों को धनरुआ प्रखंड के बीर-ओरियारा गाँव भ्रमण पर ले जाया गया जो आज़तक कभी गाँव नहीं गए थें, जिन्होंने रियल लाइफ में गाँव होता कैसा है देखा ही नहीं था. जिन्होंने इससे पहले गाँव को सिर्फ किताबों में पढ़ा और फ़िल्म-टीवी में देखा था. इस कार्यक्रम का उद्देश्य था शहरी कल्चर में पले-बढ़े बच्चों को ग्रामीण संस्कृति से रूबरू कराने के साथ ही उन्हें किताबों से इतर व्यवहारिक शिक्षा भी देना.

https://www.youtube.com/watch?v=scquzR79T2Q

गाँव जा रहे बच्चों के स्कूली बस को रविवार की सुबह हरी झंडी देकर रवाना किया पटना के जानेमाने चिकित्सक डॉ. दिवाकर तेजस्वी, स्कॉलर्स एबोड की प्राचार्या डॉ. बी. प्रियम एवं बोलो ज़िन्दगी के निदेशक राकेश सिंह ‘सोनू’ ने. ये सभी अतिथि स्कूली बच्चों के साथ खुद भी गाँव भ्रमण पर गयें.

हरी झंडी देने के पहले इस अवसर पर बोलो ज़िन्दगी फाउंडेशन के डायरेक्टर राकेश सिंह ‘सोनू’ ने कहा कि “कभी पटना में वैसे एक-दो बच्चों से मुलाक़ात हुई थी जो कभी गांव ही नहीं गए थें, तब वहीं से आइडिया आया कि ऐसे बहुत से बच्चे शहर में होंगे तो क्यों नहीं उन्हें ले जाकर ग्रामीण संस्कृति से रु-ब-रु कराया जाए…कि जो अनाज हम खाते हैं उसकी फ़सल गांव के किसान कैसे उपजाते हैं, उन्हें खेत-खलिहान भी दिखाया जाए, डायनिंग टेबल पर खानेवाले बच्चों को गांव में दरी पर बैठाकर पत्तल में खिलाया जाए, मिट्टी के चुक्के में पानी पिलाया जाए. मतलब उन्हें भी गाँव की संस्कृति से जोड़ा जाए.”


वहीं स्कॉलर्स एबोड की प्राचार्या डॉ. बी. प्रियम ने कहा ” सच में इस यात्रा से हमारे बच्चे कुछ-ना-कुछ अच्छा सीखकर ही अपने घर लौटेंगे यह हमें विश्वास है. और तमाम अभिभावकों से हम यही अपील करना चाहेंगे कि वो अपने बच्चों को कभी-कभी गाँव ज़रूर घुमाएं जिससे उनका अनुभव बेहतर होगा.”

वहीं डॉ. दिवाकर तेजस्वी ने कहा कि “यह स्कूली बच्चे जिस गाँव (बीर) में जा रहे हैं वो मेरा खुद का गांव है. ‘बीर’ गाँव में बच्चे किसानों और गाँव के मुखिया से मिलेंगे, खेत-खलिहान और फसलों को देखेंगे, गांव के  सरकारी स्कूल, मंदिर, तालाब का भी भ्रमण करेंगे. खुद से पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण का सन्देश भी देंगे. कभी गाँव नहीं गए बच्चों के लिए यह नया अनुभव होगा.”

पहली बार गांव देखने की उत्सुकता लिए ये बच्चे ‘बीर’ गांव में सबसे पहले तालाब के रास्ते से चलते हुए गांव के प्राइमरी एवं मीडिल स्कूल में पहुँचे. हालाँकि रविवार की छुट्टी होने की वजह से स्कूल की कक्षाएं बंद थीं लेकिन फिर भी सभी बच्चों ने जिज्ञासावश स्कूल परिसर में दाखिल होकर यह देखना चाहा कि आखिर गांव का सरकारी स्कूल दिखता कैसा है…! वहां से बच्चों को साथ लिए फाउंडेशन की टीम गांव के मुखिया के घर पहुंची. उसी क्रम में कुछ बच्चों ने जानना चाहा कि मुखिया किसे कहते हैं…? तो किसी ने उनकी जिज्ञासा यह कहकर शांत की कि मुखिया गांव का हेड होता है. मुखिया विभा देवी जी घर में मौजूद नहीं थीं तो बच्चे जब उनके सास-ससुर से मिलें तो यह सवाल पूछ बैठें कि “आपलोग गांव के हेड हो तो आप पूरे गांव को कैसे सँभालते हो…?” इसपर मुखिया के ससुर जी ने वाजिब जवाब देकर बच्चों की जिज्ञासा शांत की. वे भी इस कार्यक्रम का उद्देश्य जानकर इतने खुश हुए कि संग-संग बच्चों की टोली के साथ बाहर गांव की सैर पर निकल पड़ें.

रास्ते में बच्चों ने गांव का पोस्ट ऑफिस देखा, घास चरती हुईं बकरियों को देखा, खेतों में किसानों को काम करते हुए देखा. और जब एक जगह चांपाकल देखा तो फिर चांपाकल चलाकर पानी पीने की बच्चों में होड़ सी लग गयी. गला तर करते ही तारीफ के शब्द भी निकलें कि “वाह, कितना मीठा पानी है.”

वहां से बच्चों का जत्था पहुँचा गांव में खुली संस्था ‘पहल’ के ऑफिस में जिसे डॉ. दिवाकर तेजस्वी एवं उनके कुछ दोस्तों ने शुरू किया है. बच्चों को ‘पहल’ के बारे में यह जानकारी दी गयी कि यहाँ गांव कि लड़कियों-महिलाओं को मुफ्त में कम्प्यूटर व सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें. फिर डॉ. साहब के नेतृत्व में स्कूली बच्चों ने वहीँ पास के खेत में चलकर खुद अपने हाथों पौधरोपण करने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण का सन्देश दिया. 

अब बच्चों को भूख लगनी शुरू हो गयी थी. कार्यक्रम के अंतिम पड़ाव में बोलो जिंदगी फाउंडेशन की टीम उन्हें लेकर पास के ही ओरियारा गांव पहुंची जहाँ के प्रसिद्ध महादेव मंदिर का दर्शन कराने के बाद वहीँ के धर्मंशाला परिसर में भोजन कराने की व्यवस्था शुरू हुई. शायद पहली बार जमीं पर एक साथ पंगत में बैठकर ये बच्चे यूँ खाना खाने बैठे थें. उन्हें पत्ते के पत्तल पर पूरी, सब्जी और खीर परोसकर खिलाया गया और मिट्टी के कुल्हड़ में पानी पिलाया गया. इस तरह से भोजन करने और मिट्टी के कुल्हर में पानी पीने का बहुत ही सुखद अनुभव महसूस किया बच्चों ने. बच्चों के खाने-पीने की व्यवस्था का सारा दारोमदार बोलो जिंदगी फाउंडेशन की टीम-कॉर्डिनेटर तबस्सुम अली का था. और सुबह से शाम तक की इस यात्रा में शामिल सारे बच्चों की देखरेख भी तबस्सुम के नेतृत्व में हुआ. 

वहीं फाउंडेशन के प्रोग्रामिंग हेड प्रीतम कुमार ने इस कार्यक्रम के सञ्चालन के साथ ही फोटोग्राफी का दायित्व भी उठा रखा था. शाम 5 बजे गाँव से सभी बच्चों को साथ लेकर फाउंडेशन की टीम पटना के लिए रवाना हुई. रास्ते में बच्चों की आपस में यही बातचीत चल रही थी कि घर पहुंचकर हम मम्मी-पापा को बताएँगे कि गांव में हमने क्या-क्या देखा और किस तरह से इंज्वाय किया. शाम के इस सफर को और सुहाना बनाने के लिए बोलो जिंदगी फाउंडेशन की तबस्सुम अली एवं प्रीतम कुमार ने बच्चों को दो ग्रुप में बांटकर अंत्याक्षरी की महफ़िल सजा दी. पटना पहुँचते हुए देर शाम हो चुकी थी लेकिन इन बच्चों के चेहरे पर थकान का ज़रा सा भी एहसास नहीं हो रहा था सिवाए उल्लास और आनंद के.
“आओ गाँव चलें” कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. बी. प्रियम, अनुजा श्रीवास्तव, पंकज कुमार, डॉ. दिवाकर तेजस्वी, राकेश सिंह ‘सोनू’, तबस्सुम अली, प्रीतम कुमार, नीरज कुमार, दीपक कुमार एवं सुबी फौजिया का विशेष योगदान रहा.



बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : सोशल वर्कर विवेक विश्वास की फैमली, राजीवनगर, आशियाना-दीघा रोड, पटना




शनिवार, 23 नवंबर की शाम 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटना के आशियाना-दीघा रोड, राजीवनगर  इलाके में सोशल वर्कर विवेक विश्वास के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में ट्राई  संस्था में कार्यरत बिहार-झाड़खंड की हेल्थ डायरेक्टर अमरूता सोनी भी शामिल हुईं. इस कार्यक्रम को सपोर्ट किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों विवेक विश्वास की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.


फैमली परिचय- विवेक विश्वास राजीव नगर, दीघा-आशियाना रोड इलाके में रहते हैं जो एफएमसीजी में सेल्स ऑफिसर हैं. जॉब के दरम्यान ही राह में जो भी लावारिश व्यक्ति बीमार या घायल अवस्था में दिख जाये तो वे निस्वार्थ भाव से उसकी मदद करते हैं. चोट लगे पशु-पक्षियों की भी सेवा करते हैं. और इस काम के लिए विभिन्न संस्थाओं द्वारा विवेक सम्मानित भी हो चुके हैं. फैमिली में पापा श्री धर्मेंद्र कुमार हैं, भइया-भाभी हैं. भइया विकास कुमार रिटेल सेक्टर में हैं, अभी टाटा में स्टोर मैनेजर हैं. जॉब के अलावे इनके भइया विकास कुमार ब्लड डोनेशन के लिए पर्सनली काम करते हैं. खुद भी डोनेट करते हैं और उनके अंडर काम करनेवाले 150 लड़के हैं, जब भी जरूरत पड़े वे ब्लड डोनेशन को तैयार रहते हैं.  भाभी हॉउस वाईफ हैं. भइया की एक बेटी हुई है जो अभी 2 महीने की है. विवेक की हाल ही में सुमन कुमारी से शादी हुई है. इनकी बहनों का घर भी आस-पास के इलाके में ही है. बड़ी बहनों का नाम है रूचि रंजन और मनीषा. 

सेवा की भावना कब से जगी - विवेक हमेशा ट्रेन से सफर करते रहे हैं, नानी घर गया में है तो पटना - गया बहुत आना-जाना हुआ. उनका अपना पुस्तैनी घर हुआ लखीसराय में तो ट्रेन से ही आते-जाते थें. बचपन से ही जब किसी को देखते थें कि वो भूखा है, लावारिस सा गिरा पड़ा है, सिसक रहा है, उसको कोई देखनेवाला नहीं है तो वहीँ से भावना जगी कि अगर बड़ा हुए तो इनके लिए कुछ करेंगे. जब आठवीं कक्षा में थें तो एक पोस्टर पर स्लोगन देखें विवेकानद जी का कि "मैं उस प्रभु की सेवा करता हूँ जिसे ज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं." वो पंक्तियाँ बहुत गहरे से विवेक के जेहन में समा गयीं. जैसे-जैसे बड़े होते गएँ अच्छे लोगों का भी साथ मिलता गया और लोगों की सेवा बदस्तूर जारी रही.

सोशल वर्क की शुरुआत कैसे हुई - शिवपुरी में पहले विवेक जी का ब्वॉयस हॉस्टल चलता था, तब रोजाना 50-60 रोटियां बच जाने पर फेंकनी पड़ जाती थी. एक तो दिमाग में था कि बाहर कुछ लोग भूखे हैं और दूसरी ये कि इधर रोटियां नाली में डाली जा रही हैं. तो उन बची हुई रोटियों के इस्तेमाल के लिए विवेक ने एक आइडिया निकाला. तब  दो-ढ़ाई किलो आलू का भुजिया बनवाते थें और सबका चार-चार का बंडल बनाकर बाहर ले जाकर भूखों को बाँट देते थें. यह लगातार दो-तीन साल चला. लेकिन बॉयस हॉस्टल बंद होने के बाद ये काम बीच में बंद हो गया. उस दरम्यान रोटी का बंडल बनाकर जब बांटते थें तब देखते कि कोई बीमार है, चोट से कराह रहा है तो वैसे लोगों को पीएमसीएच में ले जाकर इलाज करा देते थें. तो निःसहायों की सेवा की आदत उसी समय से लगनी शुरू हो गयी. और तब से लेकर आजतक वो सिलसिला जारी है. विवेक ऐसे असहाय-लावारिस लोगों का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने लगें और लोगों से अपील करने लगें कि आप भी अपने आस-पास के ऐसे लोगों की मदद करें. अब इन्हें सामने से कॉल भी आते हैं कि कोई यहाँ बीमार है, कोई इंसान लावारिस हालत में पड़ा हुआ है, उसे देखनेवाला कोई नहीं है तो फिर विवेक वहां पहुँचते हैं, सरकारी एम्बुलेंस जो फ्री है को बुलाते हैं, सरकारी डॉक्टर जो फ्री में इलाज करने के लिए तैयार हैं, ऐसे लोगों के लिए सरकारी हॉस्पिटल पीएमसीएच में लावारिश वार्ड है जहाँ सारी दवाएं मुफ्त में मुहैया हो जाती हैं. लेकिन बहुत से लोग जो इनकी मदद करना चाहते हैं उनको जानकारी का आभाव रहता है तो उनको कैसे जागरूक किया जाये, उसके लिए ही ये ऐसे लोगों का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया के माध्यम से अवेयरनेस फैलाते हैं. विवेक की रिक्वेस्ट पर अच्छे समाजसेवक लोग अब खुद से आगे आने लगे हैं. अभी तक इन कामों के लिए चाहे वो कोई आम व्यक्ति हो या प्रशासनिक अधिकारी कभी किसी ने मना नहीं किया. रिस्पॉन्स अच्छा मिलता है. इससे एक फायदा ये भी होता है कि ऐसे कुछ विक्षिप्त लोग जो लावारिस हालत में अपने घर-परिवार से दूर हो गए हैं, सोशल मीडिया के माध्यम से जब उनके घरवालों को उनका पता चलता है तो वे उन्हें लेने भी आते हैं.


बेजुबां जानवरों के भी मसीहा - जब विवेक जी को पता चलता है या कोई कॉल कर के बताता है कि यहाँ एक गाय या कुत्ता बीमार पड़ा है, लहूलुहान है, दर्द से कराह रहा है तो विवेक वहां भी जानवरों की सेवा करने पहुँच जाते हैं. विवेक अबतक 15-20 जानवरों को हॉस्पिटल में एडमिट करा चुके हैं. ऐसे में उनके मित्र जो वेटनरी डॉक्टर हैं बंटी जी उनका बहुत सहयोग मिलता है. उन्हें कभी भी बुलाएँ वे हाजिर हो जाते हैं, रात के 10-11 बजे भी अगर कॉल चला जाये तो वे आ जाते हैं और निशुल्क सेवा देते हैं.

फैमिली की रोकटोक - फैमिली की रोकटोक चलती रहती है, इसलिए उनसे छुप-छुपाकर ये काम करना पड़ता है. भइया को विवेक के काम से नफरत नहीं है बल्कि उन्हें हमेशा डर लगा रहता है कि कहीं वे किसी लफड़े में ना फंस जाएँ. अच्छा करने के चक्कर में कहीं अपनी जिंदगी जोखिम में न डाल दें. कई लावारिस इंसान, जानवरों के शरीर से इतनी बदबू आती है, मख्खियां भिनभिनाती हैं, जहाँ लोग नाक बंद करके निकल लेते हैं, कोई उनके पास नहीं जाना चाहता. ऐसे में जब विवेक उनकी देखभाल करते हैं   तो उनके परिवार को भी ये भय लगा रहता है कि कहीं वे  भी किसी महामारी के चपेट में ना आ जाएँ. बड़ी बहनों ने बताया कि "वैसे विवेक काम तो बहुत अच्छा कर रहा है लेकिन बचपन से ही मानव सेवा का इसको इतना क्रेज है कि अगर इसे कोई घर का काम करने सौंपा जाये तो वे बीच रास्ते में असहाय लोगों को देखकर जिस काम से जा रहा है उसे भूलकर लोगों की सहायता में लग जाता है. इसलिए कभी-कभी उसे घर का ज़रूरी काम सौंपते हुए सबको हिचक भी होती है." विवेक के घरवाले इस बात पर भी नाराज रहते हैं कि रोजाना टिफिन ले जाने के बावजूद ये खुद ना खाकर किसी ना किसी को खिला देते हैं और जब रात में घर आते हैं तो पता चलता है कि ज्यादा देर भूखे रहने की वजह से एसिडिटी की प्रॉब्लम हो गयी. इस बाबत विवेक कहते हैं कि "मेरे पास खाना है और हम किसी भूखे को देखकर नज़र फेरकर चले जाएँ यह दिल इजाजत नहीं देता. और यही वजह है कि मेरी पत्नी भी मेरे से नाराज़ होती है कि लोगों की सेवा करते हुए खुद को बीमार क्यों कर लेते हैं. और यह काम हम अपना जॉब छोड़कर नहीं करतें बल्कि मेरा मार्केटिंग का काम है, दिनभर रोड पर ही आना-जाना लगा रहता है तो राह चलते अगर हम लावारिस लोगों के कुछ काम आ भी गएँ तो उससे मुझे क्या हानि होगी ?"

स्पेशल गेस्ट की टिप्पणी - इस कार्यक्रम में बतौर स्पेशल गेस्ट के रूप में उपस्थित ट्राई की हेल्थ डायरेक्टर अमरूता सोनी ने बोलो ज़िंदगी टीम के साथ विवेक जी की कहानी से रूबरू होने पर विवेक जी की तारीफ करते हुए कहा कि "एक लावारिस का दर्द क्या होता है वह मैंने बहुत करीब से देखा है इसलिए मैं समझ सकती हूँ कि ऐसे रह चलते लावारिसों की सेवा तो दूर लोग जल्दी उनके आस-पास भी नहीं फटकते हैं. ऐसे में विवेक जी निस्वार्थ भाव से इनकी मदद को तैयार रहते हैं तो यह बहुत बड़ी बात है. इंसान ही नहीं बीमार और लाचार जानवरों के दर्द को देखकर भी विवेक जी का दिल धड़कता है तो इससे ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये कितने नेकदिल इंसान होंगे. मैं यही कहना चाहूंगी कि यह काम आप आगे भी जारी रखिये चाहे कितनी ही परेशानियाँ क्यों न आएं, क्यूंकि एक तो दूसरे लोग भी जागरूक होंगे और ऐसे असहायों की सेवा से ईश्वर की भी दुआ मिलती है."
(इस पूरे कार्यक्रम को bolozindagi.com पर भी देखा जा सकता है.)

Tuesday, 26 November 2019

पत्रकार जयकांत चौधरी की पिटाई मामले में एडीजी ने दिया कार्रवाई का आश्वासन


पटना, 26 नवम्बर, पत्रकार जयकांत चौधरी की पाटलिपुत्र थाने में पुलिसकर्मियों द्वारा की गयी पिटाई की बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन घोर निंदा करता है। जयकांत को पीटने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग को लेकर मंगलवार को यूनियन का एक प्रतिनिध मंडल महासचिव प्रेम कुमार के नेतृत्व में डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे से मिलने पहुंचा। डीजीपी के नहीं रहने के कारण एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) अमित कुमार से मिला। एडीजी ने तुरंत इसपर कार्रवाई करने का आश्वासन दिया। यूनियन के महासचिव प्रेम कुमार ने घटना में शामिल पुलिसकर्मियों पर 24 घंटे के अंदर कार्रवाई करने की मांग की है। प्रतिनिधि मंडल में विशाल चौहान, रामजी प्रसाद, राजीव कमल, चंद्र मोहन पांडे, रवि रंजन, शरद प्रकाश झा, पारसनाथ, नीरज कुमार कर्मशील, बालकृष्ण कुमार, निखिल कुमार वर्मा, नवनीत कुमार, मदन कुमार,अक्षय आनंद, अविनव रंजन, मनन गोस्वामी, इंद्रमोहन पांडे, असलम अब्बास, समीम, सुजीत कुमार गुप्ता, जयकांत की पत्नी रीना चौधरी सहित अन्य पत्रकार शामिल थे।

Monday, 25 November 2019

"आओ गांव चलें" कार्यक्रम के तहत शहरी बच्चे पहली बार गयें गांव घूमने


(स्टोरी - राकेश सिंह 'सोनू', रिपोर्टिंग - प्रीतम कुमार) पटना, 24 नवम्बर, रविवार, "शिक्षा दे शक्ति,बाल-मजदूरी से मुक्ति...", "चलो अब शुरुआत करें, बाल-विवाह का नाश करें...", "ऐसा कोई काम नहीं जो बेटियाँ ना कर पायी हैं, बेटियाँ तो आसमान से तारे तोड़ लायी हैं...", "दहेज हटाओ, बहु नहीं बेटी बुलाओ...", "पर्यावरण का रखें ध्यान, तभी देश बनेगा महान..."  अपने-अपने हाथों में जागरूकता हेतु ये स्लोगन की तख्तियां लेकर जब लगभग 40 की संख्या में शहर से आये बच्चे स्कूली बस से उतरें तो यह देखकर 'बीर' गांव के निवासी भी दंग रह गयें. यह नजारा था कार्यक्रम "आओ गाँव चलें" का जिसका आयोजन बोलो ज़िन्दगी फाउंडेशन ने किया था. जिसके तहत स्कॉलर्स एबोड स्कूल के वैसे बच्चों को धनरुआ प्रखंड के बीर-ओरियारा गाँव भ्रमण पर ले जाया गया जो आज़तक कभी गाँव नहीं गए थें, जिन्होंने रियल लाइफ में गाँव होता कैसा है देखा ही नहीं था. जिन्होंने इससे पहले गाँव को सिर्फ किताबों में पढ़ा और फ़िल्म-टीवी में देखा था. इस कार्यक्रम का उद्देश्य था शहरी कल्चर में पले-बढ़े बच्चों को ग्रामीण संस्कृति से रूबरू कराने के साथ ही उन्हें किताबों से इतर व्यवहारिक शिक्षा भी देना.

गाँव जा रहे बच्चों के स्कूली बस को रविवार की सुबह हरी झंडी देकर रवाना किया पटना के जानेमाने चिकित्सक डॉ. दिवाकर तेजस्वी, स्कॉलर्स एबोड की प्राचार्या डॉ. बी. प्रियम एवं बोलो ज़िन्दगी के निदेशक राकेश सिंह 'सोनू' ने. ये सभी अतिथि स्कूली बच्चों के साथ खुद भी गाँव भ्रमण पर गयें.
    हरी झंडी देने के पहले इस अवसर पर बोलो ज़िन्दगी फाउंडेशन के डायरेक्टर राकेश सिंह 'सोनू' ने कहा कि "कभी पटना में वैसे एक-दो बच्चों से मुलाक़ात हुई थी जो कभी गांव ही नहीं गए थें, तब वहीं से आइडिया आया कि ऐसे बहुत से बच्चे शहर में होंगे तो क्यों नहीं उन्हें ले जाकर ग्रामीण संस्कृति से रु-ब-रु कराया जाए...कि जो अनाज हम खाते हैं उसकी फ़सल गांव के किसान कैसे उपजाते हैं, उन्हें खेत-खलिहान भी दिखाया जाए, डायनिंग टेबल पर खानेवाले बच्चों को गांव में दरी पर बैठाकर पत्तल में खिलाया जाए, मिट्टी के चुक्के में पानी पिलाया जाए. मतलब उन्हें भी गाँव की संस्कृति से जोड़ा जाए."
     वहीं स्कॉलर्स एबोड की प्राचार्या डॉ. बी. प्रियम ने कहा " सच में इस यात्रा से हमारे बच्चे कुछ-ना-कुछ अच्छा सीखकर ही अपने घर लौटेंगे यह हमें विश्वास है. और तमाम अभिभावकों से हम यही अपील करना चाहेंगे कि वो अपने बच्चों को कभी-कभी गाँव ज़रूर घुमाएं जिससे उनका अनुभव बेहतर होगा."
    वहीं डॉ. दिवाकर तेजस्वी ने कहा कि "यह स्कूली बच्चे जिस गाँव (बीर) में जा रहे हैं वो मेरा खुद का गांव है. 'बीर' गाँव में बच्चे किसानों और गाँव के मुखिया से मिलेंगे, खेत-खलिहान और फसलों को देखेंगे, गांव के  सरकारी स्कूल, मंदिर, तालाब का भी भ्रमण करेंगे. खुद से पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण का सन्देश भी देंगे. कभी गाँव नहीं गए बच्चों के लिए यह नया अनुभव होगा."
     .पहली बार गांव देखने की उत्सुकता लिए ये बच्चे 'बीर' गांव में सबसे पहले तालाब के रास्ते से चलते हुए गांव के प्राइमरी एवं मीडिल स्कूल में पहुँचे. हालाँकि रविवार की छुट्टी होने की वजह से स्कूल की कक्षाएं बंद थीं लेकिन फिर भी सभी बच्चों ने जिज्ञासावश स्कूल परिसर में दाखिल होकर यह देखना चाहा कि आखिर गांव का सरकारी स्कूल दिखता कैसा है...! वहां से बच्चों को साथ लिए फाउंडेशन की टीम गांव के मुखिया के घर पहुंची. उसी क्रम में कुछ बच्चों ने जानना चाहा कि मुखिया किसे कहते हैं...? तो किसी ने उनकी जिज्ञासा यह कहकर शांत की कि मुखिया गांव का हेड होता है. मुखिया विभा देवी जी घर में मौजूद नहीं थीं तो बच्चे जब उनके सास-ससुर से मिलें तो यह सवाल पूछ बैठें कि "आपलोग गांव के हेड हो तो आप पूरे गांव को कैसे सँभालते हो...?" इसपर मुखिया के ससुर जी ने वाजिब जवाब देकर बच्चों की जिज्ञासा शांत की. वे भी इस कार्यक्रम का उद्देश्य जानकर इतने खुश हुए कि संग-संग बच्चों की टोली के साथ बाहर गांव की सैर पर निकल पड़ें. रास्ते में बच्चों ने गांव का पोस्ट ऑफिस देखा, घास चरती हुईं बकरियों को देखा, खेतों में किसानों को काम करते हुए देखा. और जब एक जगह चांपाकल देखा तो फिर चांपाकल चलाकर पानी पीने की बच्चों में होड़ सी लग गयी. गला तर करते ही तारीफ के शब्द भी निकलें कि "वाह, कितना मीठा पानी है." वहां से बच्चों का जत्था पहुँचा गांव में खुली संस्था 'पहल' के ऑफिस में जिसे डॉ. दिवाकर तेजस्वी एवं उनके कुछ दोस्तों ने शुरू किया है. बच्चों को 'पहल' के बारे में यह जानकारी दी गयी कि यहाँ गांव कि लड़कियों-महिलाओं को मुफ्त में कम्प्यूटर व सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें. फिर डॉ. साहब के नेतृत्व में स्कूली बच्चों ने वहीँ पास के खेत में चलकर खुद अपने हाथों पौधरोपण करने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण का सन्देश दिया.
  अब बच्चों को भूख लगनी शुरू हो गयी थी. कार्यक्रम के अंतिम पड़ाव में बोलो जिंदगी फाउंडेशन की टीम उन्हें लेकर पास के ही ओरियारा गांव पहुंची जहाँ के प्रसिद्ध महादेव मंदिर का दर्शन कराने के बाद वहीँ के धर्मंशाला परिसर में भोजन कराने की व्यवस्था शुरू हुई. शायद पहली बार जमीं पर एक साथ पंगत में बैठकर ये बच्चे यूँ खाना खाने बैठे थें. उन्हें पत्ते के पत्तल पर पूरी, सब्जी और खीर परोसकर खिलाया गया और मिट्टी के कुल्हड़ में पानी पिलाया गया. इस तरह से भोजन करने और मिट्टी के कुल्हर में पानी पीने का बहुत ही सुखद अनुभव महसूस किया बच्चों ने. बच्चों के खाने-पीने की व्यवस्था का सारा दारोमदार बोलो जिंदगी फाउंडेशन की टीम-कॉर्डिनेटर तबस्सुम अली का था. और सुबह से शाम तक की इस यात्रा में शामिल सारे बच्चों की देखरेख भी तबस्सुम के नेतृत्व में हुआ.
      वहीं फाउंडेशन के प्रोग्रामिंग हेड प्रीतम कुमार ने इस कार्यक्रम के सञ्चालन के साथ ही फोटोग्राफी का दायित्व भी उठा रखा था. शाम 5 बजे गाँव से सभी बच्चों को साथ लेकर फाउंडेशन की टीम पटना के लिए रवाना हुई. रास्ते में बच्चों की आपस में यही बातचीत चल रही थी कि घर पहुंचकर हम मम्मी-पापा को बताएँगे कि गांव में हमने क्या-क्या देखा और किस तरह से इंज्वाय किया. शाम के इस सफर को और सुहाना बनाने के लिए बोलो जिंदगी फाउंडेशन की तबस्सुम अली एवं प्रीतम कुमार ने बच्चों को दो ग्रुप में बांटकर अंत्याक्षरी की महफ़िल सजा दी. पटना पहुँचते हुए देर शाम हो चुकी थी लेकिन इन बच्चों के चेहरे पर थकान का ज़रा सा भी एहसास नहीं हो रहा था सिवाए उल्लास और आनंद के.
     "आओ गाँव चलें" कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. बी. प्रियम, अनुजा श्रीवास्तव, पंकज कुमार, डॉ. दिवाकर तेजस्वी, राकेश सिंह 'सोनू', तबस्सुम अली, प्रीतम कुमार, नीरज कुमार, दीपक कुमार एवं सुबी फौजिया का विशेष योगदान रहा.

Friday, 15 November 2019

बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक : फ्लूट आर्टिस्ट बीएमपी जवान विष्णु थापा की फैमली, अनीसाबाद , पटना



शुक्रवार,15 नवंबर को 'बोलो ज़िन्दगी फैमली ऑफ़ द वीक' के तहत बोलो ज़िन्दगी की टीम (राकेश सिंह 'सोनू', प्रीतम कुमार एवं तबस्सुम अली) पहुंची पटना के अनीसाबाद इलाके में फ्लूट आर्टिस्ट विष्णु थापा के घर. फैमली ऑफ़ द वीक में हमारे स्पेशल गेस्ट के रूप में एक्टर एवं डांस टीचर विकास मेहरा भी शामिल हुयें. इस कार्यक्रम को स्पॉन्सर्ड किया है बोलो जिंदगी फाउंडेशन ने जिसकी तरफ से हमारे स्पेशल गेस्ट के हाथों विष्णु थापा की फैमली को एक आकर्षक गिफ्ट भेंट किया गया.

फैमली परिचय- विष्णु थापा बिहार पुलिस के अंतर्गत आर्मर के रूप में बी.एम.पी.1 गोरखा बटालियन में तैनात हैं जिनका काम है हथियारों की जाँच-परख करना. ये अगस्त 2002 में बहाल हुए थें. सिलीगुड़ी से बिलॉन्ग करते हैं. इनका एक घर नेपाल के जनकपुर में भी है. चूँकि इनका परिवार बिहार में है तो वहां बहुत कम आना-जाना होता है. इनके पिताजी का स्वर्गवास हुए तीन साल हो गए हैं. इनकी माँ दीदी के पास जनकपुर में रहती हैं. विष्णु जी दो भाई दो बहन हैं. बहनों की शादी हो चुकी है. इनके भइया कविराज आर्मी में हैं, दानापुर में पोस्टेड हैं. विष्णु जी ने बहुत कम उम्र में ही लव मैरेज कर ली थी. इनका ससुराल पटना,बिहार में ही है. इनकी पत्नी बसंती देवी का जन्म एवं परवरिश यहीं पटना में हुई है. इसलिए वो इनसे ज्यादा अच्छी भोजपुरी बोल लेती हैं. विष्णु जी का बड़ा बेटा तिलक कुमार थापा संत कैरेंस में 12 वीं का स्टूडेंट है तो छोटा बेटा रोहित थापा एस.राजा स्कूल में 8 वीं क्लास में है.

https://www.youtube.com/watch?v=G6NN91EV3PE&t=8s

संगीत से जुड़ाव - म्यूजिक में बचपन से शौक था. 15 साल से बांसुरी वादन कर रहे हैं. इनके गुरु जी हैं बजेन्द्र सिंह जी जो पंजाब से बिलॉन्ग करते हैं और बहुत बड़े फ्लूट आर्टिस्ट हैं. ये ऑनलाइन उनको ही फॉलो करते हुए सीखते हैं. शुरुआत में बीएमपी के ही सुखबीर भइया से बेसिक सीखा था. पहले जब बचपन में बहुत सारा सॉन्ग सुनते थें तो उसमे बांसुरी की धुन बहुत ज्यादा पसंद आती थी. कृष्ण भगवान के भजन भी बहुत सुना करते थें तो फिर बांसुरी वादन के प्रति आकर्षित हुए. फिर पहले खुद से ही सीखने लगें. विष्णु जी बताते हैं- बांसुरी वादन को शास्त्रीय संगीत में ही लिया जाता है. जब आप राग वगैरह सारी चीजें सीख लेते हैं तो उन्ही रागों के आधार पर आप खुद भी स्वरों की रचना कर सकते हैं.

स्ट्रगल- मैट्रिक तक की पढ़ाई सिलीगुड़ी में हुई फिर पुलिस सेवा में आ गएँ और पहली पोस्टिंग बिहार में हुई. विष्णु जी के परिवार में इससे पहले किसी का सरकारी जॉब नहीं था. इनका पहले प्रयास में ही जॉब हो गया. पुलिस का जॉब ही क्यों...? यह पूछने पर थापा जी बताते हैं, "क्यूंकि मेरा शौक था कि देश के लिए कुछ करें.चाहे संगीत के माध्यम से या सरकारी सेवा के माध्यम से देश का नाम रौशन करूँ." ये मीडिल क्लास फैमली से हैं तो जानते हैं कि ऐसे में जॉब कितना मायने रखता है. परिस्थितियां इनको सरकारी सेवा में ले आयी. पुलिस जॉब और म्यूजिक दोनों अलग-अलग क्षेत्र है फिर भी विष्णु जी बैलेंस कर लेते हैं.

अब तक कला का प्रदर्शन - बिहार के बहुत से सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे सोनपुर महोत्सव, राजगीर महोत्सव, पाटलिपुत्र महोत्सव, और पुलिस विभाग के जितने भी कार्यक्रम हैं उसमे अवसर मिलता रहा है. दूरदर्शन अदि के कई कार्यक्रमों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं.

समझते हैं संयुक्त परिवार का महत्व - कभी कभी फेस्टिवल और बच्चों की स्कूली छुटियों के समय जब विष्णु जी की पूरी फॅमिली पटना इनके घर पर इकट्ठी होती है. बहन और बहनोई भी यहाँ आ जाते हैं तो सभी को एक भरे-पूरे परिवार में इंज्वाय करते हुए बहुत अच्छा लगता है. फिर थापा जी ने बोलो जिंदगी टीम से अपने बीवी-बच्चों और सिलीगुड़ी से आयी हुई अपनी बहन, जीजा और ससुर जी से मिलवाया. अपने भइया से भी मिलवाया. जब बोलो जिंदगी टीम की तबस्सुम ने पूछा- "आप अरसे से बिहार में हैं, ससुराल भी यहीं है तो अब आप खुद को नेपाली कहलाना पसंद करते हैं या बिहारी..?" थापा जी का सॉलिड जवाब आया - "मैं खुद को हिंदुस्तानी कहलाना पसंद करता हूँ क्यूंकि हिंदुस्तानी देश के किसी कोने में भी रह सकते हैं."


जब मजाक में ही तबस्सुम ने पूछा- "संगीतकार लोग तो बहुत सॉफ्ट दिल के होते हैं, ऐसे में जब आपको क्रिमनल मिल जाते होंगे तो आप कहाँ उन्हें पकड़ते होंगे ? आप तो उसको बांसुरी सुनाकर छोड़ देते होंगे." सभी हंस पड़ें. थापा जी हंसकर बोले - "ऐसा नहीं है, हमलोग शपथ लिए होते हैं.... भले ही हम गाने-बजाने का शौक रखते हैं लेकिन जब देश सेवा की बात आती है तो हम पीछे नहीं हटते." 


लाइव परफॉर्मेंस -  फिर बोलो जिंदगी टीम के सामने जब थापा जी ने बांसुरी वादन शुरू किया तो बोलो जिंदगी के निदेशक राकेश सिंह सोनू ने उनसे एक विशेष फरमाईस की कि " पहले आप मेरी पसंद का एक सॉन्ग हाफ गर्लफ्रेंड फिल्म से 'मैं फिर भी तुमो चाहूंगा....' की धुन बजाकर सुनाएँ क्यूंकि आपके माध्यम से यह सॉन्ग मैं अपनी प्रेमिका को डेडिकेट करना चाहता हूँ."  और फिर.... सच में उनकी बांसुरी की धुन सुनकर सभी भावुक हो गएँ. कुछ और अपनी पसंदीदा गीतों पर थापा जी ने बांसुरी की धुन सुनाई जो एकदम रूह को छूकर निकल रही थी.


स्पेशल गेस्ट की टिप्पणी - इस कार्यक्रम में बतौर स्पेशल गेस्ट के रूप में उपस्थित एक्टर एवं डांस टीचर विकास मेहरा जी ने बोलो ज़िंदगी टीम के साथ विष्णु जी का टैलेंट देखकर उनकी खुलकर तारीफ करते हुए कहा कि "पारिवारिक जिम्मेदारियों तले दबे होने के बावजूद भी ये दोनों क्षेत्रों के साथ न्याय कर रहे हैं. अपनी कला को कभी मरने नहीं दिए ये बहुत बड़ी बात है. और आज भी संयुक्त परिवार से जुड़े हुए हैं और उसका महत्त्व समझते हैं."

(इस पूरे कार्यक्रम को बोलोजिन्दगी डॉट कॉम पर भी देखा जा सकता है.)























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अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में पटना में बाईक रैली Ride For Women's Safety का आयोजन किया गया

"जिस तरह से मनचले बाइक पर घूमते हुए राह चलती महिलाओं के गले से चैन छीनते हैं, उनकी बॉडी टच करते हैं तो ऐसे में यदि आज ये महिला...